ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
६७- श्रीकृष्णके पैरोंके आघातसे शकटका चूर-चूर होना तथा उसकी बिखरी हुई लकड़ियोंके भीतर दबे बालक (श्रीकृष्ण)-को यशोदाजीका गोदमें उठा लेना
४५८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण चढ़ाने तथा रातमें जागरण करनेसे दैत्यशत्रु श्रीहरि जयन्ती-व्रतका फल प्रदान करते हैं। जो अष्टमी-व्रतके उत्सवमें धनका उपयोग करनेमें कंजूसी नहीं करता, उसे उत्तम फलकी प्राप्ति होती है। जो कंजूसी करता है, वह उसके अनुरूप ही फल पाता है। विद्वान् पुरुष अष्टमी और रोहिणीमें पारणा न करे; अन्यथा वह पारणा पूर्वकृत पुण्योंको तथा उपवाससे प्राप्त होनेवाले फलको भी नष्ट कर देती है, तिथि आठ गुने फलका नाश करती है और नक्षत्र चौगुने फलका। अतः प्रयत्नपूर्वक तिथि और नक्षत्रके अन्तमें पारणा करे। यदि महानिशा प्राप्त होनेपर तिथि और नक्षत्रका अन्त होता हो तो व्रती पुरुषको तीसरे दिन पारणा करनी चाहिये। आदि और अन्तके चार-चार दण्डको छोड़कर बीचकी तीन पहरवाली रात्रिको त्रियामा रजनी कहते हैं। उस रजनीके आदि और अन्तमें दो संध्याएँ होती हैं। जिनमेंसे एकको दिनादि या प्रातःसंध्या कहते हैं और दूसरीको दिनान्त या सायंसंध्या। शुद्धा जन्माष्टमी तिथिको जागरणपूर्वक व्रतका अनुष्ठान करके मनुष्य सौ जन्मोंके किये हुए पापोंसे छुटकारा पा जाता है। इसमें संशय नहीं है। जो मनुष्य शुद्धा जन्माष्टमीमें केवल उपवासमात्र करके रह जाता है, व्रतोत्सव या जागरण नहीं करता, वह अश्वमेध-यज्ञके फलका भागी होता है। श्रीकृष्णजन्माष्टमीके दिन भोजन करनेवाले नराधम घोर पापों और उनके भयानक फलोंके भागी होते हैं। जो उपवास करनेमें असमर्थ हो, वह एक ब्राह्मणको भोजन करावे अथवा उतना धन दे दे, जितनेसे वह दो बार भोजन कर ले अथवा प्राणायाम-मन्त्रपूर्वक एक सहस्र गायत्रीका जप करे। मनुष्य उस व्रतमें बारह हजार मन्त्रोंका यथार्थरूपसे जप करे तो और उत्तम है। वत्स नारद ! मैंने धर्मदेवके मुखसे जो कुछ सुना था, वह सब तुम्हें कह सुनाया। व्रत, उपवास और पूजाका जो कुछ विधान है और उसके न करनेपर जो कुछ दोष होता है; वह सब यहाँ बता दिया गया। (अध्याय ८) श्रीकृष्णकी अनिर्वचनीय महिमा, धरा और द्रोणकी तपस्या, अदिति और कद्रूका पारस्परिक शापसे देवकी तथा रोहिणीके रूपमें भूतलपर जन्म, हलधर और श्रीकृष्णके जन्मका उत्सव नारदजीने पूछा - भगवन् ! गोकुलमें यशोदाभवनके भीतर श्रीकृष्णको रखकर जब वसुदेवजीने अपने गृहको प्रस्थान किया, तब नन्दरायजीने किस प्रकार पुत्रोत्सव मनाया ? श्रीहरिने वहाँ रहकर क्या किया? वे कितने वर्षोंतक वहाँ रहे ? प्रभो ! आप उनकी बालक्रीड़ाका क्रमशः वर्णन कीजिये। पूर्वकालमें गोलोकमें श्रीराधाके साथ भगवान्ने जो प्रतिज्ञा की थी, वृन्दावनमें उस प्रतिज्ञाका निर्वाह उन्होंने किस प्रकार किया ? प्रभो ! उस समय भूतलपर वृन्दावनका स्वरूप कैसा था ? उनका रासमण्डल कैसा था ? यह सब बताइये। रासक्रीड़ा और जलक्रीड़ाका विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये। नन्दने कौन-सी तपस्या की थी ? यशोदा और रोहिणीने कौन-सा तप किया था ? श्रीहरिसे पहले हलधरका जन्म कहाँ हुआ था? श्रीहरिका अपूर्व आख्यान अमृतखण्डके समान माना गया है। विशेषतः कविके मुखमें श्रीहरिचरित्रमय काव्य पद-पदपर नूतन प्रतीत होता है। आप अपने रासमण्डलकी क्रीड़ाका स्वयं ही वर्णन कीजिये। काव्यमें परोक्ष वस्तुका वर्णन होता है। परंतु जहाँ प्रत्यक्ष देखी हुई वस्तुका वर्णन हो, उसे उत्तम कहा गया
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ४५९ है। साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण योगीन्द्रोंके गुरुके भी गुरु हैं। जो जिसका अंश होता है, वह उस अंशीके सुखसे सुखी होता है। प्रभो! आपने ही यह वर्णन किया है कि आप दोनों नर और नारायण श्रीहरिके चरणोंमें विलीन हो गये थे। उनमें भी आप ही साक्षात् गोलोकके अंश हैं; अतः उनके समान ही महान् हैं (इसीलिये श्रीकृष्णलीलाएँ आपके प्रत्यक्ष अनुभवमें आयी हुई हैं; अतः आप उनका वर्णन कीजिये)। भगवान् नारायण बोले-नारद! ब्रह्मा, शिव, शेष, गणेश, कूर्म, धर्म, मैं, नर तथा कार्तिकेय-ये नौ श्रीकृष्णके अंश हैं। अहो! उन गोलोकनाथकी महिमाका कौन वर्णन कर सकता है? जिन्हें स्वयं हम भी नहीं जानते और न वेद ही जानते हैं। फिर दूसरे विद्वान् क्या जान सकते हैं? शूकर, वामन, कल्कि, बुद्ध, कपिल और मत्स्य-ये भी श्रीकृष्णके अंश हैं तथा अन्य कितने ही अवतार हैं, जो श्रीकृष्णकी कलामात्र हैं। नृसिंह, राम तथा श्वेतद्वीपके स्वामी विराट् विष्णु पूर्ण अंशसे सम्पन्न हैं। श्रीकृष्ण परिपूर्णतम परमात्मा हैं। वे स्वयं ही वैकुण्ठ और गोकुलमें निवास करते हैं। वैकुण्ठमें वे कमलाकान्त कहे गये हैं और रूप-भेदसे चतुर्भुज हैं। गोलोक और गोकुलमें ये द्विभुज श्रीकृष्ण स्वयं ही राधाकान्त कहलाते हैं। योगी पुरुष इन्हींके तेजको सदा अपने चित्तमें धारण करते हैं। भक्त पुरुष इन्हीं भगवान्के तेजोमय चरणारविन्दका चिन्तन करते हैं। भला, तेजस्वीके बिना तेज कहाँ रह सकता है? ब्रह्मन्! सुनो। मैं तुमसे यशोदा, नन्द और रोहिणीके तपका वर्णन करता हूँ, जिसके कारण उन्होंने श्रीहरिका मुँह देखा था। वसुओंमें श्रेष्ठ तपोधन द्रोण नन्द नामसे इस धरातलपर अवतीर्ण हुए थे। उनकी पत्नी जो तपस्विनी धरा थीं, वे ही सती-साध्वी यशोदा हुई थीं। सर्पोंको जन्म देनेवाली नागमाता कद्रू ही रोहिणी बनकर भूतलपर प्रकट हुई थीं। इनके जन्म और चरित्रका वर्णन करता हूँ, सुनो। एक समयकी बात है, पुण्यदायक भारतवर्षमें गौतम-आश्रमके समीप गन्धमादन पर्वतपर धरा और द्रोणने तपस्या आरम्भ की। मुने! उनकी तपस्याका उद्देश्य था- भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन। सुप्रभाके निर्जन तटपर दस हजार वर्षोंतक वे वसु-दम्पति तपस्यामें लगे रहे, परंतु उन्हें श्रीहरिके दर्शन नहीं हुए। तब वे दोनों वैराग्यवश अग्निकुण्डका निर्माण करके उसमें प्रवेश करनेको उद्यत हो गये। उन दोनोंको मरनेके लिये उत्सुक देख वहाँ आकाशवाणी हुई- 'वसुश्रेष्ठ! तुम दोनों दूसरे जन्ममें भूतलपर अवतीर्ण हो गोकुलमें अपने पुत्रके रूपमें श्रीहरिके दर्शन करोगे; योगियोंको भी उन भगवान्का दर्शन होना अत्यन्त कठिन है। बड़े-बड़े विद्वानोंके लिये भी ध्यानके द्वारा उन्हें वशमें कर पाना असम्भव है। वे ब्रह्मा आदि देवताओंके भी वन्दनीय हैं।' यह सुनकर धरा और द्रोण सुखपूर्वक अपने घरको चले गये और भारतवर्षमें जन्म लेकर उन्होंने श्रीहरिके मुखारविन्दके दर्शन किये। इस प्रकार यशोदा और नन्दका चरित तुमसे कहा गया; अब देवताओंके लिये भी परम गोपनीय रोहिणीका चरित्र सुनो। एक समय देवमाता अदिति ऋतुमती होनेपर समस्त शृङ्गारोंसे सुसज्जित हो अपने पतिदेव श्रीकश्यपजीसे मिलना चाहा। उस समय कश्यपजी अपनी दूसरी पत्नी सर्पमाता कद्रूके पास थे। कश्यपजीके आनेमें विलम्ब होनेपर अदितिको बहुत क्षोभ हुआ और उन्होंने कद्रूको शाप दे दिया कि 'वे स्वर्गलोकको त्यागकर मानव-योनिको प्राप्त हों।' इस बातको सुनकर कद्रूने भी अदितिको शाप दिया कि 'वे जरायुक्त होकर मर्त्यलोकमें मानव-योनिमें जायँ।' इस प्रकार दोनोंके शापग्रस्त होनेपर कश्यपजीने कद्रूको सान्त्वना देकर समझाया कि 'तुम मेरे
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साथ मर्त्यलोकमें जाकर श्रीहरिके मुखकमलका दर्शन प्राप्त करोगी।' तदनन्तर कश्यपजीने अदितिके घर जाकर उनकी इच्छा पूर्ण की। उसी ऋतुसे देवराजका जन्म हुआ। इसके बाद अदितिने देवकीके रूपमें, कद्रूने रोहिणीके रूपमें और कश्यपजीने श्रीकृष्णके पिता श्रीवसुदेवजीके रूपमें जन्म ग्रहण किया।
मुने! यह सारा गोपनीय रहस्य बताया गया। अब अनन्त, अप्रमेय तथा सहस्रों मस्तकवाले भगवान् बलदेवजीके जन्मका वृत्तान्त सुनो। साध्वि! रोहिणी वसुदेवजीकी प्रेयसी भार्या थीं। मुने! वे वसुदेवजीकी आज्ञासे संकर्षणकी रक्षाके लिये गोकुलमें चली गयीं। कंससे भयभीत होनेके कारण उन्हें वहाँसे पलायन करना पड़ा था। उन दिनों योगमायाने श्रीकृष्णकी आज्ञासे देवकीके सातवें गर्भको रोहिणीके उदरमें स्थापित कर दिया था। उस गर्भको स्थापित करके वे देवी तत्काल कैलासपर्वतको चली गयीं। कुछ दिनोंके बाद रोहिणी नन्दभवनमें श्रीकृष्णके अंशस्वरूप पुत्रको जन्म दिया। उसकी अङ्गकान्ति तपाये हुए सुवर्णके समान गौर थी। वह बालक साक्षात् ईश्वर था। उसके मुखपर मन्द हास्यकी मनोहर छटा एवं प्रसन्नता छा रही थी। वह ब्रह्मतेजसे प्रकाशित हो रहा था। उसके जन्ममात्रसे देवताओंमें आनन्द छा गया। स्वर्गलोकमें दुन्दुभि, आनक और मुरज आदि दिव्य वाद्य बज उठे। आनन्दमग्न हुए देवता शङ्खध्वनिके साथ जय-जयकार करने लगे। नन्दका हृदय हर्षसे उल्लसित हो उठा। उन्होंने ब्राह्मणोंको बहुत-सा धन दिया। धायने आकर बालककी नाल काटी और उसे नहलाया। समस्त आभूषणोंसे विभूषित गोपियाँ जय-जयकार करने लगीं। उस पराये पुत्रके लिये भी नन्दने बड़े आदरके साथ महान् उत्सव मनाया। यशोदाजीने गोपियों तथा ब्राह्मणियोंको प्रसन्नतापूर्वक धन दान किया। नाना प्रकारके द्रव्य, सिन्दूर एवं तैल प्रदान किये।
वत्स! इस प्रकार मैंने तुमसे नन्द और यशोदाके तपका प्रसङ्ग कहा, हलधरके जन्मकी कथा कही तथा रोहिणीजीके चरित्रको सुनाया है। अब तुम्हें जो अभीष्ट है, वह नन्दपुत्रोत्सवका प्रसङ्ग सुनो। वह सुखदायक, मोक्षदायक तथा जन्म, मृत्यु और जरावस्थाका निवारण करनेवाला सारतत्त्व है। श्रीकृष्णका मङ्गलमय चरित्र वैष्णवोंका जीवन है। वह समस्त अशुभोंका विनाशक तथा श्रीहरिके दास्यभावको देनेवाला है।
वसुदेवजीने श्रीकृष्णको नन्दभवनमें रख दिया और उनकी कन्याको गोदमें लेकर वे हर्षपूर्वक अपने घरको लौट आये। यह प्रसङ्ग तथा उस कन्याका श्रवणसुखद चरित्र पहले कहा जा चुका है। अब गोकुलमें जो श्रीकृष्णकी मङ्गलमयी लीला प्रकट हुई, उसे बताता हूँ, सुनो। जब वसुदेवजी अपने घरको लौट गये, तब जया तिथि अष्टमीसे युक्त उस विजयपूर्ण मङ्गलमय सूतिकागारमें नन्द और यशोदाने देखा—उनका पुत्र धरतीपर पड़ा हुआ है। उसके श्रीअङ्गोंसे नवीन मेघमालाके समान तेजःपुञ्जमयी श्यामकान्ति प्रस्फुटित हो रही है। वह नग्न बालक बड़ा सुन्दर दिखायी देता था। उसकी दृष्टि गृहके शिखरभागकी ओर लगी हुई थी। उसका मुख शरत्कालकी पूर्णिमाके चन्द्रमाको लज्जित कर रहा था। दोनों नेत्र नील कमलकी शोभाको छीने लेते थे। वह कभी रोता था और कभी हँसने लगता था। उसके श्रीअङ्गोंमें धूलिके कण लगे हुए थे। उसके दोनों हाथ धरतीपर टिके हुए थे और युगल चरणारविन्द प्रेमके पुञ्ज-से जान पड़ते थे। उस दिव्य बालक श्रीहरिको देखकर पत्नीसहित नन्दको बड़ी प्रसन्नता हुई। धायने ठंडे जलसे बालकको नहलाया और उसकी नाल काट दी। उस समय गोपियाँ हर्षसे जय-जयकार करने लगीं। व्रजकी सारी गोपिकाएँ, बालिका और युवतियाँ भी ब्राह्मणपत्नियोंके साथ सूतिकागारमें आयीं। उन सबने आकर बालकको
६८- शिष्योंसहित मुनि गर्गका आगमन तथा यशोदाद्वारा उनका सत्कार और श्रीकृष्णको उन्हें प्रणाम करवाना
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ४६१
देखा और प्रसन्नतापूर्वक उसे आशीर्वाद दिया। नन्दनन्दनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करती हुई वे उन्हें अपनी गोदमें ले लेती थीं। उनमेंसे कितनी ही गोपियाँ रातमें वहीं रह गयीं।
नन्दने वस्त्रसहित स्नान करके धुली हुई धोती और चादर धारण की। फिर प्रसन्नचित्त हो वहाँ परम्परागत विधिका पालन किया। ब्राह्मणोंको भोजन कराया, उनसे मङ्गलपाठ करवाया, नाना प्रकारके बाजे बजवाये और वन्दीजनोंको धन-दान किया। तत्पश्चात् नन्दने आनन्दपूर्वक ब्राह्मणोंको धन दिया तथा उत्तम रत्न, मूँगे और हीरे भी आदरपूर्वक उन्हें दिये। मुने! तिलोंके सात पर्वत, सुवर्णके सौ ढेर, चाँदी, धान्यकी पर्वतोपम राशि, वस्त्र, सहस्रों मनोरम गौएँ, दही, दूध, शक्कर, माखन, घी, मधु, मिठाई, लड्डू, स्वादिष्ट मोदक, सब प्रकारकी खेतीसे भरी-पूरी भूमि, वायुके समान वेगशाली घोड़े, पान और तेल—इन सबका दान करके नन्दजी बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने सूतिकागारकी रक्षाके लिये ब्राह्मणोंको नियुक्त किया। मन्त्रज्ञ मनुष्यों तथा बड़ी-बूढ़ी गोपियोंको लगाया। उन्होंने ब्राह्मणोंद्वारा वेदोंका पाठ कराया। एकमात्र मङ्गलमय हरिनामका कीर्तन कराया तथा देवताओंकी पूजा करवायी। युवती तथा बड़ी-बूढ़ी ब्राह्मणपत्नियाँ बालक-बालिकाओंको साथ ले मुस्कराती हुई नन्दभवनमें आयीं। नन्दरायजीने उनको भी नाना प्रकारके धन और रत्न दिये। रत्नमय अलंकारोंसे विभूषित बड़ी-बूढ़ी गोपियाँ भी मुस्कराती हुई तीव्र गतिसे नन्द-मन्दिरमें आयीं। उन्हें बहुत-से वस्त्र, चाँदी और सहस्रों गौएँ सादर अर्पित कीं। ज्योतिष-शास्त्रके विशेषज्ञ विविध ज्योतिषी, जिनकी वाणी सिद्ध थी, हाथमें पुस्तकें लिये नन्दमन्दिरमें पधारे। नन्दजीने उन्हें नमस्कार करके प्रसन्नतापूर्वक उनके सामने विनय प्रकट की। उन सबने आशीर्वाद दिये और उत्तम बालकको देखा। इस प्रकार व्रजराज नन्दने सामग्री एकत्र करके पुत्रोत्सव मनाया और ज्योतिषियोंद्वारा शुभाशुभ भविष्यका प्रकाशन कराया। तदनन्तर वह बालक नन्दभवनमें शुक्ल पक्षके चन्द्रमाकी भाँति दिनोंदिन बढ़ने लगा। श्रीकृष्ण और हलधर दोनों ही माताका स्तन-पान करते थे। मुने! वहाँ नन्दके पुत्रोत्सवमें प्रसन्न हुई रोहिणी देवीने आयी हुई स्त्रियोंको प्रसन्नतापूर्वक तैल, सिन्दूर और ताम्बूल प्रदान किये। वे सब बालकके सिरपर आशीर्वाद दे अपने-अपने घरको चली गयीं। केवल यशोदा, रोहिणी और नन्द—ये ही उस घरमें हर्षपूर्वक रहे।
(अध्याय ९)
४६२ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
आकाशवाणी सुनकर कंसका पूतनाको गोकुलमें भेजना, पूतनाका श्रीकृष्णके मुखमें विषमिश्रित स्तन देना और प्राणोंसे हाथ धोकर श्रीकृष्णकी कृपासे माताकी गतिको प्राप्त हो गोलोकमें जाना
भगवान् नारायण कहते हैं—नारद! एक दिन राजसभामें स्वर्णसिंहासनपर बैठे हुए कंसको बड़ी मधुर आकाशवाणी सुनायी दी—'ओ महामूढ़ नरेश! क्या कर रहा है ? अपने कल्याणका उपाय सोच। तेरा काल धरतीपर उत्पन्न हो चुका है। वसुदेवने मायासे तेरे शत्रुभूत बालकको नन्दके हाथमें दे दिया और उनकी कन्या लाकर तुझे सौंप दी। यह कन्या मायाका अंश है और वसुदेवके पुत्रके रूपमें साक्षात् श्रीहरि अवतीर्ण हुए हैं। वे ही तेरे प्राणहन्ता हैं। इस समय गोकुलके नन्द-मन्दिरमें उनका पालन-पोषण हो रहा है। देवकीका सातवाँ गर्भ भी स्खलित या मृत नहीं हुआ है। योगमायाने उस गर्भको रोहिणीके उदरमें स्थापित कर दिया था। उस गर्भसे शेषके अंशभूत महाबली बलदेवजी प्रकट हुए हैं। श्रीकृष्ण और बलभद्र—दोनों तेरे काल हैं और इस समय गोकुलके नन्दभवनमें पल रहे हैं।'
वह आकाशवाणी सुनकर राजा कंसका मस्तक झुक गया। उसे सहसा बड़ी भारी चिन्ता प्राप्त हुई। उसने अनमने होकर आहारको भी त्याग दिया और प्राणोंसे भी बढ़कर प्रेयसी बहिन सती-साध्वी पूतनाको बुलाकर उस नीतिज्ञ नरेशने भरी सभामें इस प्रकार कहा।
**कंस बोला—**पूतने! मेरे कार्यकी सिद्धिके लिये गोकुलके नन्द-मन्दिरमें जाओ और अपने एक स्तनको विषसे ओतप्रोत करके शीघ्र ही नन्दके नवजात शिशुके मुखमें दे दो। वत्से! तुम मनके समान वेगसे चलनेवाली मायाशास्त्रमें निपुण और योगिनी हो। अतः मायासे मानवी रूप धारण करके तुम वहाँ जाओ। सुप्रतिष्ठे! तुम दुर्वासासे महामन्त्रकी दीक्षा लेकर सर्वत्र जाने और सब प्रकारका रूप धारण करनेमें समर्थ हो।
नारद! ऐसा कहकर महाराज कंस उस राजसभामें चुप हो रहा। इधर स्वेच्छाचारिणी पूतना कंसको प्रणाम करके वहाँसे चल दी। उसने परम सुन्दरी नारीका रूप धारण कर लिया। उसकी अङ्गकान्ति तपाये हुए सुवर्णके समान प्रकाशित हो रही थी। वह अनेक प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित थी और मस्तकपर मालतीकी मालासे अलंकृत केशपाश धारण किये हुए थी। उसके ललाटमें कस्तूरीकी बेंदीसे युक्त सिन्दूरकी रेखा शोभा पा रही थी। पैरोंमें मञ्जीर और कटिभागमें करधनीकी मधुर झनकार फैल रही थी। ब्रजमें पहुँचकर पूतनाने मनोहर नन्द-भवनपर दृष्टिपात किया। वह दुर्लङ्घ्य एवं गहरी खाइयोंसे घिरा हुआ था। साक्षात् विश्वकर्माने दिव्य प्रस्तरोंद्वारा उसका निर्माण किया था। इन्द्रनील, मरकत और पद्मराग मणियोंसे उस भव्य भवनकी बड़ी शोभा हो रही थी। सोनेके दिव्य कलश और चित्रित शुभ्र शिखर उस नन्द-मन्दिरकी शोभा बढ़ाते थे। चार द्वारोंसे समलंकृत गगनचुम्बी परकोटे उस भवनके आभूषण थे। उसमें लोहेके किवाड़ लगे हुए थे। द्वारोंपर द्वारपाल पहरा दे रहे थे। वह परम सुन्दर एवं रमणीय भवन सुन्दरी गोपाङ्गनाओंसे आवेष्टित था। मोती, माणिक्य, पारसमणि तथा रत्नादि वैभवोंसे भरे हुए उस भव्य भवनमें सुवर्णमय पात्र और घट भारी संख्यामें दिखायी दे रहे थे। करोड़ों गौएँ उस भवनके द्वारकी शोभा बढ़ा रही थीं। लाखों ऐसे गोपकिङ्कर वहाँ विद्यमान थे, जिनका भरण-पोषण नन्दभवनसे ही होता था। विभिन्न कार्योंमें लगी हुई सहस्रों दासियाँ उस भवनकी शोभा बढ़ा रही थीं। सुन्दरी
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ४६३
पूतनाने अत्यन्त मनोहर वेष धारण करके मन्द मुस्कानकी छटा बिखेरते हुए नन्द-मन्दिरमें प्रवेश किया। उसे महलमें प्रवेश करती देख वहाँकी गोपियोंने उसका बहुत आदर किया। वे सोचने लगीं—'ये कमलालया लक्ष्मी अथवा साक्षात् दुर्गा ही तो नहीं हैं, जो साक्षात् श्रीकृष्णका दर्शन करनेके लिये यहाँ पधारी हैं।' गोपियों और गोपोंने उसे प्रणाम किया और कुशल-समाचार पूछा। उसे बैठनेके लिये सिंहासन दिया और पैर धोनेके लिये जल अर्पित किया। पूतनाने भी गोपबालकोंका कुशल-मङ्गल पूछा। वह सुन्दरी वहाँ मुस्कराती हुई सिंहासनपर बैठ गयी। उसने बड़े आदरके साथ गोपियोंका दिया हुआ पाद्य-जल ग्रहण किया। तब सब गोपियोंने पूछा—'स्वामिनि! तुम कौन हो? इस समय तुम्हारा निवास कहाँ है? तुम्हारा नाम क्या है? और यहाँ पधारनेका प्रयोजन क्या है? यह बताओ।'
उन गोपियोंका यह वचन सुनकर वह भी मनोहर वाणीमें बोली—''मैं मथुराकी रहनेवाली गोपी हूँ। इस समय एक ब्राह्मणकी भार्या हूँ। मैंने संदेशवाहकके मुखसे यह मङ्गलसूचक संवाद सुना है कि 'वृद्धावस्थामें नन्दरायजीके यहाँ महान् पुत्रका जन्म हुआ है।' यह सुनकर मैं उस पुत्रको देखने और उसे अभीष्ट आशीर्वाद देनेके लिये यहाँ आयी हूँ। अब तुमलोग नन्द-नन्दनको यहाँ ले आओ। मैं उसे देखूँगी और आशीर्वाद देकर चली जाऊँगी?''
ब्राह्मणीका यह वचन सुनकर यशोदाजीका हृदय हर्षसे खिल उठा। उन्होंने बेटेसे प्रणाम करवाकर उसे उस ब्राह्मणीकी गोदमें दे दिया। बालकको गोदमें लेकर उस सतीसाध्वी पुण्यवती पूतनाने बारंबार उसका मुँह चूमा और सुखपूर्वक बैठकर श्रीहरिके मुखमें उसने अपना स्तन दे दिया। साथ ही वह बोली—'गोपसुन्दरि! तुम्हारा यह सुन्दर बालक अत्यन्त अद्भुत है। यह गुणोंमें साक्षात् भगवान् नारायणके समान है।' श्रीकृष्ण उस विषैले स्तनको पीकर उसकी छातीपर बैठे-बैठे हँसने लगे। उन्होंने उस विषमिश्रित दूधको सुधाके समान मानकर पूतनाके प्राणोंके साथ ही पी लिया। साध्वी पूतनाने अपने प्राणोंके साथ ही बालकको त्याग दिया। मुने! वह प्राणोंका त्याग करके पृथ्वीपर गिर पड़ी। उसका आकार और मुख विकराल दिखायी देने लगे। वह उत्तान मुँह होकर पड़ी थी। उसने स्थूल शरीरको त्यागकर सूक्ष्म शरीरमें प्रवेश किया। फिर वह शीघ्र ही रत्नसारनिर्मित दिव्य रथपर आरूढ़ हो गयी। उस विमानको लाखों मनोहर दिव्य एवं श्रेष्ठ पार्षद सब ओरसे घेरकर बैठे थे। उनके हाथोंमें लाखों चँवर डुल रहे थे। लाखों दिव्य दर्पण उस दिव्य रथकी शोभा बढ़ा रहे थे। अग्निशुद्ध सूक्ष्म दिव्य वस्त्रसे उस श्रेष्ठ विमानको सजाया गया था। उसमें नाना प्रकारके चित्र-विचित्र मनोहर रत्नमय कलश शोभा दे रहे थे। उस रथमें सौ पहिये लगे थे। वह सुन्दर विमान रत्नोंके तेजसे प्रकाशित हो रहा था। पूर्वोक्त पार्षद पूतनाको उस रथपर बिठाकर उसे उत्तम गोलोकधाममें
४६४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
ले गये। उस अद्भुत दृश्यको देखकर गोप और गोपिकाएँ चकित हो गयीं। कंस भी वह सारा समाचार सुनकर बड़ा विस्मित हुआ। मुने! यशोदा मैया बालकको गोदमें उठाकर उसे स्तन पिलाने लगीं। उन्होंने ब्राह्मणोंके द्वारा बालकके कल्याणके लिये मङ्गल-पाठ करवाया। नन्दरायने बड़े आनन्दसे पूतनाके देहका दाह-संस्कार किया। उस समय उसकी चितासे चन्दन, अगुरु और कस्तूरीके समान सुगन्ध निकल रही थी।
नारदजीने पूछा—भगवन्! राक्षसी पूतनाके रूपमें वह कौन ऐसी पुण्यवती सती थी, जिसने श्रीहरिको अपना स्तन पिलाया? किस पुण्यसे भगवान्के दर्शन करके वह उनके परम धाममें गयी?
नारायण बोले—देवर्षे! बलिके यज्ञमें वामनका मनोहर रूप देखकर बलिकी कन्या रत्नमालाने उनके प्रति पुत्र-स्नेह प्रकट किया था। उसने मन-ही-मन यह संकल्प किया कि यदि इस पुत्रके समान मेरे पुत्र होता तो मैं उसके मुखमें अपना स्तन देकर उसे वक्षःस्थलपर बिठाती। भगवान्से उसका यह मनोरथ छिपा न रहा। उन्होंने इस प्रकार जन्मान्तरमें उसका स्तन-पान किया। भक्तोंकी वाञ्छा पूर्ण करनेवाले उन कृपानिधानने पूतनाको माताकी गति प्रदान की। मुने! राक्षसी पूतनाने श्रीकृष्णको विष लिपटा हुआ स्तन देकर उस द्वेष-भक्तिके द्वारा भी माताके समान गति प्राप्त कर ली। ऐसे परम दयालु भगवान् श्रीकृष्णको छोड़कर मैं और किसका भजन करूँ?* विप्रवर! इस प्रकार मैंने तुमसे श्रीकृष्णके गुणोंका वर्णन किया, जो पद-पदपर अत्यन्त मधुर हैं। इसके अतिरिक्त भी जो श्रीकृष्णकी मधुर लीलाएँ हैं, उनका तुम्हारे समक्ष वर्णन आरम्भ करता हूँ।
(अध्याय १०)
तृणावर्तका उद्धार तथा उसके पूर्वजन्मका परिचय
भगवान् नारायण कहते हैं—नारद! एक दिन गोकुलमें सती साध्वी नन्दरानी यशोदा बालकको गोदमें लिये घरके कामकाजमें लगी हुई थीं। उस समय गोकुलमें बवंडरका रूप धारण करनेवाला तृणावर्त आ रहा था। मन-ही-मन उसके आगमनकी बात जानकर श्रीहरिने अपने शरीरका भार बढ़ा लिया। उस भारसे पीड़ित होकर मैया यशोदाने लालाको गोदसे उतार दिया और खाटपर सुलाकर वे यमुनाजीके किनारे चली गयीं। इसी बीचमें वह बवंडररूपधारी असुर वहाँ आ पहुँचा और उस बालकको लेकर घुमाता हुआ सौ योजन ऊपर जा पहुँचा। उसने वृक्षोंकी डालियाँ तोड़ दीं तथा इतनी धूल उड़ायी कि गोकुलमें अँधेरा छा गया। उस मायावी असुरने तत्काल यह सब उत्पात किया। फिर वह स्वयं भी श्रीहरिके भारसे आक्रान्त हो वहीं पृथ्वीपर गिर पड़ा। श्रीहरिका स्पर्श प्राप्त करके वह असुर भी भगवद्धामको चला गया। अपने कर्मोंका नाश करके सुन्दर दिव्य रथपर आरूढ़ हो गोलोकमें जा पहुँचा। वह पाण्ड्यदेशका राजा था और दुर्वासाके शापसे असुर हो गया था। श्रीकृष्णके चरणोंका स्पर्श पाकर उसने गोलोकधाममें स्थान प्राप्त कर लिया।
मुने! बवंडरका रूप समाप्त होनेपर भयसे विह्वल गोप-गोपियोंने जब खोज की, तब बालकको शय्यापर न देखकर सब लोग शोकसे व्याकुल हो
* दत्त्वा विपस्तनं कृष्णं पूतना राक्षसी मुने। भक्त्या मातृगतिं प्राप कं भजामि विना हरिम्॥
(श्रीकृष्णजन्मखण्ड १०।४४)
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ४६५
भयसे अपनी-अपनी छाती पीटने लगे। कुछ लोग मूर्च्छित हो गये और कितने ही फूट-फूटकर रोने लगे। खोजते-खोजते उन्हें वह बालक व्रजके भीतर एक फुलवाड़ीमें पड़ा दिखायी दिया। उसके सारे अङ्ग धूलसे धूसर हो रहे थे। एक सरोवरके बाहरी तटपर जो पानीसे भीगा हुआ था, पड़ा हुआ वह बालक आकाशकी ओर एकटक देखता और भयसे कातर होकर बोलता था। नन्दजीने तत्काल बच्चेको उठाकर छातीसे लगा लिया और उसका मुँह देख-देखकर वे शोकसे व्याकुल हो रोने लगे। माता यशोदा और रोहिणी भी शीघ्र ही बालकको देखकर रो पड़ीं तथा उसे गोदमें लेकर बार-बार उसका मुँह चूमने लगीं। उन्होंने बालकको नहलाया और उसकी रक्षाके लिये मङ्गलपाठ करवाया। इसके बाद यशोदाजीने अपने लालाको स्तन पिलाया। उस समय उनके मुख और नेत्रोंमें प्रसन्नता छा रही थी।
नारदजीने पूछा—भगवन्! पाण्ड्यदेशके राजाको दुर्वासाजीने क्यों शाप दिया? आप इस प्राचीन इतिहासको भलीभाँति विचार करके कहिये।
भगवान् नारायण बोले—एक बार पाण्ड्यदेशके प्रतापी राजा अपनी एक हजार पत्नियोंको साथ लेकर मनोहर निर्जन प्रदेशमें गन्धमादन पर्वतकी नदी-तीरस्थ पुष्पवाटिकामें जाकर सुखसे विहार करने लगे। एक दिन वे नदीमें अपनी पत्नियोंके साथ जलक्रीडा कर रहे थे। उस समय उन लोगोंके वस्त्र अस्तव्यस्त थे।
इसी बीच अपने हजारों शिष्योंको साथ लिये महामुनि दुर्वासा उधरसे निकले। मतवाले सहस्राक्षने उनको देख लिया, पर वे न जलसे निकले, न प्रणाम किया, न वाणीसे या हाथके संकेतसे ही कुछ कहा। इस निर्लज्जता और उद्दण्डताको देखकर दुर्वासाने उनको योगभ्रष्ट होकर भारतमें लाख वर्षोंतक असुरयोनिमें रहनेका शाप दे दिया और कहा कि 'इसके अनन्तर श्रीहरिके चरण-कमलका स्पर्श प्राप्त होनेपर असुरयोनिसे उद्धार होकर तुम्हें गोलोककी प्राप्ति होगी।' और उनकी पत्नियोंसे कहा कि 'तुमलोग भारतमें जाकर विभिन्न स्थानोंमें राजाओंके घरोंमें जन्म धारण करके राजकन्या होओगी।'
मुनीन्द्रके शापको सुनकर सब लोग हाहाकार कर उठे। राजा सहस्राक्षकी पत्नियाँ करुण विलाप करने लगीं। अन्तमें राजाने एक बड़े अग्निकुण्डका निर्माण किया और श्रीहरिके चरणकमलोंका हृदयमें चिन्तन करते हुए वे पत्नियोंसहित उसमें प्रविष्ट हो गये।
इस प्रकार वे राजा सहस्राक्ष तृणावर्त नामक असुर होनेके पश्चात् श्रीहरिका स्पर्श पाकर उनके परमधाममें चले गये और उनकी रानियोंने भारतवर्षमें मनोवाञ्छित जन्म ग्रहण किया। इस तरह श्रीहरिका यह सारा उत्तम माहात्म्य कहा गया। साथ ही मुनिवर दुर्वासाके शापवश असुरयोनिमें पड़े हुए पाण्ड्यनरेशके उद्धारका प्रसङ्ग भी सुनाया गया। (अध्याय ११)
यशोदाके घर गोपियोंका आगमन और उनके द्वारा उन सबका सत्कार, शिशु श्रीकृष्णके पैरोंके आघातसे शकटका चूर-चूर होना तथा श्रीकृष्ण-कवचका प्रयोग एवं माहात्म्य
भगवान् नारायण कहते हैं—नारद! एक दिन नन्दपत्नी यशोदा अपने घरमें भूखे बालक गोविन्दको गोदमें लेकर उन्हें प्रसन्नतापूर्वक स्तन
पिला रही थीं। इसी समय नन्द-मन्दिरमें बहुत-सी गोपियाँ आयीं, जिनमें कुछ बड़ी-बूढ़ी थीं और कुछ यशोदाजीकी सखियाँ थीं। इनके साथ
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और भी बालक-बालिकाएँ थीं। उस दिन नन्दजीके यहाँ आभ्युदयिक कर्मका सम्पादन हुआ था। उस अवसरपर गोपियोंको आती देख सती यशोदाने अतृप्त बालक श्रीकृष्णको शीघ्र ही शय्यापर सुला दिया और स्वयं उठकर प्रसन्नतापूर्वक उनको प्रणाम किया। इतना ही नहीं, आनन्दित हुई गोपी यशोदाने उन सबको तेल, सिन्दूर, पान, मिष्ठान्न, वस्त्र और आभूषण भी दिये। इस बीचमें मायाके स्वामी भगवान् श्रीकृष्ण मायासे भूखे बनकर दोनों चरण ऊपर फेंक-फेंककर रोने लगे। मुने ! उनके पास ही गोरसके मटकोंसे भरा हुआ छकड़ा खड़ा था। श्रीकृष्णका एक पैर उससे जा लगा। विश्वम्भरके पैरका आघात लगनेसे वह छकड़ा चूर-चूर हो गया। उस छकड़ेके टुकड़े-टुकड़े हो गये। उसके टूटे काठ वहीं बिखर गये। उसपर लदा हुआ दही, दूध, माखन, घी और मधु धरतीपर गिरकर बह चला। यह आश्चर्य देख भयसे व्याकुल हुई गोपियाँ बालकके पास दौड़ी हुई आयीं। उन्होंने देखा छकड़ा टूट चुका है और बालक उसकी बिखरी हुई लकड़ियोंके भीतर दबा है। टूटे-फूटे मटकोंका समूह तथा बहुत-सा गोरस भी वहाँ गिरा दिखायी दिया। लकड़ियोंको दूर फेंककर भयसे व्याकुल हुई यशोदाने बालकको गोदमें उठा लिया। योगमायाकी कृपासे उसके सारे अङ्ग सुरक्षित थे। वह भूखसे व्याकुल हो रो रहा था। यशोदाजीने उसके मुखमें स्तन दे दिया और स्वयं शोकसे व्याकुल हो फूट-फूटकर रोती रहीं। गोपोंने वहाँ खेलते हुए बालकोंसे पूछा—‘छकड़ा कैसे टूटा है? इसके टूटनेका कोई कारण तो नहीं दिखायी देता है। सहसा यह अद्भुत काण्ड कैसे घटित हुआ?’ उनकी बात सुनकर सब बालक बोले—‘गोपगण! सुनो। अवश्य ही श्रीकृष्णके चरणोंका धक्का लगनेसे यह छकड़ा टूटा है।’ बालकोंकी यह बात सुनकर गोप और गोपियाँ हँसने लगीं। उन्हें उनकी बातपर विश्वास नहीं हुआ। वे बोलीं—‘बच्चोंकी बातें सत्य नहीं हैं।’ तुरंत ही श्रेष्ठ ब्राह्मण आये और उन्होंने शिशुकी रक्षाके लिये स्वस्तिवाचन किया। एक ब्राह्मणने शिशुके शरीरपर हाथ रखकर कवच पढ़ा। विप्रवर! वह समस्त शुभ लक्षणोंसे युक्त कवच मैं तुम्हें बता रहा हूँ। यह वही कवच है, जिसे पूर्वकालमें श्रीविष्णुके नाभिकमलपर विराजमान ब्रह्माजीको भगवती योगमायाने दिया था। उस समय जलमें शयन करनेवाले त्रिलोकीनाथ विष्णु जलके भीतर नींद ले रहे थे और ब्रह्माजी मधु-कैटभके भयसे डरकर योगनिद्राकी स्तुति कर रहे थे। उसी अवसरपर योगनिद्राने उन्हें कवचका उपदेश दिया था।
योगनिद्रा बोली— ब्रह्मन्! तुम अपना भय दूर करो। जगत्पते! जहाँ श्रीहरि विराजमान हैं और मैं मौजूद हूँ, वहाँ तुम्हें भय किस बातका है? तुम यहाँ सुखपूर्वक रहो। श्रीहरि तुम्हारे मुखकी रक्षा करें। मधुसूदन मस्तककी, श्रीकृष्ण दोनों नेत्रोंकी तथा राधिकापति नासिकाकी रक्षा करें। माधव दोनों कानोंकी, कण्ठकी और कपालकी रक्षा करें। कपोलकी गोविन्द और केशोंकी स्वयं
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ४६७ केशव रक्षा करें। हृषीकेश अधरोष्ठकी, गदाग्रज दन्तपंक्तिकी, रासेश्वर रसनाकी और भगवान् वामन तालुकी रक्षा करें। मुकुन्द तुम्हारे वक्षःस्थलकी रक्षा करें। दैत्यसूदन उदरका पालन करें। जनार्दन नाभिकी और विष्णु तुम्हारी ठोढ़ीकी रक्षा करें। पुरुषोत्तम तुम्हारे दोनों नितम्बों और गुह्य भागकी रक्षा करें। भगवान् जानकीश्वर तुम्हारे युगल जानुओं (घुटनों) - की सर्वदा रक्षा करें। नृसिंह सर्वत्र संकटमें दोनों हाथोंकी और कमलोद्भव वराह तुम्हारे दोनों चरणोंकी रक्षा करें। ऊपर नारायण और नीचे कमलापति तुम्हारी रक्षा करें। पूर्व दिशामें गोपाल तुम्हारा पालन करें। अग्निकोणमें दशमुखहन्ता श्रीराम तुम्हारी रक्षा करें। दक्षिण दिशामें वनमाली, नैर्ऋत्यकोणमें वैकुण्ठ तथा पश्चिम दिशामें सत्पुरुषोंकी रक्षा करनेवाले स्वयं वासुदेव तुम्हारा पालन करें। वायव्यकोणमें अजन्मा विष्टरश्रवा श्रीहरि सदा तुम्हारी रक्षा करें। उत्तर दिशामें कमलासन ब्रह्मा अपने तेजसे सदा तुम्हारी रक्षा करें। ईशानकोणमें ईश्वर रक्षा करें। शत्रुजित् सर्वत्र पालन करें। जल, थल और आकाशमें तथा निद्रावस्थामें श्रीरघुनाथजी रक्षा करें। ब्रह्मन् ! इस प्रकार परम अद्भुत कवचका वर्णन किया गया। पूर्वकालमें मेरे स्मरण करनेपर भगवान् श्रीकृष्णने कृपापूर्वक मुझे इसका उपदेश दिया था। शुम्भके साथ जब निर्लक्ष्य, घोर एवं दारुण संग्राम चल रहा था, उस समय आकाशमें खड़ी हो मैंने इस कवचकी प्राप्तिमात्रसे तत्काल उसे पराजित कर दिया था। इस कवचके प्रभावसे शुम्भ धरतीपर गिरा और मर गया। पहले सैकड़ों वर्षोंतक भयंकर युद्ध करके जब शुम्भ मर गया, तब कृपालु गोविन्द आकाशमें स्थित हो कवच और माल्य देकर गोलोकको चले गये। मुने ! इस प्रकार कल्पान्तरका वृत्तान्त कहा गया है। इस कवचके प्रभावसे कभी मनमें भय नहीं होता है। मैंने प्रत्येक कल्पमें श्रीहरिके साथ रहकर करोड़ों ब्रह्माओंको नष्ट होते देखा है। ऐसा कह कवच देकर देवी योगनिद्रा अन्तर्धान हो गयी और कमलोद्भव ब्रह्मा भगवान् विष्णुके नाभिकमलमें निःशंकभावसे बैठे रहे। जो इस उत्तम कवचको सोनेके यन्त्रमें मढ़ाकर कण्ठ या दाहिनी बाँहमें बाँधता है, उसकी बुद्धि सदा शुद्ध रहती है तथा उसे विष, अग्नि, सर्प और शत्रुओंसे कभी भय नहीं होता। जल, थल और अन्तरिक्षमें तथा निद्रावस्थामें भगवान् सदा उसकी रक्षा करते हैं*। *हस्तं दत्त्वा शिरोगात्रे पपाठ कवचं द्विजः। वदामि तत्ते विप्रेन्द्र कवचं सर्वलक्षणम् ॥ यदत्तं मायया पूर्वं ब्रह्मणे नाभिपङ्कजे ॥ निद्रिते जगतीनाथे जले च जलशायिनि। भीताय स्तुतिकर्त्रे च मधुकैटभयोर्भयात् ॥ योगनिद्रोवाच दूरीभूतं कुरु भयं भयं किं ते हरौ स्थिते। स्थितायां मयि च ब्रह्मन् सुखं तिष्ठ जगत्पते ॥ श्रीहरिः पातु ते वक्त्रं मस्तकं मधुसूदनः। श्रीकृष्णश्चक्षुषी पातु नासिकां राधिकापतिः ॥ कर्णयुग्मं च कण्ठं च कपालं पातु माधवः। कपोलं पातु गोविन्दः केशांश्च केशवः स्वयम् ॥ अधरोष्ठं हृषीकेशो दन्तपंक्तिं गदाग्रजः। रासेश्वरश्च रसनां तालुकं वामनो विभुः ॥ वक्षः पातु मुकुन्दस्ते जठरं पातु दैत्यहा। जनार्दनः पातु नाभिं पातु विष्णुश्च ते हनुम् ॥ नितम्बयुग्मं गुह्यं च पातु ते पुरुषोत्तमः। जानुयुग्मं जानकीशः पातु ते सर्वदा विभुः ॥ हस्तयुग्मं नृसिंहश्च पातु सर्वत्र सङ्कटे। पादयुग्मं वराहश्च पातु ते कमलोद्भवः ॥ ऊर्ध्वं नारायणः पातुह्यधस्तात् कमलापतिः। पूर्वस्यां पातु गोपालः पातु वह्नौ दशास्यहा ॥ वनमाली पातु याम्यां वैकुण्ठः पातु नैर्ऋतौ। वारुण्यां वासुदेवश्च सतो रक्षाकरः स्वयम् ॥ पातु ते सन्ततमजो वायव्यां विष्टरश्रवाः। उत्तरे च सदा पातु तेजसा जलजासनः ॥
| ४६८ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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ब्राह्मणने नन्दशिशुके कण्ठमें वह कवच बाँध दिया। इस प्रकार साक्षात् श्रीहरिने अपना ही कवच अपने कण्ठमें धारण किया। मुने! श्रीहरिके इस कवचका सम्पूर्ण प्रभाव बताया गया। भगवान् अनन्त हैं। वे अपनी महिमासे कभी च्युत नहीं होते। उनके प्रभावकी कहीं तुलना नहीं है।
(अध्याय १२)
मुनि गर्गजीका आगमन, यशोदाद्वारा उनका सत्कार और परिचय-प्रश्न, गर्गजीका उत्तर, नन्दका आगमन, नन्द-यशोदाको एकान्तमें ले जाकर गर्गजीका श्रीराधा-कृष्णके नाम-माहात्म्यका परिचय देना और उनकी भावी लीलाओंका क्रमशः वर्णन करना, श्रीकृष्णके नामकरण एवं अन्नप्राशन-संस्कारका बृहद् आयोजन, ब्राह्मणोंको दान-मान, गर्गद्वारा श्रीकृष्णकी स्तुति तथा गर्ग आदिकी विदाई
भगवान् नारायण कहते हैं—महामुने! अब श्रीकृष्णका कुछ और माहात्म्य सुनो, जो विघ्नविनाशक, पापहारी, महान् पुण्य प्रदान करनेवाला तथा परम उत्तम है। एक दिनकी बात है। सोनेके सिंहासनपर बैठी हुई नन्दपत्नी यशोदा भूखे हुए श्रीकृष्णको गोदमें लेकर उन्हें स्तन पिला रही थीं। उसी समय एक श्रेष्ठ ब्राह्मण शिष्यसमूहसे घिरे हुए वहाँ आये। वे ब्रह्मतेजसे प्रकाशित हो रहे थे और शुद्ध स्फटिककी मालापर परब्रह्मका जप कर रहे थे। दण्ड और छत्र धारण किये श्वेत वस्त्र पहने वे महर्षि अपनी धवल दन्तपंक्तियोंके कारण बड़ी शोभा पा रहे थे। वेद और वेदाङ्गोंके पारंगत तो वे थे ही, ज्योतिर्विद्याके मूर्तिमान् स्वरूप थे। उन्होंने अपने मस्तकपर तपाये हुए सुवर्णके समान पिङ्गल जटाभार धारण कर रखा था। उनका मुख शरत्पूर्णिमाके चन्द्रदेवकी कान्तिको लज्जित कर रहा था। गोरे-गोरे अङ्ग और कमल-जैसे नेत्रवाले वे योगिराज भगवान् शंकरके शिष्य थे तथा गदाधारी श्रीविष्णुके प्रति विशुद्ध भक्ति रखते थे। वे श्रीमान् महर्षि प्रसन्नतापूर्वक शिष्योंको पढ़ाते थे। उनके एक हाथमें व्याख्याकी मुद्रा सुस्पष्ट दिखायी देती थी। वे वेदोंकी अनेक प्रकारकी व्याख्या लीलापूर्वक करते थे। उन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता था
ऐशान्यामीश्वरः पातु सर्वत्र पातु शत्रुजित् । जले स्थले चान्तरिक्षे निद्रायां पातु राघवः ॥
इत्येवं कथितं ब्रह्मन् कवचं परमाद्भुतम् । कृष्णेन कृपया दत्तं स्मृतेनैव पुरा मया ॥
शुम्भेन सह संग्रामे निर्लक्ष्ये घोरदारुणे । गगने स्थितया सद्यः प्राप्तिमात्रेण सो जितः ॥
कवचस्य प्रभावेण धरण्यां पतितो मृतः । पूर्वं वर्षशतं खे च कृत्वा युद्धं भयावहम् ॥
मृते शुम्भे च गोविन्दः कृपालुर्गगनस्थितः । माल्यं च कवचं दत्त्वा गोलोकं स जगाम ह ॥
कल्पान्तरस्य वृत्तान्तं कृपया कथितं मुने । अभ्यन्तरभयं नास्ति कवचस्य प्रभावतः ॥
कोटिशः कोटिशोनष्टामया दृष्टाश्च वेधसः । अहं च हरिणा सार्द्धं कल्पे कल्पे स्थिरा सदा ॥
इत्युक्त्वा कवचंदत्त्वा सान्तर्धानं चकार ह । निःशङ्को नाभिकमले तस्थौ स कमलोद्भवः ॥
सुवर्णगुटिकायां तु कृत्वेदं कवचं परम् । कण्ठे वा दक्षिणे बाहौ बध्नीयाद् यः सुधीः सदा ॥
विषाग्निसर्पशत्रुभ्यो भयं तस्य न विद्यते । जले स्थले चान्तरिक्षे निद्रायां रक्षतीश्वरः ॥
( श्रीकृष्णजन्मखण्ड १२ । १४–३६)
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ४६९
मानो चारों वेदोंका तेज मूर्तिमान् हो गया हो। उनके कण्ठमें साक्षात् सरस्वतीका वास था। वे शास्त्रीय सिद्धान्तके एकमात्र विशेषज्ञ थे और दिन-रात श्रीकृष्णचरणारविन्दोंके ध्यानमें तत्पर रहते थे। उन्हें जीवन्मुक्त अवस्था प्राप्त थी। वे सिद्धोंके स्वामी, सर्वज्ञ और सर्वदर्शी थे।
उन्हें देखकर यशोदाजी खड़ी हो गयीं। उन्होंने मस्तक झुकाकर मुनिके चरणोंमें प्रणाम किया और उन्हें बैठनेके लिये सोनेका सिंहासन देकर आतिथ्यके लिये पाद्य, अर्घ्य, गौ तथा मधुपर्क निवेदन किया। मुस्कराती हुई नन्दरानीने अपने बालकसे मुनीन्द्रकी वन्दना करवायी।
मुनिने भी मन-ही-मन श्रीहरिको सौ-सौ प्रणाम किये और प्रसन्नतापूर्वक वेदमन्त्रोंके अनुकूल आशीर्वाद दिया। यशोदाजीने मुनिके शिष्योंको भी प्रणाम किया तथा भक्तिभावसे उन सबके लिये पृथक्-पृथक् पाद्य आदि अर्पित किये। उन शिष्योंने यशोदाजीको आशीर्वाद दिया। मुनि अपने शिष्योंके साथ पैर धोकर जब सिंहासनपर बैठे, तब सती-साध्वी यशोदा बालकको गोदमें ले भक्तिभावसे मस्तक झुकाकर दोनों हाथ जोड़ मुनिके आगमनका कारण पूछनेको उद्यत हुईं। वे बोलीं—'मुने! आप स्वात्माराम महर्षि हैं, आपसे कुशल-मङ्गल पूछना यद्यपि उचित नहीं है, तथापि इस समय मैं आपका कुशल-समाचार पूछ रही हूँ। अबला बुद्धिहीना होती है। अतः आप मेरे इस दोषको क्षमा कर देंगे। साधुपुरुष सदा ही मूढ़ मनुष्योंके दोषोंको क्षमा करते रहते हैं।'
तदनन्तर अङ्गिरा, अत्रि, मरीचि और गौतम आदि बहुत-से ऋषि-मुनियोंके नाम लेकर यशोदाने पूछा—'प्रभो! इन पुण्यश्लोक महात्माओंमेंसे आप कौन हैं। कृपया मुझे बताइये। यद्यपि आपसे उत्तर पानेके योग्य मैं नहीं हूँ, तथापि आप मुझे मेरी पूछी हुई बात बताइये। आप-जैसे महात्मा पुरुष प्रसन्नमनसे शिशुको आशीर्वाद देने योग्य हैं। निश्चय ही ब्राह्मणोंका आशीर्वाद तत्काल पूर्ण मङ्गलकारी होता है।'
ऐसा कहकर नन्दरानी भक्तिभावसे मुनिके सामने खड़ी हो गयीं। उस सतीने नन्दरायजीको बुलानेके लिये चर भेजा। यशोदाजीकी पूर्वोक्त बातें सुनकर मुनिवर गर्ग हँसने लगे। उनके शिष्य-समूह भी हास्यकी छटासे दसों दिशाओंको प्रकाशित करते हुए जोर-जोरसे हँस पड़े। तब उन शुद्धबुद्धि महामुनि गर्गने यथार्थ हितकर, नीतियुक्त एवं अत्यन्त आनन्ददायक बात कही।
श्रीगर्गजी बोले—देवि! तुम्हारा यह समयोचित वचन अमृतके समान मधुर है। जिसका जिस कुलमें जन्म होता है, उसका स्वभाव भी वैसा ही होता है। समस्त गोपरूपी कमलवनोंके विकासके लिये गोपराज गिरिभानु सूर्यके समान हैं। उनकी पत्नीका नाम सती पद्मावती है, जो साक्षात् पद्मा (लक्ष्मी)-के समान हैं। उन्हींकी कन्या तुम यशोदा हो, जो अपने यशकी वृद्धि करनेवाली हो। भद्रे! नन्द और तुम जो कुछ भी हो, वह मुझे ज्ञात है। यह बालक जिस प्रयोजनसे भूतलपर अवतीर्ण हुआ है, वह सब मैं जानता हूँ। निर्जन स्थानमें नन्दके समीप मैं सब बातें बताऊँगा। मेरा नाम गर्ग है। मैं
४७० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण चिरकालसे यदुकुलका पुरोहित हूँ। वसुदेवजीने मुझे यहाँ ऐसे कार्यके लिये भेजा है, जिसे दूसरा कोई नहीं कर सकता। इसी बीचमें गर्गजीका आगमन सुनते ही नन्दजी वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने दण्डकी भाँति पृथ्वीपर माथा टेक उन मुनीश्वरको प्रणाम किया। साथ ही उनके शिष्योंको भी मस्तक झुकाया। उन सबने उन्हें आशीर्वाद दिये। इसके बाद गर्गजी आसनसे उठे और नन्द-यशोदाको साथ ले सुरम्य अन्तःपुरमें गये। उस निर्जन स्थानमें गर्ग, नन्द और पुत्रसहित यशोदा इतने ही लोग रह गये थे। उस समय गर्गजीने यह गूढ़ बात कही। श्रीगर्गजी बोले- नन्द ! मैं तुम्हें मङ्गलकारी वचन सुनाता हूँ। वसुदेवजीने जिस प्रयोजनसे मुझे यहाँ भेजा है, उसे सुनो। वसुदेवने सूतिकागारमें आकर अपना पुत्र तुम्हारे यहाँ रख दिया है और तुम्हारी कन्या वे मथुरा ले गये हैं। ऐसा उन्होंने कंसके भयसे किया है। यह पुत्र वसुदेवका है और जो इससे ज्येष्ठ है, वह भी उन्हींका है। यह निश्चित बात है। इस बालकका अन्नप्राशन और नामकरण-संस्कार करनेके लिये वसुदेवने गुप्तरूपसे मुझे यहाँ भेजा है। अतः तुम ब्रजमें इन बालकोंके संस्कारकी तैयारी करो। तुम्हारा यह शिशु पूर्ण ब्रह्मस्वरूप है और मायासे इस भूतलपर अवतीर्ण हो पृथ्वीका भार उतारनेके लिये उद्यमशील है। ब्रह्माजीने इसकी आराधना की थी। अतः उनकी प्रार्थनासे यह भूतलका भार हरण करेगा। इस शिशुके रूपमें साक्षात् राधिकावल्लभ गोलोकनाथ भगवान् श्रीकृष्ण पधारे हैं। वैकुण्ठमें जो कमलाकान्त नारायण हैं तथा श्वेतद्वीपमें जो जगत्पालक विष्णु निवास करते हैं, वे भी इन्हींमें अन्तर्भूत हैं। महर्षि कपिल तथा इनके अन्यान्य अंश ऋषि नर-नारायण भी इनसे भिन्न नहीं हैं। ये सबके तेजोंकी राशि हैं। वह तेजोराशि ही मूर्त्तिमान् होकर उनके यहाँ अवतीर्ण हुई है। भगवान् श्रीकृष्ण वसुदेवको अपना रूप दिखाकर शिशुरूप हो गये और सूतिकागारसे इस समय तुम्हारे घरमें आ गये हैं। ये किसी योनिसे प्रकट नहीं हुए हैं; अयोनिज रूपमें ही भूतलपर प्रकट हुए हैं। इन श्रीहरिने मायासे अपनी माताके गर्भको वायुसे पूर्ण कर रखा था। फिर स्वयं प्रकट हो अपने उस दिव्य रूपका वसुदेवजीको दर्शन कराया और फिर शिशुरूप हो वे यहाँ आ गये। गोपराज ! युग-युगमें इनका भिन्न-भिन्न वर्ण और नाम है; ये पहले श्वेत, रक्त और पीतवर्णके थे। इस समय कृष्णवर्ण होकर प्रकट हुए हैं। सत्ययुगमें इनका वर्ण श्वेत था। ये तेजःपुञ्जसे आवृत होनेके कारण अत्यन्त प्रसन्न जान पड़ते थे। त्रेतामें इनका वर्ण लाल हुआ और द्वापरमें ये भगवान् पीतवर्णके हो गये। कलियुगके आरम्भमें इनका वर्ण कृष्ण हो गया। ये श्रीमान् तेजकी राशि हैं, परिपूर्णतम ब्रह्म हैं; इसलिये 'कृष्ण' कहे गये हैं। 'कृष्णः' पदमें जो 'ककार' है, वह ब्रह्माका वाचक है। 'ऋकार' अनन्त (शेषनाग) - का वाचक है। मूर्धन्य 'षकार' शिवका और 'णकार' धर्मका बोधक है। अन्तमें जो 'अकार' है, वह श्वेतद्वीपनिवासी विष्णुका वाचक है तथा विसर्ग नर-नारायण-अर्थका बोधक माना गया है। ये श्रीहरि उपर्युक्त सब देवताओंके तेजकी राशि हैं। सर्वस्वरूप, सर्वाधार तथा सर्वबीज हैं; इसलिये 'कृष्ण' कहे गये हैं। 'कृष्' शब्द निर्वाणका वाचक है, 'णकार' मोक्षका बोधक है और 'अकार' का अर्थ दाता है। ये श्रीहरि निर्वाण मोक्ष प्रदान करनेवाले हैं; इसलिये 'कृष्ण' कहे गये हैं। 'कृष्' का अर्थ है निश्चेष्ट, 'ण' का अर्थ है भक्ति और 'अकार' का अर्थ है दाता। भगवान् निष्कर्म भक्तिके दाता हैं; इसलिये उनका नाम 'कृष्ण' है। 'कृष्' का
श्रीकृष्णजन्मखण्ड | ४७१
अर्थ है कर्मोंका निर्मूलन, 'ण' का अर्थ है दास्यभाव और 'अकार' प्राप्तिका बोधक है। वे कर्मोंका समूल नाश करके भक्तिकी प्राप्ति कराते हैं; इसलिये 'कृष्ण' कहे गये हैं। नन्द! भगवान्के अन्य करोड़ों नामोंका स्मरण करनेपर जिस फलकी प्राप्ति होती है, वह सब केवल 'कृष्ण' नामका स्मरण करनेसे मनुष्य अवश्य प्राप्त कर लेता है। 'कृष्ण' नामके स्मरणका जैसा पुण्य है, उसके कीर्तन और श्रवणसे भी वैसा ही पुण्य होता है। श्रीकृष्णके कीर्तन, श्रवण और स्मरण आदिसे मनुष्यके करोड़ों जन्मोंके पापका नाश हो जाता है। भगवान् विष्णुके सब नामोंमें 'कृष्ण' नाम ही सबकी अपेक्षा सारतम वस्तु और परात्पर तत्त्व है। 'कृष्ण' नाम अत्यन्त मङ्गलमय, सुन्दर तथा भक्तिदायक है$^१$।
'ककार' के उच्चारणसे भक्त पुरुष जन्म-मृत्युका नाश करनेवाले कैवल्य मोक्षको प्राप्त कर लेता है। 'ऋकार' के उच्चारणसे भगवान्का अनुपम दास्यभाव प्राप्त होता है। 'षकार' के उच्चारणसे उनकी मनोवाञ्छित भक्ति सुलभ होती है। 'णकार' के उच्चारणसे तत्काल ही उनके साथ निवासका सौभाग्य प्राप्त होता है और विसर्गके उच्चारणसे उनके सारूप्यकी उपलब्धि होती है, इसमें संशय नहीं है। 'ककार' का उच्चारण होते ही यमदूत काँपने लगते हैं। 'ऋकार' का उच्चारण होनेपर वे ठहर जाते हैं, आगे नहीं बढ़ते। 'षकार' के उच्चारणसे पातक, 'णकार' के उच्चारणसे रोग तथा 'अकार' के उच्चारणसे मृत्यु—ये सब निश्चय ही भाग खड़े होते हैं; क्योंकि वे नामोच्चारणसे डरते हैं। व्रजेश्वर! श्रीकृष्ण-नामके स्मरण, कीर्तन और श्रवणके लिये उद्योग करते ही श्रीकृष्णके किंकर गोलोकसे विमान लेकर दौड़ पड़ते हैं। विद्वान् लोग शायद भूतलके धूलिकणोंकी गणना कर सकें; परंतु नामके प्रभावकी गणना करनेमें संतपुरुष भी समर्थ नहीं हैं। पूर्वकालमें भगवान् शंकरके मुखसे मैंने इस 'कृष्ण' नामकी महिमा सुनी थी। मेरे गुरु भगवान् शंकर ही श्रीकृष्णके गुणों और नामोंका प्रभाव कुछ-कुछ जानते हैं। ब्रह्मा, अनन्त, धर्म, देवता, ऋषि, मनु, मानव, वेद और संतपुरुष श्रीकृष्ण-नाम-महिमाकी सोलहवीं कलाको भी नहीं जानते हैं।
नन्द! इस प्रकार मैंने तुम्हारे पुत्रकी महिमाका अपनी बुद्धि और ज्ञानके अनुसार वर्णन किया है। इसे मैंने गुरुजीके मुखसे सुना था। कृष्ण, पीताम्बर, कंसध्वंसी, विष्टरश्रवा, देवकीनन्दन, श्रीश, यशोदानन्दन, हरि, सनातन, अच्युत, विष्णु, सर्वेश, सर्वरूपधृक्, सर्वाधार, सर्वगति, सर्वकारणकारण, राधाबन्धु, राधिकात्मा, राधिकाजीवन, रािकासहचरी, राधामानसपूरक, राधाधन, राधिकाङ्ग, रािकासक्त-मानस, राधाप्राण, राधिकेश, राधिकारमण, राधिकाचित्तचोर, राधाप्राणाधिक, प्रभु, परिपूर्णतम, ब्रह्म, गोविन्द और गरुडध्वज—नन्द! ये श्रीकृष्णके नाम जो तुमने मेरे मुखसे सुने हैं, हृदयमें धारण करो। शुभेक्षण! ये नाम जन्म तथा मृत्युके कष्टको हर लेनेवाले हैं। तुम्हारे कनिष्ठ पुत्रके नामोंका महत्त्व जैसा मैंने सुना था, वैसा यहाँ बताया है$^२$। अब ज्येष्ठ पुत्र हलधरके नामका संकेत
१. नाम्नां भगवतो नन्द कोटीनां स्मरणेन यत् । तत्फलं लभते नूनं कृष्णेति स्मरणान्नरः॥
यद्द्विधं स्मरणे पुण्यं वचनाच्छ्रवणात् तथा। कोटिजन्मांहसां नाशो भवेद् यत्स्मरणादिकात् ॥
विष्णोर्नाम्नां च सर्वेषां सर्वात् सारंपरात्परम्। कृष्णेति मङ्गलं नाम सुन्दरं भक्तिदायकम्॥
(श्रीकृष्णजन्मखण्ड १३। ६३–६५)
२. कृष्णः पीताम्बरः कंसध्वंसी च विष्टरश्रवाः। देवकीनन्दनः श्रीशो यशोदानन्दो हरिः॥
सनातनोऽच्युतो विष्णुः सर्वेशः सर्वरूपधृक् । सर्वाधारः सर्वगतिः सर्वकारणकारणः॥
४७२ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
मेरे मुँहसे सुनो। ये जब गर्भमें थे, उस समय उस गर्भका संकर्षण किया गया था; इसलिये इनका नाम 'संकर्षण' हुआ। वेदोंमें यह कहा गया है कि इनका कभी अन्त नहीं होता; इसलिये ये 'अनन्त' कहे गये हैं। इनमें बलकी अधिकता है; इसलिये इनको 'बलदेव' कहते हैं। हल धारण करनेसे इनका नाम 'हली' हुआ है। नील रंगका वस्त्र धारण करनेसे इन्हें 'शितिवासा' (नीलाम्बर) कहा गया है। ये मूसलको आयुध बनाकर रखते हैं; इसलिये 'मुसली' कहे गये हैं। रेवतीके साथ इनका विवाह होगा; इसलिये ये साक्षात् 'रेवतीरमण' हैं। रोहिणीके गर्भमें वास करनेसे इन महाबुद्धिमान् संकर्षणको 'रौहिणेय' कहा गया है। इस प्रकार ज्येष्ठ पुत्रका नाम जैसा मैंने सुना था, वैसा बताया है। नन्द! अब मैं अपने घरको जाऊँगा। तुम अपने भवनमें सुखपूर्वक रहो।
ब्राह्मणकी यह बात सुनकर नन्दजी स्तब्ध रह गये। नन्दपत्नी भी निश्चेष्ट हो गयीं और वह बालक स्वयं हँसने लगा। तब नन्दने गर्गजीको प्रणाम करके दोनों हाथ जोड़ लिये और भक्तिभावसे मस्तक झुकाकर विनयपूर्वक कहा।
नन्द बोले- ब्रह्मन्! यदि आप चले गये तो कौन महात्मा इस कर्मको करायेंगे; अतः आप स्वयं ही शुभ-दृष्टि करके इन बालकोंका नामकरण एवं अन्नप्राशन-संस्कार कराइये। राधा-बन्धुसे लेकर राधाप्राणाधिकतक जो नाम-समूह बताये गये हैं, उनमें जो राधा नाम आया है, वह राधा कौन है और किसकी पुत्री है?
नन्दकी यह बात सुनकर मुनिवर गर्ग हँसने लगे और बोले-'यह परम निगूढ़ तत्त्व एवं रहस्यकी बात है, जिसे तुम्हें बताऊँगा।'
श्रीगर्गजी बोले-नन्द! सुनो। मैं पुरातन इतिहास बता रहा हूँ। यह वृत्तान्त पहले गोलोकमें घटित हुआ था। उसे मैंने भगवान् शंकरके मुखसे सुना है। किसी समय गोलोकमें श्रीदामाका राधाके साथ लीलाप्रेरित कलह हो गया। उस कलहके कारण श्रीदामाके शापसे लीलावश गोपी राधाको गोकुलमें आना पड़ा है। इस समय वे वृषभानु गोपकी बेटी हैं और कलावती उनकी माता हैं। राधा श्रीकृष्णके अर्द्धाङ्गसे प्रकट हुई हैं और वे अपने स्वामीके अनुरूप ही परम सुन्दरी सती हैं। ये राधा गोलोकवासिनी हैं; परंतु इस समय श्रीकृष्णकी आज्ञासे यहाँ अयोनिसम्भवा होकर प्रकट हुई हैं। ये ही देवी मूल-प्रकृति ईश्वरी हैं। इन सती-साध्वी राधाने मायासे माताके गर्भको वायुपूर्ण करके वायुके निकलनेके समय स्वयं शिशु-विग्रह धारण कर लिया। ये साक्षात् कृष्ण-माया हैं और श्रीकृष्णके आदेशसे पृथ्वीपर प्रकट हुई हैं। जैसे शुक्लपक्षमें चन्द्रमाकी कला बढ़ती है, उसी प्रकार व्रजमें राधा बढ़ रही हैं। श्रीकृष्णके तेजके आधे भागसे वे मूर्तिमती हुई हैं। एक ही मूर्ति दो रूपोंमें विभक्त हो गयी है। इस भेदका निरूपण वेदमें किया गया है। ये स्त्री हैं, वे पुरुष हैं, किंवा वे ही स्त्री हैं और ये पुरुष हैं। इसका स्पष्टीकरण नहीं हो पाता। दो रूप हैं और दोनों ही स्वरूप, गुण एवं तेजकी दृष्टिसे समान हैं। पराक्रम, बुद्धि, ज्ञान और सम्पत्तिकी दृष्टिसे भी उनमें न्यूनता अथवा अधिकता नहीं है। किंतु वे गोलोकसे यहाँ पहले आयी हैं; इसलिये अवस्थामें श्रीकृष्णसे
राधाबन्धू राधिकात्मा राधिकाजीवनः स्वयं। राधिकासहचारी च राधामानसपूरकः॥
राधाधनो राधिकाङ्गो राधिकासक्तमानसः। राधाप्राणो राधिकेशो राधिकारमणः स्वयम्॥
राधिकाचित्तचौरश्च राधाप्राणाधिकः प्रभुः। परिपूर्णतमं ब्रह्म गोविन्दो गरुडध्वजः॥
नामान्येतानि कृष्णस्य श्रुतानि साम्प्रतं व्रज। जन्ममृत्युहराण्येव रक्ष नन्द शुभक्षणे॥
(१३।७५–८०)
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ४७३
कुछ अधिक हैं। श्रीकृष्ण सदा राधाका ध्यान करते हैं और राधा भी अपने प्रियतमका निरन्तर स्मरण करती हैं। राधा श्रीकृष्णके प्राणोंसे निर्मित हुई हैं और ये श्रीकृष्ण राधाके प्राणोंसे मूर्तिमान् हुए हैं। श्रीराधाका अनुसरण करनेके लिये ही इनका गोकुलमें आगमन हुआ है। पूर्वकालमें गोलोकमें श्रीहरिने जो प्रतिज्ञा की थी, उसे सार्थक बनानेके लिये कंसके भयका बहाना लेकर इनका गोकुलमें आगमन हुआ है। केवल प्रतिज्ञाका पालन करनेके लिये ही ये व्रजमें आये हैं। भय तो छलनामात्र है। जो भयके भी स्वामी हैं, उन्हें किससे भय हो सकता है? सामवेदमें 'राधा' शब्दकी व्युत्पत्ति बतायी गयी है। पहले नारायणदेवने अपने नाभि-कमलपर बैठे हुए ब्रह्माजीको वह व्युत्पत्ति बतायी थी। फिर ब्रह्माजीने ब्रह्मलोकमें भगवान् शंकरको उसका उपदेश दिया। नन्द ! तत्पश्चात् पूर्वकालमें कैलास-शिखरपर विराजमान महेश्वरने मुझको वह व्युत्पत्ति बतायी, जो देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। मैं उसका वर्णन करता हूँ।
'राधा' शब्दकी व्युत्पत्ति देवताओं, असुरों और मुनीन्द्रोंको भी अभीष्ट है तथा वह सबसे उत्कृष्ट एवं मोक्षदायिनी है। राधाका 'रेफ' करोड़ों जन्मोंके पाप तथा शुभाशुभ कर्मभोगसे छुटकारा दिलाता है। 'आकार' गर्भवास, मृत्यु तथा रोगको दूर करता है। 'धकार' आयुकी हानिका और 'आकार' भवबन्धनका निवारण करता है। राधा नामके श्रवण, स्मरण और कीर्तनसे उक्त सारे दोषोंका नाश हो जाता है; इसमें संशय नहीं है। राधा नामका 'रेफ' श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंमें निश्चल भक्ति तथा दास्य प्रदान करता है। 'आकार' सर्ववाञ्छित, सदानन्दस्वरूप, सम्पूर्ण सिद्धसमुदायरूप एवं ईश्वरकी प्राप्ति कराता है। 'धकार' श्रीहरिके साथ उन्हींकी भाँति अनन्त कालतक सहवासका सुख, समान ऐश्वर्य, सारूप्य तथा तत्त्वज्ञान प्रदान करता है। 'आकार' श्रीहरिकी भाँति तेजोराशि, दानशक्ति, योगशक्ति, योगमति तथा सर्वदा श्रीहरिकी स्मृतिका अवसर देता है। श्रीराधा नामके श्रवण, स्मरण और कीर्तनका सुयोग मिलनेसे मोहजाल, पाप, रोग, शोक, मृत्यु और यमराज सभी काँप उठते हैं; इसमें संशय नहीं है*।
श्रीराधा-माधवके नामकी यत्किञ्चित् व्याख्या जो गुरु-मुखसे सुनी थी, वह मैंने यथाज्ञान यहाँ बतायी है। इन नामोंकी सम्पूर्णरूपसे व्याख्या करनेमें मैं असमर्थ हूँ। नन्द ! यहाँ पास ही वृन्दावनमें श्रीराधा और माधवका विवाह होगा। साक्षात् जगत्स्रष्टा ब्रह्मा पुरोहित हो अग्निदेवको साक्षी बनाकर प्रसन्नतापूर्वक यह वैवाहिक कार्य सम्पन्न करेंगे। श्रीकृष्णके द्वारा जो बाललीलाएँ होनेवाली हैं, उसमेंसे मुख्यतः ये हैं—कुबेरपुत्रका उद्धार, गोपियोंके घरोंसे माखन चुराकर उसका भक्षण, तालवनमें तालफलका भोजन और धेनुकासुरका वध, बकासुर, केशी और प्रलम्बासुरका खेल-खेलमें ही विनाश, द्विजपत्नियोंका उद्धार, उनके दिये हुए मिष्टान्न और पानका भोजन,
* रेफो हि कोटिजन्माघं कर्मभोगं शुभाशुभम् ॥
आकारो गर्भवासं च मृत्युं च रोगमुत्सृजेत् । धकार आयुषो हानिमाकारो भवबन्धनम् ॥
श्रवणस्मरणोक्तिभ्यः प्रणश्यति न संशयः । रेफो हि निश्चलां भक्तिं दास्यं कृष्णपदाम्बुजे ॥
सर्वेप्सितं सदानन्दं सर्वसिद्धौघमीश्वरम् । धकारः सहवासं च तत्तुल्यकालमेव च ॥
ददाति सार्टिसारूप्यं तत्त्वज्ञानं हरेः समम् । आकारस्तेजसां राशिं दानशक्तिं हरौ यथा ॥
योगशक्तिं योगमतिं सर्वकालं हरिस्मृतिम् । श्रुत्युक्तिस्मरणाद्योगान्मोहजालं च किल्बिषम् ॥
रोगशोकमृत्युयमा वेपन्ते नात्र संशयः। (१३। १०५—१११)
४७४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
इन्द्रयागकी परम्पराका भंजन, इन्द्रके कोपसे गोकुलकी रक्षा, गोपियोंके वस्त्रोंका अपहरण, उनके व्रतका सम्पादन, पुनः उन्हें वस्त्र अर्पण तथा मनोवाञ्छित वरदान देनेका कार्य करके ये श्यामसुन्दर अपनी लीलाओंसे उनके चित्तको चुरा लेंगे और उन्हें सर्वथा अपने अधीन कर लेंगे। तदनन्तर इनके द्वारा अत्यन्त रमणीय रासोत्सवका आयोजन होगा, जो सबका आनन्दवर्धन करेगा। शरद् और वसन्त-ऋतुमें रातके समय पूर्ण चन्द्रमाका उदय होनेपर रासमण्डलमें गोपियोंको नूतन प्रेम-मिलनका सुख प्रदान करके ये श्यामसुन्दर उनका मनोरथ पूर्ण करेंगे। फिर कौतूहलवश उनके साथ जल-विहार भी करेंगे। तत्पश्चात् श्रीदामाके शापके कारण इनका गोप-गोपियों तथा श्रीराधाके साथ (पार्थिव) सौ वर्षोंके लिये वियोग हो जायगा। उस समय ये मथुरा चले जायँगे और वहाँ इनका जाना गोपियोंके लिये शोकवर्द्धक होगा। उस समय पुनः ये उनके पास आकर उन्हें समझा-बुझाकर धैर्य बँधायेंगे और आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करेंगे। उस प्रबोधन और आध्यात्मिक ज्ञानके द्वारा ये रथ तथा सारथि अक्रूरकी रक्षा करेंगे। फिर रथपर आरूढ़ हो पिता, भाई एवं ब्रजवासियोंके साथ यमुनाजीको लाँघकर ब्रजसे मथुराको पधारेंगे। मार्गमें यमुनाजीके जलके भीतर अक्रूरको अपने स्वरूपका दर्शन कराकर उन्हें ज्ञान देंगे। फिर सायंकाल मथुरामें पहुँचकर कौतूहलवश नगरमें घूम-घूमकर सबको दर्शन देंगे। माली, दर्जी और कुब्जाको भवबन्धनसे मुक्त करेंगे। शंकरजीके धनुषको तोड़कर यज्ञभूमिका दर्शन करेंगे। फिर कुवलयापीड़ हाथी और मल्लोंका वध करनेके पश्चात् अपने सामने राजा कंसको देखेंगे और तत्काल उसका विध्वंस करके माता-पिताको बन्धनसे छुड़ायेंगे। तदनन्तर तुम सब गोपोंको समझा-बुझाकर लौटायेंगे। कंसके राज्यपर उग्रसेनका अभिषेक करेंगे। कंसके बन्धु-बान्धवोंको ज्ञानोपदेश देकर उनका शोक दूर करेंगे। इसके बाद अपने भाईका और अपना उपनयन-संस्कार कराकर गुरुके मुखसे विद्या ग्रहण करेंगे। गुरुजीको उनका मरा हुआ पुत्र लाकर देंगे और फिर घर लौट आयेंगे। इसके बाद राजा जरासंधके सैनिकोंको चकमा देकर दुरात्मा कालयवनका वध, द्वारकापुरीका निर्माण, मुचुकुन्दका उद्धार तथा यादवोंसहित द्वारकापुरीको प्रस्थान करेंगे। वहाँ कौतूहलवश स्त्रीसमूहोंके साथ विवाह करके उनके साथ क्रीडा-विहार करेंगे। उनका तथा उनके पुत्र-पौत्रादिका सौभाग्यवर्धन करेंगे। मणिसम्बन्धी मिथ्या कलङ्कका मार्जन, पाण्डवोंकी सहायता, भूभार-हरण, धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरके राजसूययज्ञका लीलापूर्वक सम्पादन, पारिजातका अपहरण, इन्द्रके गर्वका गंजन, सत्यभामाके व्रतकी पूर्ति, बाणासुरकी भुजाओंका खण्डन, शिवके सैनिकोंका मर्दन, महादेवजीको जृम्भणास्त्रसे बाँधना, बाणपुत्री उषाका अपहरण, अनिरुद्धको बाणासुरके बन्धनसे छुटकारा दिलाना, वाराणसीपुरीका दहन, ब्राह्मणकी दरिद्रताका दूरीकरण, एक ब्राह्मणके मरे हुए पुत्रोंको लाकर उसे देना, दुष्टोंका दमन आदि करना तथा तीर्थयात्राके प्रसङ्गसे तुम ब्रजवासियोंके साथ पुनः मिलना इत्यादि कार्य करके ये श्रीकृष्ण श्रीराधाके साथ फिर ब्रजमें आयेंगे। तदनन्तर अपने नारायण-अंशको द्वारकापुरीमें भेजकर ये जगदीश्वर गोलोकनाथ यहाँ राधाके साथ समस्त आवश्यक कार्य पूर्ण करेंगे तथा ब्रजवासियों एवं राधाको साथ लेकर शीघ्र ही गोलोकधाममें पधारेंगे। नारायणदेव तुम्हें साथ लेकर वैकुण्ठ पधारेंगे। नर-नारायण नामक जो दोनों ऋषि हैं, वे धर्मके घरको चले जायँगे तथा श्वेतद्वीपनिवासी विष्णु क्षीरसागरको पधारेंगे।
नन्द! इस प्रकार भविष्यमें होनेवाली लीलाओंका वर्णन मैंने किया है। यह वेदका निश्चित मत है। अब इस समय जिस उद्देश्यसे मेरा आना
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ४७५ हुआ है, उसे बताता हूँ; सुनो। माघ शुक्ल चतुर्दशीकी शुभ बेलामें इन बालकोंका संस्कार करो। उस दिन गुरुवार है। रेवती नक्षत्र है। चन्द्र और तारा शुद्ध हैं। मीनके चन्द्रमा हैं। उसपर लग्नेशकी पूर्ण दृष्टि है। उत्तम वणिज नामक करण है और मनोहर शुभ योग है। वह दिन परम दुर्लभ है। उसमें सभी उत्कृष्ट एवं उपयोगी योगोंका उदय हुआ है। अतः पण्डितोंके साथ विचार करके उसी दिन प्रसन्नतापूर्वक संस्कार- कर्मका सम्पादन करो। ऐसा कह मुनीश्वर गर्ग बाहर आकर बैठ गये। नन्द और यशोदाको बड़ा हर्ष हुआ और वे संस्कार-कर्मके लिये तैयारी करने लगे। इसी समय गर्गजीको देखनेके लिये गोप-गोपियाँ और बालक-बालिकाएँ नन्दभवनमें आयीं। उन्होंने देखा - मुनिश्रेष्ठ गर्ग मध्याह्नकालके सूर्यकी भाँति प्रकाशित हो रहे हैं। शिष्यसमूहोंसे घिरकर ब्रह्मतेजसे उद्भासित हो रहे हैं और प्रश्न पूछनेवाले किसी सिद्धपुरुषको वे प्रसन्नतापूर्वक गूढ़योगका रहस्य समझा रहे हैं। नन्दभवनकी एक-एक सामग्रीको मुस्कराते हुए देख रहे हैं और योगमुद्रा धारण किये स्वर्णसिंहासनपर बैठे हैं। ज्ञानमयी दृष्टिसे भूत, वर्तमान और भविष्यको भी देख रहे हैं। वे मन्त्रके प्रभावसे अपने हृदयमें परमात्माके जिस सिद्ध स्वरूपको देखते हैं, उसीको मुस्कराते हुए शिशुके रूपमें बाहर यशोदाकी गोदमें देख रहे हैं। महेश्वरके बताये हुए ध्यानके अनुसार जिस रूपका उन्हें साक्षात्कार हुआ था, उसी पूर्णकाम परमात्मस्वरूपका अत्यन्त प्रीतिपूर्वक दर्शन करके नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए वे पुलकित शरीरसे भक्तिके सागरमें निमग्न दिखायी देते थे। योगचर्याके अनुसार मन-ही-मन भगवान्की पूजा और प्रणाम करते थे। गोप-गोपियोंने मस्तक झुकाकर उन्हें प्रणाम किया और गर्गजीने भी उन सबको आशीर्वाद दिया। तदनन्तर मुनि अपने आसनपर विराजमान हुए और वे समागत स्त्री-पुरुष अपने-अपने घरको गये। नन्दने आनन्दित होकर निकटवर्ती तथा दूरवर्ती बन्धुजनोंके पास शीघ्र ही मङ्गलपत्रिका पठायी। इसके बाद उन्होंने दूध, दही, घी, गुड़, तेल, मधु, माखन, तक्र और चीनीके शर्बतसे भरी हुई बहुत-सी नहरें लीलापूर्वक तैयार करायीं। इसके बाद उन्होंने अगहनीके चावलोंके सौ ऊँचे-ऊँचे पर्वताकार ढेर लगवाये। चिउरोंके सौ पर्वत, नमकके सात, शर्कराके भी सात, लड्डुओंके सात तथा पके फलोंके सोलह पर्वत खड़े कराये। जौ, गेहूँके आटेके पके हुए लड्डुक, पिण्ड, मोदक तथा स्वस्तिक (मिष्टान्न- विशेष) -के अनेक पर्वत खड़े किये गये थे। कपर्दकोंके बहुत ही ऊँचे-ऊँचे सात पर्वत खड़े दिखायी देते थे। कर्पूर आदिसे युक्त ताम्बूलके बीडोंसे घर भरा हुआ था। सुवासित जलके चौड़े-चौड़े कुण्ड भरे गये थे, जिनमें चन्दन, अगुरु और केसर मिलाये गये थे। नन्दजीने कौतूहलवश नाना प्रकारके रत्न, भाँति-भाँतिके सुवर्ण, रमणीय मोती-मूँगे, अनेक प्रकारके मनोहर वस्त्र और आभूषण भी पुत्रके अन्न- प्राशन-संस्कारके लिये संचित किये थे। आँगनको झाड़-बुहारकर सुन्दर बनाया गया। उसमें चन्दनमिश्रित जलका छिड़काव किया गया। केलेके खंभों, आमके नये पल्लवोंकी बन्दनवारों और महीन वस्त्रोंसे उस आँगनको कौतुकपूर्वक सब ओरसे घेर दिया गया। यथास्थान मङ्गल-कलश स्थापित किये गये। उन्हें फलों और पल्लवोंसे सजाया गया तथा चन्दन, अगुरु, कस्तूरी एवं फूलोंके गजरोंसे सुशोभित किया गया। सुन्दर पुष्पहारों और मनोहर वस्त्रोंकी राशियोंसे नन्द-भवनके आँगनको सजाया गया था। उसमें गौओं, मधुपर्कों, आसनों, फलों और सजल कलशोंके
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समूह यथास्थान रखे गये थे। वहाँ नाना प्रकारके अत्यन्त दुर्लभ और मनोहर वाद्य बज रहे थे। ढक्का, दुन्दुभि, पटह, मृदङ्ग, मुरज, आनकसमूह, वंशी, ढोल और झाँझ आदिके शब्द हो रहे थे। विद्याधरियोंके नृत्य, भाव-भंगी तथा भ्रमणसे नन्दप्राङ्गणकी अपूर्व शोभा हो रही थी। उसके साथ ही गन्धर्वराजोंके मूर्छनायुक्त संगीत तथा स्वर्ण-सिंहासनों एवं रथोंके सम्मिलित शब्द वहाँ गूँज रहे थे।
इसी समय संदेशवाहकने प्रसन्नतापूर्वक आकर नन्दरायजीसे कहा—'प्रभो! आपके भाई-बन्धु गोपराज एवं गोपगण पधारे हैं। उनमेंसे कुछ लोग घोड़ोंपर चढ़कर आये हैं, कुछ हाथियोंपर सवार हैं और कितने ही रथोंपर आरूढ़ हो शीघ्रतापूर्वक पधारे हैं। रत्नमय अलंकारोंसे विभूषित कितने ही राजपुत्रोंका भी यहाँ शुभागमन हुआ है। पत्नी और सेवकोंसहित गिरिभानुजी पधारे हैं। उनके साथ चार-चार लाख रथ और हाथी हैं। घोड़े और शिविकाओंकी संख्या एक-एक करोड़ है। ऋषीन्द्र, मुनीन्द्र, विद्वान्, ब्राह्मण, बन्दीजन और भिक्षुकोंके समूह भी निकट आ गये हैं। गोप और गोपियोंकी गणना करनेमें कौन समर्थ हो सकता है? आप स्वयं बाहर चलकर देखें।'
आँगनमें खड़े हुए दूतने जब ऐसी बात कही, तब उसे सुनकर व्रजराज नन्दजी स्वयं उन समागत अतिथियोंके पास आये। उन सबको साथ ले आकर उन्होंने आँगनमें बिठाया और तत्काल ही उनका पूजन किया। ऋषि आदिके समुदायको उन्होंने धरतीपर माथा टेककर प्रणाम किया और एकाग्रचित्त हो उन सबके लिये पाद्य आदि समर्पित किये। उस समय नन्दगोकुल विभिन्न प्रकारकी वस्तुओं तथा गोपबन्धुओंसे परिपूर्ण हो रहा था। वहाँ कोई किसीके शब्दको नहीं सुन सकता था। साक्षात् कुबेरने श्रीकृष्णकी प्रसन्नताके लिये वहाँ तीन मुहूर्ततक सुवर्णकी वर्षा करके गोकुलको सोनेसे भर दिया। नन्दकी यह सम्पत्ति देखकर उनके सभी भाई-बन्धु लज्जासे नतमस्तक हो गये। उन्होंने अपने कौतूहलको छिपा लिया। नन्दजीने नित्यकर्म करके पवित्र हो दो धुले वस्त्र धारण किये। चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और केसरसे अपने ललाट आदि अङ्गोंमें तिलक किया। इसके बाद गर्गजी तथा मुनीश्वरोंकी आज्ञा ले व्रजेश्वर नन्द दोनों पैर धोकर सोनेके मनोहर पीढ़ीपर बैठे। उन्होंने श्रीविष्णुका स्मरण करके आचमन किया। फिर ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर वेदोक्त कर्मका सम्पादन करनेके अनन्तर बालकको भोजन कराया। आनन्दमग्न हुए नन्दजीने मुनिवर गर्गके कथनानुसार शुभ बेलामें बालकका मङ्गलमय नाम रखा—'कृष्ण'। इस प्रकार जगदीश्वरको सघृत भोजन कराकर उनका नामकरण करनेके अनन्तर नन्दरायने बाजे बजवाये और मङ्गल-कृत्य करवाये। उन्होंने ब्राह्मणोंको प्रसन्नतापूर्वक नाना प्रकारके सुवर्ण, भाँति-भाँतिके धन, भक्ष्य पदार्थ और वस्त्र दिये। बन्दीजनों और भिक्षुकोंको इतनी अधिक मात्रामें उन्होंने सुवर्ण बाँटा कि सुवर्णके भारी भारसे आक्रान्त होनेके कारण वे सब-के-सब चल नहीं पाते थे। ब्राह्मणों, बन्धुजनों और विशेषतः भिक्षुकोंको भी उन्होंने पूर्णतया मनोहर मिष्टान्नका भोजन कराया। उस समय नन्दगोकुलमें बड़े जोर-जोरसे निरन्तर यही शब्द सुनायी देता था कि 'दो और दो।' 'खाओ-खाओ'। परिपूर्ण रत्न, वस्त्र, आभूषण, मूँगे, सुवर्ण, मणिसार तथा विश्वकर्माके बनाये हुए मनोहर सुवर्णपात्र वहाँ ब्राह्मणोंको बाँटे गये। व्रजराज नन्दने गर्गजीके पास जाकर विनयपूर्वक अपनी इच्छा प्रकट की और नम्रतापूर्वक उनके शिष्योंको तथा शेष द्विजोंको सुवर्णके अनेक भार पूर्ण मात्रामें प्रदान किये।
श्रीनारायण कहते हैं—नारद! श्रीहरिको
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ४७७
गोदमें लेकर गर्गजी एकान्त स्थानमें गये और बड़ी भक्ति एवं प्रसन्नतासे उन परमेश्वरको प्रणाम करके उनका स्तवन करने लगे। उस समय उनके नेत्रोंसे आँसू बह रहे थे। शरीरमें रोमाञ्च हो आया था। मस्तक भक्तिभावसे झुक गया था और श्रीकृष्णचरणारविन्दोंमें दोनों हाथ जोड़कर वे इस प्रकार बोल रहे थे।
गर्गजीने कहा— हे श्रीकृष्ण! हे जगन्नाथ! हे भक्तभयभञ्जन! आप मुझपर प्रसन्न होइये। परमेश्वर! मुझे अपने चरणकमलोंकी दास्य-भक्ति दीजिये। भक्तोंको अभय देनेवाले गोविन्द! आपके पिताजीने मुझे बहुत धन दिया है; किंतु उस धनसे मेरा क्या प्रयोजन है? आप मुझे अपनी अविचल भक्ति प्रदान कीजिये। प्रभो! अणिमादि सिद्धियोंमें, योगसाधनोंमें, अनेक प्रकारकी मुक्तियोंमें, ज्ञानतत्त्वमें अथवा अमरत्वमें मेरी तनिक भी रुचि नहीं है। इन्द्रपद, मनुपद तथा चिरकालतक स्वर्गलोकरूपी फलके लिये भी मेरे मनमें कोई इच्छा नहीं है। मैं आपके चरणोंकी सेवा छोड़कर कुछ नहीं चाहता। सालोक्य, सार्ष्टि, सारूप्य, सामीप्य और एकत्व—ये पाँच प्रकारकी मुक्तियाँ सभीको अभीष्ट हैं। परंतु परमात्मन्! मैं आपके चरणोंकी सेवा छोड़कर इनमेंसे किसीको भी ग्रहण करना नहीं चाहता। मैं गोलोकमें अथवा पातालमें निवास करूँ, ऐसा भी मेरा मनोरथ नहीं है; परंतु मुझे आपके चरणारविन्दोंका निरन्तर चिन्तन होता रहे, यही मेरी अभिलाषा है। कितने ही जन्मोंके पुण्यके फलका उदय हुआ, जिससे भगवान् शंकरके मुखसे मुझे आपके मन्त्रका उपदेश प्राप्त हुआ। उस मन्त्रको पाकर मैं सर्वज्ञ और समदर्शी हो गया हूँ। सर्वत्र मेरी अबाध गति है। कृपासिन्धो! दीनबन्धो! मुझपर कृपा कीजिये। मुझे अभय देकर अपने चरणकमलोंमें रख लीजिये। फिर मृत्यु मेरा क्या करेगी? आपके चरणारविन्दोंकी सेवासे ही भगवान् शंकर सबके ईश्वर, मृत्युञ्जय, जगत्का अन्त करनेवाले तथा योगियोंके गुरु हुए हैं। ब्रह्मन्! जिनके एक दिनमें चौदह इन्द्रोंका पतन होता है, वे जगत्-विधाता ब्रह्मा आपके चरणकमलोंकी सेवासे ही उस पदपर प्रतिष्ठित हुए हैं। आपके चरणोंकी सेवा करके ही धर्मदेव समस्त कर्मोंके साक्षी हुए हैं; सुदुर्जय कालको जीतकर सबके पालक और फलदाता हुए हैं। आपके चरणारविन्दोंकी सेवाके प्रभावसे ही सहस्र मुखोंवाले शेषनाग सम्पूर्ण विश्वको सरसोंके एक दानेकी भाँति सिरपर धारण करते हैं। ठीक उसी तरह, जैसे भगवान् शिव कण्ठमें विष धारण करते हैं। जो सम्पूर्ण सम्पदाओंकी सृष्टि करनेवाली तथा देवियोंमें परातपरा हैं, वे लक्ष्मीदेवी अपने केश-कलापोंसे आपके चरणोंका मार्जन करती हैं। जो सबकी बीजरूपा हैं, वे शक्तिरूपिणी प्रकृति आपके चरणकमलोंका चिन्तन करते-करते उन्हींमें तत्पर हो जाती हैं। सबकी बुद्धिरूपिणी एवं सर्वरूपा पार्वतीने आपके चरणोंकी सेवासे ही महेश्वर शिवको प्राणवल्लभके रूपमें प्राप्त किया है। विद्याकी अधिष्ठात्री देवी जो ज्ञानमाता सरस्वती हैं, वे आपके चरणारविन्दोंकी आराधना करके ही सबकी पूजनीया हुई हैं। जो ब्रह्माजी तथा ब्राह्मणोंकी गति हैं, वे वेदजननी सावित्री आपकी चरणसेवासे ही तीनों लोकोंको पवित्र करती हैं। पृथ्वी आपके चरणकमलोंकी सेवाके प्रभावसे ही जगत्को धारण करनेमें समर्थ, रत्नगर्भा तथा सम्पूर्ण शस्योंको उत्पन्न करनेवाली हुई है। आपकी अंशभूता तथा आपके ही तुल्य तेजस्विनी राधा आपके वक्षःस्थलमें स्थान पाकर भी आपके चरणोंकी सेवा करती हैं; फिर दूसरेकी क्या बात है? ईश! जैसे शिव आदि देवता और लक्ष्मी आदि देवियाँ आपसे सनाथ हैं, उसी तरह मुझे भी सनाथ कीजिये; क्योंकि ईश्वरकी सबपर समान कृपा होती है। नाथ! मैं घरको नहीं जाऊँगा।