भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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सम्पादकीय वक्तव्य

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( प्रथम संस्करण से )

प्रिय पाठकबुन्द,

“ब्रह्मचर्य ही जीवन है और वीर्यनाश ही मृत्यु है” यह सार गर्भित और महत्वपूर्ण सिद्धान्त अक्षरशः सत्य है। देश में ब्रह्मचर्य का कितना पतन हुआ है यह हम और आप सभी जानते हैं। विद्यार्थियों के साथ २४ घण्टे रहने के कारण हमें अच्छी तरह ज्ञात है कि वीर्यनाश के कैसे कैसे विचित्र विचित्र कृत्रिम उपाय निकाले गये हैं, जिनके स्मरण मात्र से शरीर के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। वीस, वीस पचीस पचीस वर्ष के नवयुवकों के कपोल पिचके हुये हैं और ये इस तरुण अवस्था ही में वृद्धि दिखलाई पड़ते हैं। उसमें इन नवजवानों का भी दोष नहीं है। दोष है शिक्षकों और विशेष कर आप लोगों का, जो उनके माता पिता होने का दम भरते हैं। अधिकतर शिक्षक पाठशालाओं में केवल इतिहास, भूगोल, गणित और अङ्गरेजी आदि विषय पढ़ाना और उन्हें बुटवाना ही, अपना मुख्य ध्येय समझते हैं; ब्रह्मचर्य विषय पर किसी प्रकार की चर्चा करना नापसन्द करते हैं। लड़के गाली बकते हैं, व्यभिचार करते हैं और आप ( उनके माता-पिता ) ऐसी ऐसी गम्भीर और ध्यान देने योग्य बातों को यों ही टाल देते हैं।

हमारी इच्छा है यह पुस्तक आप पढ़ें और यदि आप का पुत्र सबोव है, तो उसके हाथ में यह दिव्य पुस्तक रखें और उससे इसी पुस्तक के नियमों के आधार पर अपना चरित्र ढालने का