ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकृतिखण्ड ११३
ये सभी नित्य हैं। कभी इनका अन्त नहीं होता। गोलोकधामका एक भाग जो उससे नीचे है, वैकुण्ठधाम है। वह भी नित्य है। ऐसे ही प्रकृतिको भी नित्य माना जाता है। यह परब्रह्ममें लीन रहनेवाली उनकी सनातनी शक्ति है। जिस प्रकार अग्निमें दाहिका शक्ति, चन्द्रमा एवं कमलमें शोभा तथा सूर्यमें प्रभा सदा वर्तमान रहती है, वैसे ही यह प्रकृति परमात्मामें नित्य विराजमान है। जैसे स्वर्णकार सुवर्णके अभावमें कुण्डल नहीं तैयार कर सकता तथा कुम्हार मिट्टीके बिना घड़ा बनानेमें असमर्थ है, ठीक उसी प्रकार परमात्माको यदि प्रकृतिका सहयोग न मिले तो वे सृष्टि नहीं कर सकते। जिसके सहारे श्रीहरि सदा शक्तिमान् बने रहते हैं, वह प्रकृतिदेवी ही शक्तिस्वरूपा हैं। 'शक्'का अर्थ है 'ऐश्वर्य' तथा 'ति' का अर्थ है 'पराक्रम'; ये दोनों जिसके स्वरूप हैं तथा जो इन दोनों गुणोंको देनेवाली है, वह देवी 'शक्ति' कही गयी है। 'भग' शब्द समृद्धि, बुद्धि, सम्पत्ति तथा यशका वाचक है, उससे सम्पन्न होनेके कारण शक्तिको 'भगवती' कहते हैं; क्योंकि वह सदा भगस्वरूपा हैं। परमात्मा सदा इस भगवती प्रकृतिके साथ विराजमान रहते हैं, अतएव 'भगवान्' कहलाते हैं। वे स्वतन्त्र प्रभु साकार और निराकार भी हैं। उनका निराकार रूप तेजःपुञ्जमय है। योगीजन सदा उसीका ध्यान करते और उसे परब्रह्म परमात्मा एवं ईश्वरकी संज्ञा देते हैं। उनका कहना है कि परमात्मा अदृश्य होकर भी सबका द्रष्टा है। वह सर्वज्ञ, सबका कारण, सब कुछ देनेवाला, समस्त रूपोंका अन्त करनेवाला, रूपरहित तथा सबका पोषक है। परंतु जो भगवान्के सूक्ष्मदर्शी भक्त वैष्णवजन हैं, वे ऐसा नहीं मानते हैं। वे पूछते हैं—यदि कोई तेजस्वी पुरुष—साकार पुरुषोत्तम नहीं है तो वह तेज किसका है? योगी जिस तेजोमण्डलका ध्यान करते हैं, उसके भीतर अन्तर्यामी तेजस्वी परमात्मा परमपुरुष विद्यमान हैं। वे स्वेच्छामयरूपधारी, सर्वस्वरूप तथा समस्त कारणोंके भी कारण हैं। वे प्रभु जिस रूपको धारण करते हैं, वह अत्यन्त सुन्दर, रमणीय तथा परम मनोहर है। इन भगवान्की किशोर अवस्था है, ये शान्त-स्वभाव हैं। इनके सभी अङ्ग परम सुन्दर हैं। इनसे बढ़कर जगत्में दूसरा कोई नहीं है। इनका श्याम विग्रह नवीन मेघकी कान्तिका परम धाम है। इनके विशाल नेत्र शरत्कालके मध्याह्नमें खिले हुए कमलोंकी शोभाको छीन रहे हैं। मोतियोंकी शोभाको तुच्छ करनेवाली इनकी सुन्दर दन्तपंक्ति है। मुकुटमें मोरकी पाँख सुशोभित है। मालतीकी मालासे ये अनुपम शोभा पा रहे हैं। इनकी सुन्दर नासिका है। मुखपर मुस्कान छायी है। ये परम मनोहर प्रभु भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये व्याकुल रहते हैं। प्रज्वलित अग्निके समान विशुद्ध पीताम्बरसे इनका विग्रह परम मनोहर हो गया है। इनकी दो भुजाएँ हैं। हाथमें बाँसुरी सुशोभित है। ये रत्नमय भूषणोंसे भूषित, सबके आश्रय, सबके स्वामी, सम्पूर्ण शक्तियोंसे युक्त एवं सर्वव्यापी पूर्ण पुरुष हैं। समस्त ऐश्वर्य प्रदान करना इनका स्वभाव ही है। ये परम स्वतन्त्र एवं सम्पूर्ण मङ्गलके भण्डार हैं। इन्हें 'सिद्ध', 'सिद्धेश', 'सिद्धिकारक' तथा 'परिपूर्णतम ब्रह्म' कहा जाता है। इन देवाधिदेव सनातन प्रभुका वैष्णव पुरुष निरन्तर ध्यान करते हैं। इनकी कृपासे जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि, शोक और भय सब नष्ट हो जाते हैं। ब्रह्माकी आयु इनके एक निमेषकी तुलनामें है। वे ही ये आत्मा परब्रह्म श्रीकृष्ण कहलाते हैं।
'कृष्' का अर्थ है भगवान्की भक्ति और 'न' का अर्थ है, उनका 'दास्य'। अतः जो अपनी भक्ति और दास्यभाव देनेवाले हैं, वे 'कृष्ण' कहलाते हैं। 'कृष्' सर्वार्थवाचक है, 'न' से बीज अर्थकी उपलब्धि होती है। अतः सर्वबीजस्वरूप