भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 124

११४ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

परब्रह्म परमात्मा 'कृष्ण' कहे गये हैं।

नारद! अतीत कालकी बात है, असंख्य ब्रह्माओंका पतन होनेके पश्चात् भी जिनके गुणोंका नाश नहीं होता है तथा गुणोंमें जिनकी समानता करनेवाला दूसरा नहीं है; वे भगवान् श्रीकृष्ण सृष्टिके आदिमें अकेले ही थे। उस समय उनके मनमें सृष्टिविषयक संकल्पका उदय हुआ। अपने अंशभूत कालसे प्रेरित होकर ही वे प्रभु सृष्टिकर्मके लिये उन्मुख हुए थे। उनका स्वरूप स्वेच्छामय है। वे अपनी इच्छासे ही दो रूपोंमें प्रकट हो गये। उनका वामांश स्त्रीरूपमें आविर्भूत हुआ और दाहिना भाग पुरुषरूपमें। वे सनातन पुरुष उस दिव्यस्वरूपिणी स्त्रीको देखने लगे। उसके समस्त अङ्ग बड़े ही सुन्दर थे। मनोहर चम्पाके समान उसकी कान्ति थी। उस असीम सुन्दरी देवीने दिव्य स्वरूप धारण कर रखा था। मुसकराती हुई वह बंकिम भङ्गिमाओंसे प्रभुकी ओर ताक रही थी। उसने विशुद्ध वस्त्र पहन रखे थे। रत्नमय दिव्य आभूषण उसके शरीरकी शोभा बढ़ा रहे थे। वह अपने चकोर-चक्षुओंके द्वारा श्रीकृष्णके श्रीमुखचन्द्रका निरन्तर हर्षपूर्वक पान कर रही थी। श्रीकृष्णका मुखमण्डल इतना सुन्दर था कि उसके सामने करोड़ों चन्द्रमा भी नगण्य थे। उस देवीके ललाटके ऊपरी भागमें कस्तूरीकी बिंदी थी। नीचे चन्दनकी छोटी-छोटी बिंदियाँ थीं। साथ ही मध्य ललाटमें सिन्दूरकी बिन्दी भी शोभा पा रही थी। प्रियतमके प्रति अनुरक्त चित्तवाली उस देवीके केश घुँघराले थे। मालतीके पुष्पोंका सुन्दर हार उसे सुशोभित कर रहा था। करोड़ों चन्द्रमाओंकी प्रभासे सुप्रकाशित परिपूर्ण शोभासे इस देवीका श्रीविग्रह सम्पन्न था। यह अपनी चालसे राजहंस एवं गजराजके गर्वको नष्ट कर रही थी। श्रीकृष्ण परम रसिक एवं रासके स्वामी हैं। उस देवीको देखकर रासके उल्लासमें उल्लसित हो वे उसके साथ रासमण्डलमें पधारे। रास आरम्भ हो गया। मानो स्वयं शृङ्गार ही मूर्तिमान् होकर नाना प्रकारकी शृङ्गारोचित चेष्टाओंके साथ रसमयी क्रीड़ा कर रहा हो। एक ब्रह्माकी सम्पूर्ण आयुपर्यन्त यह रास चलता रहा। तत्पश्चात् जगत्पिता श्रीकृष्णको कुछ श्रम आ गया। उन नित्यानन्दमयने शुभ वेलामें देवीके भीतर अपने तेजका आधान किया।

उत्तम व्रतका पालन करनेवाले नारद! रासक्रीड़ाके अन्तमें श्रीकृष्णके असह्य तेजसे श्रान्त हो जानेके कारण उस देवीके शरीरसे दिव्य प्रस्वेद बह चला और जोर-जोरसे साँस चलने लगी। उस समय जो श्रमजल था, वह समस्त विश्वगोलक बन गया तथा वह निःश्वास वायुरूपमें परिणत हो गया, जिसके आश्रयसे सारा जगत् वर्तमान है। संसारमें जितने सजीव प्राणी हैं, उन सबके भीतर इस वायुका निवास है। फिर वायु मूर्तिमान् हो गया। उसके वामाङ्गसे प्राणोंके समान प्यारी स्त्री प्रकट हो गयी। उससे पाँच पुत्र हुए, जो प्राणियोंके शरीरमें रहकर पञ्चप्राण कहलाते हैं। उनके नाम हैं—प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान। यों पाँच वायु और उनके पुत्र पाँच प्राण हुए। पसीनेके रूपमें जो जल बहा था, वही जलका अधिष्ठाता देवता वरुण हो गया। वरुणके बायें अङ्गसे उनकी पत्नी 'वरुणानी' प्रकट हुई।

उस समय श्रीकृष्णकी वह चिन्मयी शक्ति उनकी कृपासे गर्भस्थितिका अनुभव करने लगी। सौ मन्वन्तरतक ब्रह्मतेजसे उसका शरीर देदीप्यमान बना रहा। श्रीकृष्णके प्राणोंपर उस देवीका अधिकार था। श्रीकृष्ण प्राणोंसे भी बढ़कर उससे प्यार करते