भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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❁ सादा व ताजा अल्पाहार ❁

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पुरुष सदा रोगी, दुःखी, बुद्धिहीन, क्रोधी, लालची, आलसी, दुरिद्री अधर्मी, पापी और अल्पायु बन अन्त में नरकगामी होता है। ( गीता अ० १७ देखो )।

अतः जिन्हें ब्रह्मचर्य का पालन कर अपना उद्धार करता है, उन्हें चाहिये कि राजसी व तामसी आहार को छोड़कर दैवी तेज बढ़ाने वाला सात्विक अल्पाहार आज ही से शुरू कर दें। परन्तु यह ध्यान में रहे कि सात्विक भोजन भी वासी हो जाने पर तामसी बन जाता है और अधिक खा लेने से राजसी इतना ही नहीं बल्कि प्राण हरण करने जैसा महान तामसी भी बन जाता है, अतः अल्पाहार ही सात्विक आहार कहा जा सकता है।

“भोजन अच्छी तरह से कुचल कुचल कर खाना” यह प्रकृति का एक महत्वपूर्ण सिद्धान्त है। इससे मामूली भोजन भी अत्यन्त मिष्ठ व पुष्ट मालूम होता है। पश्चात् भी है मजे में पाखाना भी साफ होता है; भोजन भी कम लगता है और इस प्रकार दैहिक, आर्थिक तथा देश की दृष्टि से भी अधिक लाभ होता है। परन्तु जल्दी जल्दी खाने से मनुष्य सदा दुःखी, मलीन, कामी, पेट्ट, अतुस, रोगी; उदासीन, क्रोधी चिड़चिड़ा और अल्पायु बना रहता है। वह जमी और कञ्जियत भी इसी से हुआ करती है। जल्दी दांत दूटने का भी यही कारण है। पशुओं के दांत अन्त तक नहीं दूटते, इसका मुख्य कारण “चर्वित चर्वण” ही है। अतः दाँत से योग्य काम लो; क्योंकि पेट को दाँत नहीं होते। दाँत कुछ दिखलाने के लिये नहीं दिये गये हैं। यदि मनुष्य प्रत्येक मास ३०-४० बार अथवा प्रकृति के हिसाब से वत्तीस दाँत के लिये वत्तीस बार खूब चवा चवा के खावेगा तो आज वह जितना भोजन करता है उसके ६ (तिहाई)