ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
A completely blank white page with no visible content, text, or markings.
छात्र-हितकारी पुस्तकमाला—संख्या ५
16
ब्रह्मचर्य ही जीवन है
( Brahmacharya is life )
“ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्युमुपाश्रत”
—वेद
स्वामी शिवानन्द
A completely blank white page with no visible content, text, or markings.
❁ ओरेम् ❁
ब्रह्मचर्य ही जीवन है
और
वीर्यनाश ही मृत्यु है
Brahmacharya is Life
and
Sensuality is death
लेखक
स्वामी शिवानन्द
प्रकाशक
केदारनाथ गुप्त
ज्ञानदितकारी-पुस्तकमाला
दारागंज, इलाहाबाद
—:०:—
All rights reserved
वाँ संस्करण } ₹०००
जनवरी १९२९
{ मूल्य III)
प्रकाशक—
केदारनाथ गुप्त
मैनेजिंग-प्रोमोडर
छात्रदितकारी-पुस्तकमाला
दारागंज, प्रयाग
प्रथम संस्करण सन् १९२२—१०००
द्वितीय , , फरवरी सन् १९२५—२०००
तृतीय , , दिसम्बर सन् १९२६—२०००
चतुर्थ , , दिसम्बर सन् १९२७—२०००
पंचम , , जनवरी सन् १९२९—३०००
सुत्रक—
पं० विश्वम्भरनाथ वाजपेयी
ओंकार प्रेस,
इलाहाबाद
A completely blank white page with no visible content, text, or markings.
भारत-वीर.
श्रीजुम्मादादा-व्यायाम-मन्दिरके संस्थापक व संचालक
आदर्श बालमहन्वारी नरकेशरी राजरत्न भो० माणिकराव-बडोदा.
समर्पण-पत्र
एकोऽहं असहायोऽहं कृशोऽहं अपरिच्छुदः । स्वप्नेप्येव विधा चिन्ता मृगेन्द्रस्य न जायते ॥ १ ॥
परम सन्माननीय व श्रद्धास्पद योग, मल्ल तथा शास्त्रविद्या- विशारद सिंहतुल्य अत्यन्त निर्भय, शूर व बलवान परम तेजस्वी, ओजस्वी, यशस्वी, पूर्ण सदाचारी, अतीव देशहितकारी, महत्- परोपकारी कर्मवीर, निस्सीम नम्र, निर्मल व शान्त नरकेशरी आदर्श बालब्रह्मचारी,
प्रोफेसर माणिकरावजी
के परम पवित्र, कठोर, अखण्ड व दिव्य ब्रह्मचर्य व्रत को वा तपस्या को यह वामन-कृति सप्रेम व सावर समर्पित ! भवदीय नम्र वन्द्यु
शिवानन्द
ॐ !
A completely blank white page with no visible content, text, or markings.
सम्पादकीय वक्तव्य
—:०:—
( प्रथम संस्करण से )
प्रिय पाठकबुन्द,
“ब्रह्मचर्य ही जीवन है और वीर्यनाश ही मृत्यु है” यह सार गर्भित और महत्वपूर्ण सिद्धान्त अक्षरशः सत्य है। देश में ब्रह्मचर्य का कितना पतन हुआ है यह हम और आप सभी जानते हैं। विद्यार्थियों के साथ २४ घण्टे रहने के कारण हमें अच्छी तरह ज्ञात है कि वीर्यनाश के कैसे कैसे विचित्र विचित्र कृत्रिम उपाय निकाले गये हैं, जिनके स्मरण मात्र से शरीर के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। वीस, वीस पचीस पचीस वर्ष के नवयुवकों के कपोल पिचके हुये हैं और ये इस तरुण अवस्था ही में वृद्धि दिखलाई पड़ते हैं। उसमें इन नवजवानों का भी दोष नहीं है। दोष है शिक्षकों और विशेष कर आप लोगों का, जो उनके माता पिता होने का दम भरते हैं। अधिकतर शिक्षक पाठशालाओं में केवल इतिहास, भूगोल, गणित और अङ्गरेजी आदि विषय पढ़ाना और उन्हें बुटवाना ही, अपना मुख्य ध्येय समझते हैं; ब्रह्मचर्य विषय पर किसी प्रकार की चर्चा करना नापसन्द करते हैं। लड़के गाली बकते हैं, व्यभिचार करते हैं और आप ( उनके माता-पिता ) ऐसी ऐसी गम्भीर और ध्यान देने योग्य बातों को यों ही टाल देते हैं।
हमारी इच्छा है यह पुस्तक आप पढ़ें और यदि आप का पुत्र सबोव है, तो उसके हाथ में यह दिव्य पुस्तक रखें और उससे इसी पुस्तक के नियमों के आधार पर अपना चरित्र ढालने का
( २ )
अनुरोध करें। आप का बच्चा निस्सन्देह तेजस्वी होगा, निरोग होगा, साहसी होगा, दीर्घजीवी होगा और सच्चा देश-भक्त निकलेगा।
यह ग्रन्थ पूर्ण मौलिक है। इसके लेखक स्वामी शिवानन्द नाम के एक युवा गृहस्थ सन्यासी हैं। लगभग ७ वर्ष पूर्व हमारा और आपका परिचय पहले पहल मिर्जापुर में हुआ था। मिर्जापुर में आप करीब ३ वर्ष रहे। पाठशाला से जब हमें सावकाश मिलता था, तो प्रायः हम आप के पास जाया करते थे। आप की आयु इस समय (सन् १९२२ में) ३२ वर्ष की है और यद्यपि आप का विवाह हो गया है किन्तु आप पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन कर रहे हैं।
स्वामी जी के विचार, स्वामी जी का रूप और स्वामी जी की दिन-चर्या इत्यादि को देखकर आपके प्रति हमारे हृदय में बड़ी श्रद्धा उत्पन्न हुई। सौभाग्यवश आपकी भी हमारे ऊपर बड़ी कृपा हुई। अन्योन्य प्रसन्नता से हमारा और स्वामी जी का सम्बन्ध और भी अगाढ़ हो गया और हमारे जीवन में आप के सत्सङ्ग से बहुत परिवर्तन हुआ।
*अथ स्वामी जी की धर्मपत्नी का ता १० २९ फरवरी १९२६ गुरुवार के दिन 'स्वर्गवास' हुआ है। आप बड़ी ही सत्यशील सती देवी थीं। आप पतिव्रता स्त्रियों में 'मूर्तिमात्रा' आदर्श थीं। मृत्यु के समय 'माताजी' की आयु केवल २५ वर्ष की थी। हमने 'माताजी' को प्रत्यक्ष देखा था इस कारण विशेषतः हमें यह अशुभ समाचार सुनकर बहुत ही दुःख हुआ है। परमात्मा इस सती की आत्मा को पूर्ण शान्ति और स्वामी जी को पूर्ण धैर्य प्रदान करे।
—सम्पादक
( ३ )
आप को मालूम था कि मैं एक ग्रन्थमाला का सम्पादक भी हूँ; अतएव आपने मेरे ऊपर बड़ी कृपा करके 'ब्रह्मचर्य' विषय पर एक उत्तम ग्रन्थ लिख कर देने का वचन दिया और वह वचन शीघ्र पूरा भी किया गया। यद्यपि यह ग्रन्थ हमारे पास क़रीब एक वर्ष से लिखा रक्खा था किन्तु धनाभाव और पाठशाला सम्बन्धी काय्यर्वाहुल्य के कारण हम इसे शीघ्र प्रकाशित न कर सके। इसके लिये हम आप लोगों से और स्वामीजी से चूमा माँगते हैं।
इस ग्रन्थ को स्वामी जी ने बहुत से ग्रन्थों का ध्यानपूर्वक अध्ययन करके लिखा है और उसमें अपने अनुभव का भी पूर्ण समावेश किया है। इस कारण यह ग्रन्थ बड़े ही महत्व का हुआ है। इस ग्रन्थ को पढ़ने और उसके अनुसार चलने से पतित से पतित मनुष्य का भी जीवनप्रवाह अवश्य बदल सकता है, इसमें कुछ भी शङ्का नहीं है।
हमारी आप से अन्त में यही प्रार्थना है कि आप स्वामी जी के लिये हुये इस अनुपम ग्रन्थ को पढ़ें, मनन करें, स्वयं नियमों का पालन करें और अपने बाल वच्चों से भी पालन करावें। यदि हमें प्रोत्साहन मिला, कि आप लोगों ने इस ग्रन्थ को अपनाया है, तो हम अपने को धन्य मानेंगे और दूसरे संस्करण में हम ग्रन्थ को बढ़ाने का प्रयत्न करेंगे।
दारागंज हाईस्कूल, प्रयाग } जेष्ठ विजयादशमी १९७९ }
केदारनाथ गुप्त
आत्रहितकारी पुस्तकमाला
के
स्थायी ग्राहक बनने के नियम
( १ ) इस ग्रन्थ माला में नवयुवकोपयोगी सदाचार स्वास्थ्य, नीति तथा चरित सम्बन्धी मौलिक तथा अनुवादित पुस्तकें प्रकाशित की जाती हैं ।
( २ ) इसमें इतिहास, जीवनी, उपन्यास, नाटक गल्प, तथा, अन्य साहित्यिक पुस्तकें प्रकाशित की जाती हैं जो उपर्युक्त उद्देश्य की पूर्ति करें ।
( ३ ) प्रत्येक सज्जन ॥) पेशगी जमा कर इस ग्रन्थमाला के स्थायी ग्राहक बन सकते हैं । उन्हें प्रत्येक प्रकाशित पुस्तक पर एक चौथाई कमीशन दिया जाता है ।
( ४ ) पहले की प्रकाशित पुस्तकों का लेना अथवा न लेना ग्राहकों की इच्छा पर निर्भर है । परन्तु भविष्य में प्रकाशित होने वाली पुस्तकों का लेना आवश्यक होगा । यदि सूचना पाते ही सूचित कर देंगे तो वह पुस्तक न भेजी जायगी ।
सैनेजर-आत्रहितकारी पुस्तकमाला, दारागंज, प्रयाग
विषयानुक्रमणिका
| विषय | पृष्ठांक |
|---|---|
| लेखक की भूमिका | १ |
| १ ब्रह्मचर्य्य की महिमा | ५ |
| २ अष्ट-मैथुन | ७ |
| ३ हस्तमैथुन और उसके दुष्परिणाम | |
| (अ) वीर्य्य नाश के मुख्य लक्षण | ८ |
| १३ | |
| ४ माता पिताओं का कर्तव्य | १७ |
| ५ वैद्य व डाक्टर | १९ |
| ६ ब्रह्मचर्य्य व आरोग्य | २१ |
| ७ ब्रह्मचर्य्य के विषय में प्रसाद | २४ |
| ८ ब्रह्मचर्य्य व आश्रम चतुष्टय | २७ |
| ९ ब्रह्मचर्य्य और विद्यार्थी | २९ |
| १० काम का दमन | ३१ |
| ११ प्रकृति का स्वभाव | ३८ |
| १२ मन व इंद्रियाँ | ४३ |
| १३ वीर्य्य की उत्पत्ति | ४४ |
| १४ गृहस्थी में ब्रह्मचर्य्य | ५० |
| १५ बाल विवाह | ५४ |
| १६ वीर्य्य का प्रचण्ड प्रताप | ५८ |
| १७ अज्ञान का फल मृत्यु है | ६५ |
| १८ वीर्य्यरक्षा के अन्तर्धे नियम | ६८ |
| १ पवित्र संकल्प | ७३ |
| २ पवित्र मांत्वभाव दृष्टि | ७६ |
| ३ सादी रहन सहन | ८२ |
| ४ सत्संगति | ८४ |
( २ )
| विषय | पृष्ठांक | |
|---|---|---|
| ५ सद्ग्रन्थवाचलोकन | ... | ... |
| ६ घर्षण-स्तान | ... | ... |
| ७ सादा व वाजा अल्पाहार | ... | ... |
| ८ निर्व्यसनता | ... | ... |
| ९ दो बार मलमूत्र त्याग | ... | ... |
| १० इन्द्रिय स्नान | ... | ... |
| ११ नियमित व्यायाम | ... | ... |
| १२ जल्दी सोना व जल्दी जागना | ... | ... |
| १३ प्राणायाम | ... | ... |
| १४ उपवास | ... | ... |
| १५ दृढ़प्रतिज्ञा | ... | ... |
| १६ डायरी | ... | ... |
| १७ सततोयोग | ... | ... |
| १८ स्वधर्मानुष्ठान | ... | ... |
| १९ नियमितता | ... | ... |
| २० लंगोटबन्द रहना | ... | ... |
| २१ खड़ाऊँ | ... | ... |
| २२ पैदल चलना | ... | ... |
| २३ लोकनिन्दा का भय | ... | ... |
| २४ ईश्वर भक्ति | ... | ... |
| २५ नित्य नियमावली का पाठ | ... | ... |
| १९ सम्पूर्ण सुधारों का दादा ब्रह्मचर्य | ... | ... |
| २० हमारी भारत-माता | ... | ... |
| परिशिष्ट (योग-चिकित्सा) | ... | ... |
A completely blank white page with no visible content, text, or markings.
श्रीमत् स्वामी शिवानन्द महाराज, आश्रम-वरुड, ( जि० अमरावती । ) P.O.-WARUD, ( Dist. Amraoti. )
भूमिका
प्रथम संस्करण से
“मूकं करोति वाचालं पंगुं” लंघयते गिरिम् ।
यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्द माधवम् ॥ १ ॥
इस छोटे से ग्रन्थ में सर्वत्र स्वानुभव-प्रकाश और साथ ही साथ शास्त्र व परानुभव-प्रकाश भी किया है। इसमें अनुभव की बातें कूट कूट कर भरी होने के कारण यह ग्रन्थ और भी महत्व का हुआ है। इसका मुख्य विषय “Chastity is Life and Sensuality is Death” यानी “ब्रह्मचर्य ही जीवन है और वीर्यनाश ही मृत्यु है” यह है। जब शरीर में से चैतन्य निकल जाता है तब उसके साथ ही साथ रक्त और वीर्य, ये दो जीवन-प्रद तत्व भी मृत्यु के बाद शीघ्र ही गायब हो जाते हैं; और उनका पानी बन जाता है। जिस मनुष्य को हैजा होता है उसके रक्त का पानी बनने लग जाता है और वही पानी फिर कैं और दस्त के द्वारा बाहर निकलने लगता है। कोई अंग काटने पर भी उसके शरीर से खून नहीं निकलता; पश्चात् वह बहुत जल्द मृत्यु को प्राप्त होता है। अतः यह सिद्ध है कि “जब तक मनुष्य के शरीर में रक्त व वीर्य ये दो चीजें मौजूद हैं, तभी तक वह जीवित रह सकता है और इनका नाश होने से उसका भी तत्काल नाश हो जाता है। जितना मनुष्य वीर्य का नाश करता है उतना ही वह रक्त-विहीन बन कर मृत्यु की ओर घराघरा भुक्तता जाता है। जितना अधिक मनुष्य वीर्य को धारण करता है उतना ही अधिक वह सजीव बनता जाता
[ २ ]
है; उसमें शक्ति, तेज, निश्चय, सामर्थ्य, पुरुषार्थ, बुद्धि, सिद्धि और ईश्वरत्व प्रगट होने लगते हैं और वह दीर्घकाल पर्यन्त जीवनलाभ कर सकता है। वीर्य हीन पुरुष को कोई भी तार नहीं सकता और वीर्यवान पुरुष को कोई भी ( रोग ) अकाल में मार नहीं सकता ! दुर्बल को ही सब कोई सताते हैं । “दैवो दुर्वलघातकः” यही प्रकृति का नियम है । सच पृच्छिए तो “वीर्य ही अमृत* है ।” इसी के रक्षा करने से अर्थात् धारण करने से मनुष्य अजर अमर होता है । भीष्म पितामह इसी संजीवनी शक्ति के कारण अमर ( यानी अकाल में मृत्यु न पाने वाले ) और इतने सामर्थ्य-संपन्न हुए थे । यदि हम भी इस की रक्षा करें अर्थात् वीर्य रोक कर ब्रह्मचर्य धारण करेंगे, तो हम भी वैसे ही प्रभावशाली और उन्नतिशाली बन सकते हैं । क्योंकि वीर्य रक्षा ही आत्मोद्धार का रहस्य है और इसी में जीवमात्र का जीवन है ।
इस ग्रन्थ में वीर्यरक्षा सम्बन्धी जो अन्तः और स्वातुभूत नियम बतलाये गये हैं वे बहुत ही अनमोल हैं ! स्वतः अनुभव किये होने के कारण वे अत्यन्त ही सिद्ध हैं—रामवाण हैं—कभी भी निष्फल होने वाले नहीं हैं । केवल नियम ही भर पढ़ लेने से मनुष्य वीर्यरक्षा करने में निःसन्देह समर्थ हो सकता है, परन्तु यदि वह इस ग्रन्थ को “आद्योपान्त” पढ़ लेगा तो वह उन नियमों का मर्म भली भाँति समझ जायगा और उसमें वीर्यरक्षा के लिये एक अद्भुत जोश पैदा होगा, जिससे वह उन्नति अवश्य करेगा । आप स्वयं अनुभव करके देख लीजिये ।
क्या तुम जीवित रहना चाहते हो ? तब फिर तुम्हें अवश्य ही वीर्य के नाश से बचना होगा और इस ग्रन्थ में दिये हुये नियमों
*शास्त्र में अमृत का रूप ‘यूध्द’ वर्णन किया है ।
[ ३ ]
के अनुसार मन, क्रम, वचन से चलना होगा। जो मनुष्य इन नियमों के अनुसार केवल दो ही साल तक चलेगा उसका जीवन-प्रवाह बिल्कुल ही बदल जायगा, शरीर और मन में अद्भुत परिवर्तन होगा, पापात्मा भी निःसंशय पुरयात्मा बन जायगा ! व्यभिचारी भी ब्रह्मचारी बन जायगा !! और दुर्बल भी सिंह तथा दुरात्मा भी साधु महात्मा बन सकेगा !!!
पर हाँ, नियमों को किसी कारण तोड़ना न होगा ! उन्हें दृढ़ता के साथ निवाहना होगा। यदि कोई जीवन-पर्यन्त इन नियमों के अनुसार चले तो फिर कहना ही क्या है ? वह इस मृत्युलोक में ही देवता के तुल्य पूजनीय बन जायगा, इसमें कोई सन्देह नहीं है।
इस ग्रन्थ में दिये हुये ब्रह्मचर्य-पालन के नियम अत्यन्त ही सरल व सुलभ हैं। उनमें एक कौड़ी का भी खर्च नहीं है। जैसे हम पालन कर रहे हैं वैसे आप भी पालन कर सकते हैं। यदि दिल से निश्चय करलो तो क्या नहीं हो सकता ? “Resolution is victory” अर्थात् निश्चय ही वल है और निश्चय ही फल है !
प्रत्येक मनुष्य में ईश्वरीय शक्ति वास कर रही है। दया, क्षमा, शान्ति, परोपकार, भक्ति, प्रेम, वीरता, स्वतंत्रता, सत्य और कृकर्म से अरुचि इन सब के अंकुर हृदय में रक्खे हुए हैं चाहे उन्हें सींच कर बढ़ावो चाहे सुखा दो ?
परमात्मा सब को सुवृद्धि प्रदान करे और उनका उद्धार करे !
सब का नम्र वन्द्य—
शिवानन्द
ॐ ! ॐ !! ॐ !!!