भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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❁ आत्मचर्य ही जीवन है ❁

सात्विक अलपाहार किया करेगा तो उसकी कुसुद्धि आप से आप नष्ट हो जायगी और उसमें ईश्वरीय तेज प्रगट होने लगेगा। कुछ ही दिन तक अभ्यास करके देख लीजिये।

सात्विक आहार:—जो ताज़ा, रसयुक्त, हलका, स्नेहयुक्त, स्थिर (nutritious) मधुर, प्रिय हो। जैसे गेहूँ, चावल, जौ, साठी, मूंग, अरहर, चना, दूध, घी, चीनी, सेंधा नमक, रतालू (अकरकन्द) शुद्ध व पके फल, इनको सात्विक आहार कहते हैं।

राजसी आहार:—अत्यन्त उष्ण, कडुवा, तीता, नमकीन, अत्यन्त मीठा, सूखा, चरपरा, खट्टा, तैलयुक्त, द्रोपयुक्त, गरिष्ठ, जैसे पूड़ी, कचौरी, मालभूआ, भिठाई, खटा, लालमिर्च तेल, हींग, प्याज, लहसुन, गाजर उरद, मसूर, सरसों, मसाला, मांस, मछली, कलुआ, अंडा, शराब, चाय, काफी, डांफी, कोको, सोडा, लेमन, पान, तन्त्राकू, गाँजा, भाँग, अफीम, कोकेन, चरस, चखौल इनको राजसी आहार कहते हैं।

राजसी आहार से मन चंचल, कामी, क्रोधी, लालची और पापी बन जाता है; रोग, शोक, दुख, दैन्य बढ़ते हैं और, आयु, तेज, सामर्थ्य और सौभाग्य वेग के साथ घट जाते हैं। राजसी पुरुष कदापि ब्रह्मचारी नहीं हो सकता।

तामसी आहार:—तामसी आहार में राजसी आहार तो आता ही है; परन्तु उसके अलावा जो वासी रसहीन, गला हुआ, दुर्गन्धित, विषम (जैसे एक ही साथ तेल के व घी के पदार्थ खाना वगैरह) घृणित व निन्द्य होता है, इसको “तामसी आहार” कहते हैं।

तामसी आहार से मनुष्य अत्यन्त राक्षस बन जाता है। ऐसा