भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

पृष्ठ 11, कुल 199 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 11

( २ )

अनुरोध करें। आप का बच्चा निस्सन्देह तेजस्वी होगा, निरोग होगा, साहसी होगा, दीर्घजीवी होगा और सच्चा देश-भक्त निकलेगा।

यह ग्रन्थ पूर्ण मौलिक है। इसके लेखक स्वामी शिवानन्द नाम के एक युवा गृहस्थ सन्यासी हैं। लगभग ७ वर्ष पूर्व हमारा और आपका परिचय पहले पहल मिर्जापुर में हुआ था। मिर्जापुर में आप करीब ३ वर्ष रहे। पाठशाला से जब हमें सावकाश मिलता था, तो प्रायः हम आप के पास जाया करते थे। आप की आयु इस समय (सन् १९२२ में) ३२ वर्ष की है और यद्यपि आप का विवाह हो गया है किन्तु आप पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन कर रहे हैं।

स्वामी जी के विचार, स्वामी जी का रूप और स्वामी जी की दिन-चर्या इत्यादि को देखकर आपके प्रति हमारे हृदय में बड़ी श्रद्धा उत्पन्न हुई। सौभाग्यवश आपकी भी हमारे ऊपर बड़ी कृपा हुई। अन्योन्य प्रसन्नता से हमारा और स्वामी जी का सम्बन्ध और भी अगाढ़ हो गया और हमारे जीवन में आप के सत्सङ्ग से बहुत परिवर्तन हुआ।


*अथ स्वामी जी की धर्मपत्नी का ता १० २९ फरवरी १९२६ गुरुवार के दिन 'स्वर्गवास' हुआ है। आप बड़ी ही सत्यशील सती देवी थीं। आप पतिव्रता स्त्रियों में 'मूर्तिमात्रा' आदर्श थीं। मृत्यु के समय 'माताजी' की आयु केवल २५ वर्ष की थी। हमने 'माताजी' को प्रत्यक्ष देखा था इस कारण विशेषतः हमें यह अशुभ समाचार सुनकर बहुत ही दुःख हुआ है। परमात्मा इस सती की आत्मा को पूर्ण शान्ति और स्वामी जी को पूर्ण धैर्य प्रदान करे।

—सम्पादक