भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 132
१२२संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

लिखकर उसे सोनेकी डिब्बीमें रख गन्ध एवं चन्दन आदिसे सुपूजित करके लोग अपने गलेमें अथवा दाहिनी भुजामें धारण करेंगे। पूजाके पवित्र अवसरपर विद्वान् पुरुषोंके द्वारा तुम्हारा सम्यक् प्रकारसे स्तुति-पाठ होगा।

इस प्रकार कहकर सर्वपूजित भगवान् श्रीकृष्णने देवी सरस्वतीकी पूजा की। तत्पश्चात् ब्रह्मा, विष्णु, शिव, अनन्त, धर्म, मुनीश्वर, सनकगण, देवता, मुनि, राजा और मनुगण—इन सबने भगवती सरस्वतीकी आराधना की। तबसे ये सरस्वती सम्पूर्ण प्राणियोंद्वारा सदा पूजित होने लगीं।

नारदजी बोले—वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ प्रभो! आप भगवती सरस्वतीकी पूजाका विधान, स्तवन, ध्यान, अभीष्ट कवच, पूजनोपयोगी नैवेद्य, फूल तथा चन्दन आदिका परिचय देनेकी कृपा कीजिये। इसे सुननेके लिये मेरे हृदयमें बड़ा कौतूहल हो रहा है।

मुनिवर भगवान् नारायणने कहा—नारद! सुनो। कण्वशाखामें कही हुई पद्धति बतलाता हूँ। इसमें जगन्माता सरस्वतीके पूजनकी विधि वर्णित है। माघ शुक्ल पञ्चमी विद्यारम्भकी मुख्य तिथि है। उस दिन पूर्वाह्नकालमें ही प्रतिज्ञा करके संयमशील एवं पवित्र हो, स्नान और नित्य-क्रियाके पश्चात् भक्तिपूर्वक कलशस्थापन करे। फिर नैवेद्य आदिसे निम्नाङ्कित छः देवताओंका पूजन करे। पहले गणेशका, फिर सूर्य, अग्नि, विष्णु, शिव और पार्वतीका पूजन करनेके पश्चात् इष्टदेवता सरस्वतीका पूजन करना उचित है। फिर ध्यान करके देवीका आवाहन करे। तदनन्तर व्रती रहकर षोडशोपचारसे भगवतीकी पूजा करे। सौम्य! पूजाके लिये जो-जो उपयोगी नैवेद्य वेदमें कथित हैं, उन्हें बताता हूँ—ताजा मक्खन, दही, दूध, धानका लावा, तिलके लड्डू, सफेद गन्ना और उसका रस, उसे पकाकर बनाया हुआ गुड़, स्वस्तिक (एक प्रकारका पकवान), शक्कर या मिश्री, सफेद धानका चावल जो टूटा न हो (अक्षत), बिना उबाले हुए धानका चिउड़ा, सफेद लड्डू, घी और सेंधा नमक डालकर तैयार किये गये व्यञ्जनके साथ शास्त्रोक्त हविष्यान्न, जौ अथवा गेहूँके आटेसे घृतमें तले हुए पदार्थ, पके हुए स्वच्छ केलेका पिष्टक, उत्तम अन्नको घृतमें पकाकर उससे बना हुआ अमृतके समान मधुर मिष्टान्न, नारियल, उसका पानी, कसेरू, मूली, अदरख, पका हुआ केला, बढ़िया बेल, बेरका फल, देश और कालके अनुसार उपलब्ध ऋतुफल तथा अन्य भी पवित्र स्वच्छ वर्णके फल—ये सब नैवेद्यके समान हैं।

मुने! सुगन्धित सफेद पुष्प, सफेद स्वच्छ चन्दन तथा नवीन श्वेत वस्त्र और सुन्दर शङ्ख देवी सरस्वतीको अर्पण करना चाहिये। श्वेत पुष्पोंकी माला और श्वेत भूषण भी भगवतीको चढ़ावे। महाभाग मुने! भगवती सरस्वतीका श्रेष्ठ ध्यान परम सुखदायी है तथा भ्रमका उच्छेद करनेवाला है। वह ध्यान यह है—

‘सरस्वतीका श्रीविग्रह शुक्लवर्ण है। ये परम सुन्दरी देवी सदा मुस्कराती रहती हैं। इनके परिपुष्ट विग्रहके सामने करोड़ों चन्द्रमाकी प्रभा भी तुच्छ है। ये विशुद्ध चिन्मय वस्त्र पहने हैं। इनके एक हाथमें वीणा है और दूसरेमें पुस्तक। सर्वोत्तम रत्नोंसे बने हुए आभूषण इन्हें सुशोभित कर रहे हैं। ब्रह्मा, विष्णु और शिव प्रभृति प्रधान देवताओं तथा सुरगणोंसे ये सुपूजित हैं। श्रेष्ठ मुनि, मनु तथा मानव इनके चरणोंमें मस्तक झुकाते हैं। ऐसी भगवती सरस्वतीको मैं भक्तिपूर्वक प्रणाम करता हूँ।’

इस प्रकार ध्यान करके विद्वान् पुरुष पूजनके समग्र पदार्थ मूलमन्त्रसे विधिवत् सरस्वतीको अर्पण कर दे। फिर कवचका पाठ करनेके पश्चात् दण्डकी भाँति भूमिपर पड़कर देवीको साष्टाङ्ग प्रणाम करे। मुने! जो पुरुष भगवती सरस्वतीको अपनी इष्ट देवी मानते हैं, उनके लिये यह