ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ३ )
आप को मालूम था कि मैं एक ग्रन्थमाला का सम्पादक भी हूँ; अतएव आपने मेरे ऊपर बड़ी कृपा करके 'ब्रह्मचर्य' विषय पर एक उत्तम ग्रन्थ लिख कर देने का वचन दिया और वह वचन शीघ्र पूरा भी किया गया। यद्यपि यह ग्रन्थ हमारे पास क़रीब एक वर्ष से लिखा रक्खा था किन्तु धनाभाव और पाठशाला सम्बन्धी काय्यर्वाहुल्य के कारण हम इसे शीघ्र प्रकाशित न कर सके। इसके लिये हम आप लोगों से और स्वामीजी से चूमा माँगते हैं।
इस ग्रन्थ को स्वामी जी ने बहुत से ग्रन्थों का ध्यानपूर्वक अध्ययन करके लिखा है और उसमें अपने अनुभव का भी पूर्ण समावेश किया है। इस कारण यह ग्रन्थ बड़े ही महत्व का हुआ है। इस ग्रन्थ को पढ़ने और उसके अनुसार चलने से पतित से पतित मनुष्य का भी जीवनप्रवाह अवश्य बदल सकता है, इसमें कुछ भी शङ्का नहीं है।
हमारी आप से अन्त में यही प्रार्थना है कि आप स्वामी जी के लिये हुये इस अनुपम ग्रन्थ को पढ़ें, मनन करें, स्वयं नियमों का पालन करें और अपने बाल वच्चों से भी पालन करावें। यदि हमें प्रोत्साहन मिला, कि आप लोगों ने इस ग्रन्थ को अपनाया है, तो हम अपने को धन्य मानेंगे और दूसरे संस्करण में हम ग्रन्थ को बढ़ाने का प्रयत्न करेंगे।
दारागंज हाईस्कूल, प्रयाग } जेष्ठ विजयादशमी १९७९ }
केदारनाथ गुप्त