भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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भूमिका

प्रथम संस्करण से

“मूकं करोति वाचालं पंगुं” लंघयते गिरिम् ।

यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्द माधवम् ॥ १ ॥

इस छोटे से ग्रन्थ में सर्वत्र स्वानुभव-प्रकाश और साथ ही साथ शास्त्र व परानुभव-प्रकाश भी किया है। इसमें अनुभव की बातें कूट कूट कर भरी होने के कारण यह ग्रन्थ और भी महत्व का हुआ है। इसका मुख्य विषय “Chastity is Life and Sensuality is Death” यानी “ब्रह्मचर्य ही जीवन है और वीर्यनाश ही मृत्यु है” यह है। जब शरीर में से चैतन्य निकल जाता है तब उसके साथ ही साथ रक्त और वीर्य, ये दो जीवन-प्रद तत्व भी मृत्यु के बाद शीघ्र ही गायब हो जाते हैं; और उनका पानी बन जाता है। जिस मनुष्य को हैजा होता है उसके रक्त का पानी बनने लग जाता है और वही पानी फिर कैं और दस्त के द्वारा बाहर निकलने लगता है। कोई अंग काटने पर भी उसके शरीर से खून नहीं निकलता; पश्चात् वह बहुत जल्द मृत्यु को प्राप्त होता है। अतः यह सिद्ध है कि “जब तक मनुष्य के शरीर में रक्त व वीर्य ये दो चीजें मौजूद हैं, तभी तक वह जीवित रह सकता है और इनका नाश होने से उसका भी तत्काल नाश हो जाता है। जितना मनुष्य वीर्य का नाश करता है उतना ही वह रक्त-विहीन बन कर मृत्यु की ओर घराघरा भुक्तता जाता है। जितना अधिक मनुष्य वीर्य को धारण करता है उतना ही अधिक वह सजीव बनता जाता