भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

पृष्ठ 133, कुल 810 में से

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प्रकृतिखण्ड

नित्यक्रिया है। बालकोंके विद्यारम्भके अवसरपर वर्षके अन्तमें माघ शुक्ला पञ्चमीके दिन सभीको इन सरस्वतीदेवीकी पूजा करनी चाहिये। 'श्रीं ह्रीं सरस्वत्यै स्वाहा' यह वैदिक अष्टाक्षर मूलमन्त्र परम श्रेष्ठ एवं सबके लिये उपयोगी है अथवा जिनको जिस मन्त्रके द्वारा उपदेश प्राप्त हुआ है, उनके लिये वही मूल-मन्त्र है। 'सरस्वती' इस शब्दके साथ चतुर्थी विभक्ति जोड़कर अन्तमें 'स्वाहा' शब्द लगा लेना चाहिये। इसके आदिमें लक्ष्मीका बीज ('श्रीं') और मायाबीज ('ह्रीं') लगावे। यह ('श्रीं ह्रीं सरस्वत्यै स्वाहा') मन्त्र साधकके लिये कल्पवृक्षरूप है। प्राचीनकालमें कृपाके समुद्र भगवान् नारायणने वाल्मीकि मुनिको इसीका उपदेश किया था। भारतवर्षमें गङ्गाके पावन तटपर यह कार्य सम्पन्न हुआ था। फिर सूर्यग्रहणके अवसरपर पुष्करक्षेत्रमें भृगुजीने शुक्रको इसका उपदेश किया था। मरीचिनन्दन कश्यपने चन्द्रग्रहणके समय प्रसन्न होकर बृहस्पतिको इसे बताया था। बदरी-आश्रममें परम प्रसन्न ब्रह्माने भृगुको इसका उपदेश दिया था। जरत्कारुमुनि क्षीरसागरके पास विराजमान थे। उन्होंने आस्तीकको यह मन्त्र पढ़ाया। बुद्धिमान् ऋष्यशृङ्गने मेरुपर्वतपर विभाण्डक मुनिसे इसकी शिक्षा प्राप्त की थी। शिवने आनन्दमें आकर गौतम तथा कणाद मुनिको इसका उपदेश किया था। याज्ञवल्क्य और कात्यायनने सूर्यकी दयासे इसे पाया था। महाभाग शेष पातालमें बलिके सभाभवनपर विराजमान थे। वहीं उन्होंने पाणिनि, बुद्धिमान् भारद्वाज और शाकटायनको इसका अभ्यास कराया था। चार लाख जप करनेपर मनुष्यके लिये यह मन्त्र सिद्ध हो सकता है। इस मन्त्रके सिद्ध हो जानेपर अवश्य ही मनुष्यमें बृहस्पतिके समान योग्यता प्राप्त हो सकती है।

विप्रेन्द्र! सरस्वतीका कवच विश्वपर विजय प्राप्त करानेवाला है। जगत्स्रष्टा ब्रह्माने गन्धमादन पर्वतपर भृगुके आग्रहसे इसे इन्हें बताया था, वही मैं तुमसे कहता हूँ, सुनो।

भृगुने कहा—ब्रह्मन्! आप ब्रह्मज्ञानीजनोंमें प्रमुख, पूर्ण ब्रह्मज्ञानसम्पन्न, सर्वज्ञ, सबके पिता, सबके स्वामी एवं सबके परम आराध्य हैं। प्रभो! आप मुझे सरस्वतीका 'विश्वजय' नामक कवच बतानेकी कृपा कीजिये। यह कवच मायाके प्रभावसे रहित, मन्त्रोंका समूह एवं परम पवित्र है।

ब्रह्माजी बोले—वत्स! मैं सम्पूर्ण कामना पूर्ण करनेवाला कवच कहता हूँ, सुनो। यह श्रुतियोंका सार, कानके लिये सुखप्रद, वेदोंमें प्रतिपादित एवं उनसे अनुमोदित है। रासेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण गोलोकमें विराजमान थे। वहीं वृन्दावनमें रासमण्डल था। रासके अवसरपर उन प्रभुने मुझे यह कवच सुनाया था। कल्पवृक्षकी तुलना करनेवाला यह कवच परम गोपनीय है। जिन्हें किसीने नहीं सुना है, वे अद्भुत मन्त्र इसमें सम्मिलित हैं। इसे धारण करनेके प्रभावसे ही भगवान् शुक्राचार्य सम्पूर्ण दैत्योंके पूज्य बन सके। ब्रह्मन्! बृहस्पतिमें इतनी बुद्धिका समावेश इस कवचकी महिमासे ही हुआ है। वाल्मीकि मुनि सदा इसका पाठ और सरस्वतीका ध्यान करते थे। अतः उन्हें कवीन्द्र कहलानेका सौभाग्य प्राप्त हो गया। वे भाषण करनेमें परम चतुर हो गये। इसे धारण करके स्वायम्भुव मनुने सबसे पूजा प्राप्त की। कणाद, गौतम, कण्व, पाणिनि, शाकटायन, दक्ष और कात्यायन—इस कवचको धारण करके ही ग्रन्थोंकी रचनामें सफल हुए। इसे धारण करके स्वयं कृष्णद्वैपायन व्यासदेवने वेदोंका विभागकर खेल-ही-खेलमें अखिल पुराणोंका प्रणयन किया। शातातप, संवर्त, वसिष्ठ, पराशर, याज्ञवल्क्य, ऋष्यशृङ्ग, भारद्वाज, आस्तीक, देवल, जैगीषव्य और जाबालिने इस कवचको धारण करके सबमें पूजित हो ग्रन्थोंकी रचना की थी।

विप्रेन्द्र! इस कवचके ऋषि प्रजापति हैं।

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