भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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प्रकृतिखण्ड १२१


सरस्वतीकी पूजाका विधान तथा कवच

नारदजीने कहा— भगवन्! आपके कृपा-प्रसादसे यह अमृतमयी सम्पूर्ण कथा मुझे सुननेको मिली है। अब आप इन प्रकृतिसंज्ञक देवियोंके पूजनका प्रसंग विस्तारके साथ बतानेकी कृपा कीजिये। किस पुरुषने किन देवीकी कैसे आराधना की है? मर्त्यलोकमें किस प्रकार उनकी पूजाका प्रचार हुआ? मुने! किस मन्त्रसे किनकी पूजा तथा किस स्तोत्रसे किनकी स्तुति की गयी है? किन देवियोंने किनको कौन-कौन-से वर दिये हैं? मुझे देवियोंके कवच, स्तोत्र, ध्यान, प्रभाव और पावन चरित्रके साथ-साथ उपर्युक्त सारी बातें बतानेकी कृपा कीजिये।

नारायण ऋषि बोले— नारद! गणेशजननी दुर्गा, राधा, लक्ष्मी, सरस्वती और सावित्री—ये पाँच देवियाँ सृष्टिकी पञ्चविध प्रकृति कही जाती हैं। इनकी पूजा और अद्भुत प्रभाव प्रसिद्ध है। इनका अमृतोपम चरित्र समस्त मङ्गलोंकी प्राप्तिका कारण है। ब्रह्मन्! जो प्रकृतिकी अंशभूता और कलास्वरूपा देवियाँ हैं, उनके पुण्य चरित्र तुम्हें बताता हूँ, सावधान होकर सुनो। इन देवियोंके नाम हैं—वाणी, वसुन्धरा, गङ्गा, षष्ठी, मङ्गलचण्डिका, तुलसी, मनसा, निद्रा, स्वधा, स्वाहा और दक्षिणा। ये तेज, रूप और गुणमें मेरी समानता करनेवाली हैं। इनके चरित्र पुण्यदायक तथा श्रवणसुखद हैं; जीवोंके कर्मोंका सुखद परिणाम प्रकट करनेवाले हैं। दुर्गा और राधाका चरित्र बहुत विस्तृत है। संक्षेपसे उसे पीछे कहूँगा। इस समय क्रमशः सुनो, मुनिवर! सर्वप्रथम भगवान् श्रीकृष्णने सरस्वतीकी पूजा की है, जिनके प्रसादसे मूर्ख भी पण्डित बन जाता है। इन कामस्वरूपिणी देवीने श्रीकृष्णको पानेकी इच्छा प्रकट की थी। ये सरस्वती सबकी माता कही जाती हैं। सर्वज्ञानी भगवान् श्रीकृष्णने इनका अभिप्राय समझकर सत्य, हितकर तथा परिणाममें सुख देनेवाले वचन कहे।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले— साध्वी! तुम नारायणकी सेवा स्वीकार करो। वे मेरे ही अंश हैं। उनकी चार भुजाएँ हैं। उन परम सुन्दर तरुण पुरुषमें मेरे ही समान सभी सद्गुण वर्तमान हैं। करोड़ों कामदेवोंके समान उनकी सुन्दरता है। वे कामिनियोंकी कामना पूर्ण करनेमें समर्थ हैं। मैं सबका स्वामी हूँ। सभी मेरा अनुशासन मानते हैं। किंतु राधाकी इच्छाका प्रतिबन्धक मैं नहीं हो सकता। कारण, वे तेज, रूप और गुण—सबमें मेरे समान हैं। सबको प्राण अत्यन्त प्रिय हैं, फिर मैं अपने प्राणोंकी अधिष्ठात्री देवी इन राधाका त्याग करनेमें कैसे समर्थ हो सकता हूँ? भद्रे! तुम वैकुण्ठ पधारो। तुम्हारे लिये वहीं रहना हितकर होगा। सर्वसमर्थ विष्णुको अपना स्वामी बनाकर दीर्घ कालतक आनन्दका अनुभव करो। तेज, रूप और गुणमें तुम्हारे ही समान उनकी एक पत्नी लक्ष्मी भी वहाँ हैं। लक्ष्मीमें काम, क्रोध, लोभ, मोह, मान और हिंसा—ये नाममात्र भी नहीं हैं। उनके साथ तुम्हारा समय सदा प्रेमपूर्वक सुखसे व्यतीत होगा। विष्णु तुम दोनोंका समानरूपसे सम्मान करेंगे। सुन्दरि! प्रत्येक ब्रह्माण्डमें माघ शुक्ल पञ्चमीके दिन विद्यारम्भके शुभ अवसरपर बड़े गौरवके साथ तुम्हारी विशाल पूजा होगी। मेरे वरके प्रभावसे आजसे लेकर प्रलयपर्यन्त प्रत्येक कल्पमें मनुष्य, मनुगण, देवता, मोक्षकामी प्रसिद्ध मुनिगण, वसु, योगी, सिद्ध, नाग, गन्धर्व और राक्षस—सभी बड़ी भक्तिके साथ सोलह प्रकारके उपचारोंके द्वारा तुम्हारी पूजा करेंगे। उन संयमशील जितेन्द्रिय पुरुषोंके द्वारा कण्वशाखामें कही हुई विधिके अनुसार तुम्हारा ध्यान और पूजन होगा। वे कलश अथवा पुस्तकमें तुम्हें आवाहित करेंगे। तुम्हारे कवचको भोजपत्रपर