ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्णजन्मखण्ड
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समर्पित कर देना चाहिये। उस समय इस प्रकार कहे—'परमेश्वर! वृक्षोंके बीजस्वरूप ये स्वादिष्ट और सुन्दर फल वंशकी वृद्धि करनेवाले हैं। आप इन्हें ग्रहण कीजिये।' आवाहित देवताओंमेंसे प्रत्येकका व्रती पुरुष पूजन करे। पूजनके पश्चात् भक्तिभावसे उन सबको तीन-तीन बार पुष्पाञ्जलि दे। सुनन्द, नन्द और कुमुद आदि गोप, गोपी, राधिका, गणेश, कार्तिकेय, ब्रह्मा, शिव, पार्वती, लक्ष्मी, सरस्वती, दिक्पाल, ग्रह, शेषनाग, सुदर्शनचक्र तथा श्रेष्ठ पार्षदगण—इन सबका पूजन करके समस्त देवताओंको पृथ्वीपर दण्डवत् प्रणाम करे। तदनन्तर ब्राह्मणोंको नैवेद्य देकर दक्षिणा दे तथा जन्माध्यायमें बतायी गयी कथाका भक्तिभावसे श्रवण करे। उस समय व्रती पुरुष रातमें कुशासनपर बैठकर जागता रहे। प्रातःकाल नित्यकर्म सम्पन्न करके श्रीहरिका सानन्द पूजन करे तथा ब्राह्मणोंको भोजन कराकर भगवन्नामोंका कीर्तन करे।
नारदजीने पूछा—वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ नारायण-देव! व्रतकालकी सर्वसम्मत वेदोक्त व्यवस्था क्या है? यह बताइये। साथ ही वेदार्थ तथा प्राचीन संहिताका विचार करके यह भी बतानेकी कृपा कीजिये कि व्रतमें उपवास एवं जागरण करनेसे क्या फल मिलता है अथवा उसमें भोजन कर लिया जाय तो कौन-सा पाप लगता है?
भगवान् नारायणने कहा—यदि आधी रातके समय अष्टमी तिथिका एक चौथाई अंश भी दृष्टिगोचर होता हो तो वही व्रतका मुख्य काल है। उसीमें साक्षात् श्रीहरिने अवतार ग्रहण किया है। वह जय और पुण्य प्रदान करती है; इसलिये 'जयन्ती' कही गयी है। उसमें उपवास-व्रत करके विद्वान् पुरुष जागरण करे। यह समय सबका अपवाद, मुख्य एवं सर्वसम्मत है, ऐसा वेदवेत्ताओंका कथन है। पूर्वकालमें ब्रह्माजीने भी ऐसा ही कहा था। जो अष्टमीको उपवास एवं जागरणपूर्वक व्रत करता है, वह करोड़ों जन्मोंमें उपार्जित पापोंसे छुटकारा पा जाता है; इसमें संशय नहीं है। सप्तमीविद्धा अष्टमीका यत्नपूर्वक त्याग करना चाहिये। रोहिणी नक्षत्रका योग मिलनेपर भी सप्तमीविद्धा अष्टमीको व्रत नहीं करना चाहिये; क्योंकि भगवान् देवकीनन्दन अविद्ध-तिथि एवं नक्षत्रमें अवतीर्ण हुए थे। यह विशिष्ट मङ्गलमय क्षण वेदों और वेदाङ्गोंके लिये भी गुप्त है। रोहिणी नक्षत्र बीत जानेपर ही व्रती पुरुषको पारणा करनी चाहिये। तिथिके अन्तमें श्रीहरिका स्मरण तथा देवताओंका पूजन करके की हुई पारणा पवित्र मानी गयी है। वह मनुष्योंके समस्त पापोंका नाश करनेवाली होती है। सम्पूर्ण उपवास-व्रतोंमें दिनको ही पारणा करनेका विधान है। वह उपवास-व्रतका अङ्गभूत, अभीष्ट फलदायक तथा शुद्धिका कारण है। पारणा न करनेपर फलमें कमी आती है। रोहिणीव्रतके सिवा दूसरे किसी व्रतमें रातको पारणा नहीं करनी चाहिये। महारात्रिको छोड़कर दूसरी रात्रिमें पारणा की जा सकती है। ब्राह्मणों और देवताओंकी पूजा करके पूर्वाह्नकालमें पारणा उत्तम मानी गयी है।
रोहिणी-व्रत सबको सम्मत है। उसका अनुष्ठान अवश्य करना चाहिये। यदि बुध अथवा सोमवारसे युक्त जयन्ती मिल जाय तो उसमें व्रत करके व्रती पुरुष गर्भमें वास नहीं करता है। यदि उदयकालमें किञ्चिन्मात्र कुछ अष्टमी हो और सम्पूर्ण दिन-रातमें नवमी हो तथा बुध, सोम एवं रोहिणी नक्षत्रका योग प्राप्त हो तो वह सबसे उत्तम व्रतका समय है। सैकड़ों वर्षोंमें भी ऐसा योग मिले या न मिले, कुछ कहा नहीं जा सकता। ऐसे उत्तम व्रतका अनुष्ठान करके व्रती पुरुष अपनी करोड़ों पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है। जो सम्पत्तिसे रहित भक्त मनुष्य हैं, वे व्रतसम्बन्धी उत्सवके बिना भी यदि केवल उपवासमात्र कर लें तो भगवान् माधव उनपर उतनेसे ही प्रसन्न हो जाते हैं। भक्तिभावसे भाँति-भाँतिके उपचार