ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 468, कुल 810 में से
संदर्भ में पढ़ें४५८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण चढ़ाने तथा रातमें जागरण करनेसे दैत्यशत्रु श्रीहरि जयन्ती-व्रतका फल प्रदान करते हैं। जो अष्टमी-व्रतके उत्सवमें धनका उपयोग करनेमें कंजूसी नहीं करता, उसे उत्तम फलकी प्राप्ति होती है। जो कंजूसी करता है, वह उसके अनुरूप ही फल पाता है। विद्वान् पुरुष अष्टमी और रोहिणीमें पारणा न करे; अन्यथा वह पारणा पूर्वकृत पुण्योंको तथा उपवाससे प्राप्त होनेवाले फलको भी नष्ट कर देती है, तिथि आठ गुने फलका नाश करती है और नक्षत्र चौगुने फलका। अतः प्रयत्नपूर्वक तिथि और नक्षत्रके अन्तमें पारणा करे। यदि महानिशा प्राप्त होनेपर तिथि और नक्षत्रका अन्त होता हो तो व्रती पुरुषको तीसरे दिन पारणा करनी चाहिये। आदि और अन्तके चार-चार दण्डको छोड़कर बीचकी तीन पहरवाली रात्रिको त्रियामा रजनी कहते हैं। उस रजनीके आदि और अन्तमें दो संध्याएँ होती हैं। जिनमेंसे एकको दिनादि या प्रातःसंध्या कहते हैं और दूसरीको दिनान्त या सायंसंध्या। शुद्धा जन्माष्टमी तिथिको जागरणपूर्वक व्रतका अनुष्ठान करके मनुष्य सौ जन्मोंके किये हुए पापोंसे छुटकारा पा जाता है। इसमें संशय नहीं है। जो मनुष्य शुद्धा जन्माष्टमीमें केवल उपवासमात्र करके रह जाता है, व्रतोत्सव या जागरण नहीं करता, वह अश्वमेध-यज्ञके फलका भागी होता है। श्रीकृष्णजन्माष्टमीके दिन भोजन करनेवाले नराधम घोर पापों और उनके भयानक फलोंके भागी होते हैं। जो उपवास करनेमें असमर्थ हो, वह एक ब्राह्मणको भोजन करावे अथवा उतना धन दे दे, जितनेसे वह दो बार भोजन कर ले अथवा प्राणायाम-मन्त्रपूर्वक एक सहस्र गायत्रीका जप करे। मनुष्य उस व्रतमें बारह हजार मन्त्रोंका यथार्थरूपसे जप करे तो और उत्तम है। वत्स नारद ! मैंने धर्मदेवके मुखसे जो कुछ सुना था, वह सब तुम्हें कह सुनाया। व्रत, उपवास और पूजाका जो कुछ विधान है और उसके न करनेपर जो कुछ दोष होता है; वह सब यहाँ बता दिया गया। (अध्याय ८) श्रीकृष्णकी अनिर्वचनीय महिमा, धरा और द्रोणकी तपस्या, अदिति और कद्रूका पारस्परिक शापसे देवकी तथा रोहिणीके रूपमें भूतलपर जन्म, हलधर और श्रीकृष्णके जन्मका उत्सव नारदजीने पूछा - भगवन् ! गोकुलमें यशोदाभवनके भीतर श्रीकृष्णको रखकर जब वसुदेवजीने अपने गृहको प्रस्थान किया, तब नन्दरायजीने किस प्रकार पुत्रोत्सव मनाया ? श्रीहरिने वहाँ रहकर क्या किया? वे कितने वर्षोंतक वहाँ रहे ? प्रभो ! आप उनकी बालक्रीड़ाका क्रमशः वर्णन कीजिये। पूर्वकालमें गोलोकमें श्रीराधाके साथ भगवान्ने जो प्रतिज्ञा की थी, वृन्दावनमें उस प्रतिज्ञाका निर्वाह उन्होंने किस प्रकार किया ? प्रभो ! उस समय भूतलपर वृन्दावनका स्वरूप कैसा था ? उनका रासमण्डल कैसा था ? यह सब बताइये। रासक्रीड़ा और जलक्रीड़ाका विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये। नन्दने कौन-सी तपस्या की थी ? यशोदा और रोहिणीने कौन-सा तप किया था ? श्रीहरिसे पहले हलधरका जन्म कहाँ हुआ था? श्रीहरिका अपूर्व आख्यान अमृतखण्डके समान माना गया है। विशेषतः कविके मुखमें श्रीहरिचरित्रमय काव्य पद-पदपर नूतन प्रतीत होता है। आप अपने रासमण्डलकी क्रीड़ाका स्वयं ही वर्णन कीजिये। काव्यमें परोक्ष वस्तुका वर्णन होता है। परंतु जहाँ प्रत्यक्ष देखी हुई वस्तुका वर्णन हो, उसे उत्तम कहा गया