भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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❁ अन्नचर्य ही जीवन है ❁

कम भोजन से वे कमजोर बन जाते हैं। इसी गंभीर सिद्धान्त को जानकर महर्षियों ने शाखों में उपवास का महत्व वर्णन किया है।

भक्तदास वामन ग्रन्थोत्तर में कहते हैं:—“निकम्मा कौन है ? पेट्। महापुरुष की क्या पहिचान है ? जो अपने को सब से छोटा समझता हो। महापुरुष कैसे बनें ? मन को वश में करने से। मन कैसे वश होय ? कम खाने से। कम खाना कैसे सीखे ? आहार को थोड़ा थोड़ा घटाने से। आहार कैसे घटे ? रोज सादा और प्राकृतिक भोजन करने से। सादा भोजन कैसे प्रिय लगे ? भूख के समय खाने से और प्रत्येक ग्रास ( कवर ) को खूब अच्छी तरह चवाने से। भूख का समय कैसे जाने ? नियम बांध लेने से और फिर बीच में कुछ भी न खाने से।”

संचमुच प्रकृति क अनुसार चलने ही से हम पेट्टपन से और तज्जन्य अनन्त विकारों से वच सकते हैं। भोजन में सौ प्रकार रहने से मनुष्य अक्सर ज्यादा खा लेता है और फिर सौ प्रकार से सौ विकार अवश्य ही उत्पन्न होते हैं।

आस्ट्रेलिया के प्रसिद्ध डाक्टर हर्न कहते हैं:—“मनुष्य जितना खा लेता है उसका तिहाई हिस्सा भी नहीं पचा सकता। बाकी पेट में रह कर रक्त को विपैला बनाकर असंख्य विकार पैदा करता है; जिससे कि प्राणशक्ति का दोहरा नाश होता है, एक तो इस फाल्गु भोजन को पचाने में और दूसरे उसको बाहर निकालने में।

यदि मनुष्य भोजन कम प्रकार के खाय, नमक-मिर्च मसाला से रहित सात्विक भोजन करे, प्रत्येक ग्रास को खूब महीन पीस कर चबा चबाकर खाय, शान्ति रखे और जितना पचा: