ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished810 पृष्ठ
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( १७ )
| विषय | पृष्ठ-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
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| शरीरमें अधिष्ठित होना तथा उनके आवेशसे उसका उठ बैठना और ज्ञानके पश्चात् नवीन वस्त्र धारणकर देवसमूह और ब्राह्मणदेवताको प्रणाम कर उनके सामने नृत्य और गान करना.................................... | ७४ | २०- लक्ष्मी, सरस्वती और गङ्गाके कलह और शापका मुख्य कारण सुनकर भगवान् हरि (विष्णु)-का उनसे समयानुकूल बातें कहना..... | १३० |
| ९- पुष्करतीर्थमें वसिष्ठजीद्वारा मालावतीको श्रीहरिके स्तोत्र, पूजन आदि तथा एक मन्त्रका उपदेश दिया जाना......................... | ७५ | २१- शतशृङ्ग पर्वतपर एक सहस्र दिव्य युगोंतक निराहार रहकर राधाकी तपस्यासे करुणासे द्रवित होकर श्रीकृष्णका उन्हें (अन्य लोगोंके लिये दुर्लभ) सारभूत वर देना...... | १३८ |
| १०- भगवान् शंकरद्वारा बाणासुरके समक्ष संसारपावननामक (शिव) कवचका कथन........ | ७८ | २२- भगवती पृथ्वी देवी .................................. | १४० |
| ११- एक हजार वर्षतक बिना कुछ खाये-पीये कठोर तपस्यामें तत्पर बालक नारदद्वारा ध्यानमें एक दिव्यलोकमें रत्नमय सिंहासनपर आसीन दिव्य बालक—नित्य नवकिशोरका दर्शन ..................................................... | ८४ | २३- तपस्यामें लीन भगीरथको गोपवेशमें भगवान् श्रीकृष्णका प्रत्यक्ष दर्शन .......................... | १४३ |
| १२- गङ्गाजीके तटपर पीपलवृक्षके नीचे बैठकर तप करते हुए गोपी-बालक नारदका ध्यानमें दर्शन देनेवाले दिव्यबालकके अन्तर्धान हो जानेपर रोने लगना............... | ८५ | २४- भगवती गङ्गाका ध्यान-चित्रण.................. | १४६ |
| १३- ब्रह्माजीका नारदको गृहस्थ-धर्मका महत्त्व बताते हुए उन्हें मनुवंशी सृञ्जयके घरमें उत्पन्न रत्नमाला (पूर्वजन्मकी पत्नी मालती)-से विवाह करनेके लिये राजी करना......... | ९० | २५- शिवजीके संगीतसे रासमण्डलमें श्रीकृष्ण और राधाका द्रवभागको प्राप्त होना.......... | १४७ |
| १४- अपनी चिन्मयी शक्तिद्वारा स्वर्गर्भसे उत्पन्न बालकको ब्रह्माण्ड-गोलकके अथाह जलमें छोड़ दिये जानेपर श्रीकृष्णका उसे संतानहीना हो जानेका शाप देना और उस (शक्ति) देवीकी जीभके अग्रभागसे सहसा वीणा-पुस्तकधारिणी एक मनोहर कन्याका प्रकट होना ...................................................... | ११५ | २६- ब्रह्माद्वारा भगवती राधाका स्तवन............ | १५३ |
| १५- गोलोकेश्वर भगवान् श्रीकृष्णके रोमकूपसे असंख्य गोपोंका प्रकट होना ...................... | ११५ | २७- वैकुण्ठमें विष्णुके समक्ष आकर शंकरका उन्हें श्रद्धापूर्वक प्रणाम करना तथा ब्रह्मा और अत्यन्त भयभीत सूर्यद्वारा शंकरको प्रणाम-निवेदन ....................................... | १५८ |
| १६- श्रीराधाके रोमकूपोंसे बहुत-सी गोप-कन्याओंका प्राकट्य ................................. | ११६ | २८- तुलसीका बदरीवनमें जाकर दीर्घकालतक कठोर तपस्या करना ............................... | १६३ |
| १७- श्रीकृष्णके शरीरसे आविर्भूत देवी दुर्गाका उनकी स्तुति करना तथा श्रीकृष्णका इन्हें रत्नमय सिंहासन प्रदान करना....................... | ११६ | २९- शङ्खचूड़ और तुलसीको ब्रह्माजीका आशीर्वादरूपमें विवाहकी आज्ञा देना ....... | १६८ |
| १८- विराट्मय बालकका श्रीकृष्णसे उनके चरणकमलोंमें अविचल भक्तिकी वर-याचना ....... | ११९ | ३०- विमानसे उतरकर शङ्खचूड़का भगवान्को भक्तिपूर्वक प्रणाम करना तथा शंकरजी, भद्रकाली और स्वामी कार्तिकेयका शङ्खचूड़को आशीर्वाद देना .................... | १७५ |
| १९- मुनिवर याज्ञवल्क्यका भगवती सरस्वतीको प्रणाम करना ............................................ | १२७ | ३१- तुलसीके वचन सुनकर शापके भयसे श्रीहरिका लीलापूर्वक अपना सुन्दर स्वरूप प्रकट कर देना ........................................ | १८३ |
| ३२- वैकुण्ठमें श्रीहरिका देवताओंको समझाकर लक्ष्मीदेवीसे क्षीरसमुद्रके यहाँ जाकर जन्म धारण करनेको स्वीकार करनेके लिये कहना ............................................... | २३९ | ||
| ३३- भगवती स्वाहाको श्रीकृष्णका प्रत्यक्ष दर्शन ..... | २४६ | ||
| ३४- पितरोंकी प्रार्थनापर ब्रह्माजीद्वारा मानसी कन्या (स्वधा)-को प्रकट करना तथा उसे पत्नीरूपमें पितरोंको सौंपना ................... | २४८ | ||
| ३५- दक्षिणासे यज्ञपुरुषका अपने-आपको स्वामी बनानेके लिये निवेदन ................................ | २५२ | ||
| ३६- देवी देवसेना (षष्ठी)-का प्रियव्रतसे अपनी पूजा कराने और करनेके लिये आदेश देना |