ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished810 पृष्ठ
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( १८ )
| विषय | पृष्ठ-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| तथा सुव्रतको उसे प्रदान करना....................... | २५५ | प्रणाम करना ......................................... | ३४९ |
| ३७- मनसा देवीका व्याकुल होकर शंकर, ब्रह्मा, श्रीहरि तथा कश्यपजीका स्मरण करना और उनके आनेपर मुनि जरत्कारुद्वारा स्तुति और प्रणाम करके आगमनका कारण पूछा जाना .................................... | २६२ | ५२- पुष्करमें तप करते हुए इन्द्रको श्रीविष्णुका प्रकट होकर मनोवाञ्छित वर, कवच और मन्त्र प्रदान करना ........................... | ३५५ |
| ३८- पुण्य वृन्दावनमें गोपाङ्गनाओंसे घिरे तथा राधाके साथ विहार करते समय दूध पीनेकी इच्छा जाग उठनेपर श्रीकृष्णद्वारा अपने वामपार्श्वसे सुरभी गौको प्रकट करना तथा सुदामाका रत्नमय पात्रमें उसका दूध दुहना ..... | २६६ | ५३- राजा कार्तवीर्यद्वारा—'युद्ध कीजिये अथवा मेरी अभीष्ट गौ समर्पित कीजिये' कहनेपर जमदग्निमुनिका उसे घर लौटने और सनातन धर्मकी रक्षा करनेके लिये निर्देश देना ....... | ३६४ |
| ३९- श्रीपार्वतीद्वारा शंकरजीसे श्रीराधाके प्रादुर्भाव एवं महत्त्व आदिका वर्णन करनेका निवेदन ...... | २६८ | ५४- माताद्वारा युद्ध न करनेका अनुरोध किये जानेपर भी भार्गव परशुरामकी इक्कीस बार पृथ्वीको क्षत्रियहीन करनेकी प्रतिज्ञा ......... | ३६६ |
| ४०- राजा उत्कल (सुयज्ञ)-का यज्ञ-अनुष्ठान ...... | २७३ | ५५- परशुरामका शिवजीसे अपना अभिप्राय प्रकट करना और शिवजीका उन्हें गुह्यमन्त्र और 'त्रैलोक्यविजय' कवच प्रदान करना ..... | ३७३ |
| ४१- ब्राह्मणद्वारा राजा उत्कल(सुयज्ञ)-को शाप ..... | २७४ | ५६- पुष्करमें परशुरामकी तपस्या और श्रीकृष्णसे वर प्राप्ति ........................................... | ३८३ |
| ४२- पुलह, पुलस्त्य, प्रचेता आदि मुनियोंका ब्राह्मणके पीछे-पीछे चलना तथा समझाना और एक स्थानपर ठहराकर नीतिकी बातें करना........................................... | २७४ | ५७- परशुरामका राजराजेश्वर कार्तवीर्यसे हितकारक, सत्य एवं नीतयुक्त वचन कहना ........... | ३८९ |
| ४३- राजा सुयज्ञको ब्राह्मण (सुतपा)-द्वारा सर्वदुर्लभ परमतत्त्वका उपदेश.................... | २७९ | ५८- परशुरामका कुपित होकर गणेशपर फरसेका प्रहार करना और उनका एक दाँत टूट जाना ................................................. | ४०७ |
| ४४- नित्य वैकुण्ठधाममें वनमालाधारी चतुर्भुज नारायणदेवका लक्ष्मी, सरस्वती, गङ्गा तथा तुलसी और सुनन्द, नन्द तथा कुमुद आदि पार्षदोंके साथ निवास ................................ | २८२ | ५९- परशुरामकी स्तुतिसे प्रसन्न होकर दुर्गाका उन्हें अभय वरदान देना .......................... | ४१४ |
| ४५- सुयज्ञद्वारा श्रीराधाका उत्कृष्ट मन्त्रजप करते हुए दुष्कर तपस्या तथा आकाशमें रथपर बैठी हुई परमेश्वरी श्रीराधाका उन्हें दर्शन..... | २८७ | ६०- आकाशवाणीसे प्रभावित हो देवीके वधके लिये उद्यत हुए कंसको वसुदेवजीका समझाना .............................................. | ४४८ |
| ४६- दिव्य सुन्दर गोलोकमें राजा सुयज्ञको रत्नसिंहासनपर विराजमान श्रीकृष्णका दर्शन ..... | २८८ | ६१- धर्म, ब्रह्मा तथा शिव आदि देवेश्वरगणद्वारा देवकीके गर्भमें स्थित परमेश्वरकी स्तुति...... | ४४९ |
| ४७- रासेश्वर श्रीकृष्णसहित श्रीराधाका ध्यान-चित्रण................................................... | २९० | ६२- भगवान् श्रीकृष्णका दिव्य रूप धारणकर देवकीके हृदय-कमलके कोशसे प्रकट होना तथा वसुदेवजीका अपनी पत्नी देवकीके साथ भक्तिभावसे उनकी स्तुति करना ...... | ४५१ |
| ४८- शिवजीका श्रीपार्वतीको पुण्यक-व्रतके अनुष्ठानके लिये प्रेरित करना .................... | ३१६ | ६३- वसुदेवजीका नन्दगाँवमें पहुँचकर शय्यापर यशोदाजीको निद्रित अवस्थामें देखकर तुरंत ही पुत्र (श्रीकृष्ण)-को शय्यापर सुलाकर तथा उनके बदले सुवर्णके समान गौर कान्तिवाली एक बालिकाको गोदमें लेकर मथुराके लिये प्रस्थान करना ......... | ४५३ |
| ४९- पार्वतीजीके निवेदन करनेपर शिवजीका प्रियतमा (पार्वती)-के साथ घरमें जाकर अपने पुत्रको देखना................................ | ३३५ | ६४- मायास्वरूपिणी बालिकाको लेकर पत्थरपर दे मारनेके लिये कंसका आगे बढ़ना तथा वसुदेव और देवकीका उसे समझाकर | |
| ५०- पार्वतीजीके कहनेपर शनैश्चरका गणेशपर दृष्टिपात करना तथा शिशुके मस्तकका धड़से अलग हो जाना ............................ | ३३९ | ||
| ५१- कार्तिकेयजीका श्रीपार्वतीको सिर झुकाकर |