भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 130
१२०संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

मेरे वक्षःस्थलपर विराजमान रहेगी। उसकी भी झाँकी तुम प्राप्त कर सकोगे। वत्स! अब मैं अपने गोलोकमें जाता हूँ। तुम यहीं ठहरो।

इस प्रकार उस बालकसे कहकर भगवान् श्रीकृष्ण अन्तर्धान हो गये और तत्काल वहाँ पहुँचकर उन्होंने सृष्टिकी व्यवस्था करनेवाले ब्रह्माको तथा संहारकार्यमें कुशल रुद्रको आज्ञा दी।

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—वत्स! सृष्टि रचनेके लिये जाओ। विधे! मेरी बात सुनो, महाविराट्के एक रोमकूपमें स्थित क्षुद्र विराट् पुरुषके नाभिकमलसे प्रकट होओ। फिर रुद्रको संकेत करके कहा—'वत्स महादेव! जाओ। महाभाग! अपने अंशसे ब्रह्माके ललाटसे प्रकट हो जाओ और स्वयं भी दीर्घकालतक तपस्या करो।'

नारद! जगत्पति भगवान् श्रीकृष्ण यों कहकर चुप हो गये। तब ब्रह्मा और कल्याणकारी शिव—दोनों महानुभाव उन्हें प्रणाम करके विदा हो गये। महाविराट् पुरुषके रोमकूपमें जो ब्रह्माण्ड-गोलकका जल है, उसमें वे महाविराट् पुरुष अपने अंशसे क्षुद्र विराट् पुरुष हो गये, जो इस समय भी विद्यमान हैं। इनकी सदा युवा अवस्था रहती है। इनका श्याम रंगका विग्रह है। ये पीताम्बर पहनते हैं। जलरूपी शय्यापर सोये रहते हैं। इनका मुखमण्डल मुस्कानसे सुशोभित है। इन प्रसन्नमुख विश्वव्यापी प्रभुको 'जनार्दन' कहा जाता है। इन्हींके नाभिकमलसे ब्रह्मा प्रकट हुए और उसके अन्तिम छोरका पता लगानेके लिये वे उस कमलदण्डमें एक लाख युगोंतक चक्कर लगाते रहे। नारद! इतना प्रयास करनेपर भी वे पद्मजन्मा ब्रह्मा पद्मनाभकी नाभिसे उत्पन्न हुए कमलदण्डके अन्ततक जानेमें सफल न हो सके। तब उनके मनमें चिन्ता घिर आयी। वे पुनः अपने स्थानपर आकर भगवान् श्रीकृष्णके चरण-कमलका ध्यान करने लगे। उस स्थितिमें उन्हें दिव्य दृष्टिके द्वारा क्षुद्र विराट् पुरुषके दर्शन प्राप्त हुए। ब्रह्माण्ड-गोलकके भीतर जलमय शय्यापर वे पुरुष शयन कर रहे थे। फिर जिनके रोमकूपमें वह ब्रह्माण्ड था, उन महाविराट् पुरुषके तथा उनके भी परम प्रभु भगवान् श्रीकृष्णके भी दर्शन हुए। साथ ही गोपों और गोपियोंसे सुशोभित गोलोकधामका भी दर्शन हुआ। फिर तो उन्होंने श्रीकृष्णकी स्तुति की और उनसे वरदान पाकर सृष्टिका कार्य आरम्भ कर दिया। सर्वप्रथम ब्रह्मासे सनकादि चार मानसपुत्र हुए। फिर उनके ललाटसे शिवके अंशभूत ग्यारह रुद्र प्रकट हुए। फिर क्षुद्र विराट् पुरुषके वामभागसे जगत्की रक्षाके व्यवस्थापक चार भुजाधारी भगवान् श्रीविष्णु प्रकट हुए। वे श्वेतद्वीपमें निवास करने लगे। क्षुद्र विराट् पुरुषके नाभिकमलमें प्रकट हुए ब्रह्माने विश्वकी रचना की। स्वर्ग, मर्त्य और पाताल—त्रिलोकीके सम्पूर्ण चराचर प्राणियोंका उन्होंने सृजन किया।

नारद! इस प्रकार महाविराट् पुरुषके सम्पूर्ण रोमकूपोंमें एक-एक करके अनेक ब्रह्माण्ड हुए। प्रत्येक ब्रह्माण्डमें एक क्षुद्र विराट् पुरुष, ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव आदि भी हैं। ब्रह्मन्! इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णके मङ्गलमय चरित्रका वर्णन कर दिया। यह सारभूत प्रसंग सुख एवं मोक्ष प्रदान करनेवाला है। ब्रह्मन्! अब तुम और क्या सुनना चाहते हो?

(अध्याय ३)