भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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❁ सादा व तात्ता अल्पहार ❁

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सके उतना ही खाय तो वह ब्रह्मचर्य को बड़ी आसानो से धारण कर सकता है और १०० वर्ष तक जीवित रह सकता है। इसी के बल पर सुप्रसिद्ध अमेरिकन यंत्रकार एडिसन कहते हैं “मैं सौ वर्ष पर्यन्त अवश्य जीवित रहूँगा।,,

“If you can conquer your tongue only, you are sure to conquer your whole body and mind at ease.” यदि तुम सिर्फ जिह्वा को वश में करो तो तुम्हारे मन व शरीर अनायास वश में हो जायेंगे इसमें कोई सन्देह नहीं है। जिह्वा को संस्कृत में रसना कहते हैं। क्योंकि वह शृंगार, चीर, शान्त आदि सभी नवरस की उत्पन्न करने वाली है। सात्विक भोजन से शान्तरस उत्पन्न होता है, राजसी भोजन से शृंगार रस और तामसी भोजन से वीभत्स रौद्रादि रस उत्पन्न होते हैं। जो रस अधिक बलवान होता है सम्पूर्ण रस उसी के अधीन हो जाते हैं। इसी लिए कहा है:—

आहारशुद्धोऽसत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्धो भ्रुवास्मृतिः।

स्मृतिलब्धे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षः ज्ञान्दोग्य ॥

“अर्थात् आहार की शुद्धि से सत्त्व की शुद्धि होती है, सत्त्व शुद्धि से बुद्धि निर्मल और निश्चयी बन जाती है, फिर पवित्र व निश्चयी बुद्धि से मुक्ति भी सुलभता से प्राप्त होती।” अतः जिन्हें काम क्रोधादिक से मुक्त होना है—उन पर विजय प्राप्त करना है—उन्हें चाहिए कि वे नित्य नियमित समय पर सात्विक अल्पाहार किया करें; क्योंकि कहा है ‘As a man eateth so he becometh’ जैसा मनुष्य भोजन करता है वैसा ही वह बन जाता है। यदि मनुष्य दो साल पर्यन्त लगातार सादा अर्थात्