ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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है; उसमें शक्ति, तेज, निश्चय, सामर्थ्य, पुरुषार्थ, बुद्धि, सिद्धि और ईश्वरत्व प्रगट होने लगते हैं और वह दीर्घकाल पर्यन्त जीवनलाभ कर सकता है। वीर्य हीन पुरुष को कोई भी तार नहीं सकता और वीर्यवान पुरुष को कोई भी ( रोग ) अकाल में मार नहीं सकता ! दुर्बल को ही सब कोई सताते हैं । “दैवो दुर्वलघातकः” यही प्रकृति का नियम है । सच पृच्छिए तो “वीर्य ही अमृत* है ।” इसी के रक्षा करने से अर्थात् धारण करने से मनुष्य अजर अमर होता है । भीष्म पितामह इसी संजीवनी शक्ति के कारण अमर ( यानी अकाल में मृत्यु न पाने वाले ) और इतने सामर्थ्य-संपन्न हुए थे । यदि हम भी इस की रक्षा करें अर्थात् वीर्य रोक कर ब्रह्मचर्य धारण करेंगे, तो हम भी वैसे ही प्रभावशाली और उन्नतिशाली बन सकते हैं । क्योंकि वीर्य रक्षा ही आत्मोद्धार का रहस्य है और इसी में जीवमात्र का जीवन है ।
इस ग्रन्थ में वीर्यरक्षा सम्बन्धी जो अन्तः और स्वातुभूत नियम बतलाये गये हैं वे बहुत ही अनमोल हैं ! स्वतः अनुभव किये होने के कारण वे अत्यन्त ही सिद्ध हैं—रामवाण हैं—कभी भी निष्फल होने वाले नहीं हैं । केवल नियम ही भर पढ़ लेने से मनुष्य वीर्यरक्षा करने में निःसन्देह समर्थ हो सकता है, परन्तु यदि वह इस ग्रन्थ को “आद्योपान्त” पढ़ लेगा तो वह उन नियमों का मर्म भली भाँति समझ जायगा और उसमें वीर्यरक्षा के लिये एक अद्भुत जोश पैदा होगा, जिससे वह उन्नति अवश्य करेगा । आप स्वयं अनुभव करके देख लीजिये ।
क्या तुम जीवित रहना चाहते हो ? तब फिर तुम्हें अवश्य ही वीर्य के नाश से बचना होगा और इस ग्रन्थ में दिये हुये नियमों
*शास्त्र में अमृत का रूप ‘यूध्द’ वर्णन किया है ।