भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

पृष्ठ 125, कुल 810 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 125

प्रकृतिखण्ड ११५

थी। वह सदा उनके साथ रहती थी। श्रीकृष्णका वक्षःस्थल ही उसका स्थान था। सौ मन्वन्तरका समय व्यतीत हो जानेपर उसने एक सुवर्णके समान प्रकाशमान बालक उत्पन्न किया। उसमें विश्वको धारण करनेकी समुचित योग्यता थी, किंतु उसे देखकर उस देवीका हृदय दुःखसे संतप्त हो उठा। उसने उस बालकको ब्रह्माण्ड-गोलकके अथाह जलमें छोड़ दिया। इसने बच्चेको त्याग दिया—यह देखकर देवेश्वर श्रीकृष्णने तुरंत उस देवीसे कहा—‘अरी कोपशीले! तूने यह जो बच्चेका त्याग कर दिया है, यह बड़ा घृणित कर्म है। इसके फलस्वरूप तू आजसे संतानहीना हो जा। यह बिलकुल निश्चित है। यही नहीं, किंतु तेरे अंशसे जो-जो दिव्य स्त्रियाँ उत्पन्न होंगी, वे सभी तेरे समान ही नूतन तारुण्यसे सम्पन्न रहनेपर भी संतानका मुख नहीं देख सकेंगी।’ इतनेमें उस देवीकी जीभके अग्रभागसे सहसा एक परम मनोहर कन्या प्रकट हो गयी। उसके शरीरका वर्ण शुक्ल था। वह श्वेतवर्णका ही वस्त्र धारण किये हुए थी। उसके दोनों हाथ वीणा और पुस्तकसे सुशोभित थे। सम्पूर्ण शास्त्रोंकी वह अधिष्ठात्री देवी रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित थी।

तदनन्तर कुछ समय व्यतीत हो जानेके पश्चात् वह मूल प्रकृतिदेवी दो रूपोंमें प्रकट हुई। आधे वाम-अङ्गसे ‘कमला’ का प्रादुर्भाव हुआ और दाहिनेसे ‘राधिका’ का। उसी समय श्रीकृष्ण भी दो रूप हो गये। आधे दाहिने अङ्गसे स्वयं ‘द्विभुज’ विराजमान रहे और बायें अङ्गसे ‘चार भुजावाले विष्णु’ का आविर्भाव हो गया। तब श्रीकृष्णने सरस्वतीसे कहा—‘देवी! तुम इन विष्णुकी प्रिया बन जाओ। मानिनी राधा यहाँ रहेंगी। तुम्हारा परम कल्याण होगा। इसी प्रकार संतुष्ट होकर श्रीकृष्णने लक्ष्मीको नारायणकी सेवामें उपस्थित होनेकी आज्ञा प्रदान की। फिर तो जगत्की व्यवस्थामें तत्पर रहनेवाले श्रीविष्णु उन सरस्वती और लक्ष्मी देवियोंके साथ वैकुण्ठ पधारे। मूल प्रकृतिरूपा राधाके अंशसे प्रकट होनेके कारण वे देवियाँ भी संतान प्रसव करनेमें असमर्थ रहीं। फिर नारायणके अङ्गसे चार भुजावाले अनेक पार्षद उत्पन्न हुए। सभी पार्षद गुण, तेज, रूप और अवस्थामें श्रीहरिके समान थे। लक्ष्मीके अङ्गसे उन्हीं-जैसे लक्षणोंसे सम्पन्न करोड़ों दासियाँ उत्पन्न हो गयीं।

मुनिवर नारद! इसके बाद गोलोकेश्वर भगवान् श्रीकृष्णके रोमकूपसे असंख्य गोप प्रकट हो गये। अवस्था, तेज, रूप, गुण, बल और पराक्रममें वे सभी श्रीकृष्णके समान ही प्रतीत होते थे। प्राणके समान प्रेमभाजन उन गोपोंको परम प्रभु श्रीकृष्णने अपना पार्षद बना लिया। ऐसे