भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished434 पृष्ठ

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८८ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

महादेवजी बोले— महाभागे! देवताओंने ही यह सब किया है। उन्होंने किसी भी यज्ञमें मेरा भाग नहीं रखा है। पहलेसे जो मार्ग चला आता है, उसीसे अपनेको भी चलना चाहिये।

उमाने कहा— भगवन्! आप सब देवताओंमें श्रेष्ठ हैं। आपके गुण और प्रभाव सबसे अधिक हैं। आप अपने तेज, यश और श्रीके द्वारा अजेय एवं अधृष्य हैं। महाभाग! यज्ञमें आपके भागका जो यह निषेध है, इससे मुझे बड़ा दुःख हुआ है। मेरे शरीरमें कम्प छा गया है।

महादेवजी बोले— देवि! क्या तुम मुझे नहीं जानतीं! आज तुम्हें जो मोह हुआ है, उससे इन्द्र आदि देवताओंसहित सम्पूर्ण त्रिलोकी नष्ट हो सकती है। मैं ही यज्ञका स्वामी हूँ। मेरी ही सब लोग निरन्तर स्तुति करते हैं। मेरे ही संतोषके लिये सब लोग रथन्तर सामका गान करते हैं। ब्राह्मण वेदमन्त्रोंसे मेरा ही यजन करते हैं तथा अध्वर्यु लोग यज्ञमें मेरे ही लिये भागोंकी कल्पना करते हैं।

प्राणोंके समान प्रियतमा पत्नीसे यों कहकर भगवान् शङ्करने अपने मुखसे क्रोधाग्निजनित एक महाभूतकी सृष्टि की। फिर उससे कहा—'तुम मेरी आज्ञासे दक्षके यज्ञमें जाओ और उसका शीघ्र विनाश करो।' तब उसने रुद्रकी आज्ञासे सिंहका वेष धारण करके दक्षके यज्ञका विनाश कर डाला। उसने अपने कर्मका साक्षी बनानेके लिये अत्यन्त भयंकर भद्रकालीको भी साथ ले लिया था। भगवान्‌का वह क्रोध वीरभद्रके नामसे विख्यात हुआ, जो श्मशानभूमिमें निवास करता है। उसने पार्वतीदेवीके खेदका निवारण किया था। वीरभद्रने अपने रोमकूपोंसे अनेक रुद्रगण उत्पन्न किये, जो रुद्रके समान ही वीर्यवान् और पराक्रमी थे। वे सब सैकड़ों और हजारोंकी संख्यामें झुंड बनाकर उस यज्ञमण्डपमें गये। उनकी किलकिलाहटसे समस्त आकाश गूँज उठा। अग्नि और सूर्यका प्रकाश मन्द पड़ गया। चारों ओर अन्धकार छा गया। उस समय वे समस्त रुद्रगण यज्ञमण्डपमें आग लगाने लगे; किसीने यूपोंको तोड़ डाला, किसीने उन्हें उखाड़ दिया, कोई सिंहनाद करता और कोई वहाँकी सब वस्तुओंको तहस-नहस कर डालता था। कितने ही वायुके समान वेगसे इधर-उधर दौड़ लगाने लगे। यज्ञपात्र चूर-चूर हो गये। वहाँके मण्डप ढह गये। ऐसा जान पड़ता था, आकाशसे तारे टूटकर गिर रहे हैं। कोई यज्ञमें रखे हुए भोज्य पदार्थोंको खाते और सब ओर लोगोंको डराते फिरते थे। कितने ही पर्वताकार भूत देवाङ्गनाओंको उठाकर फेंक देते थे। ऐसे गणोंके साथ प्रतापी वीरभद्रने पहुँचकर देवताओंद्वारा सुरक्षित यज्ञको भद्रकालीके सामने ही भस्म कर डाला। अन्य रुद्रगण सबको भय उपजानेवाली गर्जना करने लगे। कुछ लोगोंने यज्ञका मस्तक काटकर भयंकर नाद किया। तब इन्द्र आदि देवताओं और प्रजापति दक्षने हाथ जोड़कर