ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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❁ अन्नचर्य ही जीवन है ❁
कम भोजन से वे कमजोर बन जाते हैं। इसी गंभीर सिद्धान्त को जानकर महर्षियों ने शाखों में उपवास का महत्व वर्णन किया है।
भक्तदास वामन ग्रन्थोत्तर में कहते हैं:—“निकम्मा कौन है ? पेट्। महापुरुष की क्या पहिचान है ? जो अपने को सब से छोटा समझता हो। महापुरुष कैसे बनें ? मन को वश में करने से। मन कैसे वश होय ? कम खाने से। कम खाना कैसे सीखे ? आहार को थोड़ा थोड़ा घटाने से। आहार कैसे घटे ? रोज सादा और प्राकृतिक भोजन करने से। सादा भोजन कैसे प्रिय लगे ? भूख के समय खाने से और प्रत्येक ग्रास ( कवर ) को खूब अच्छी तरह चवाने से। भूख का समय कैसे जाने ? नियम बांध लेने से और फिर बीच में कुछ भी न खाने से।”
संचमुच प्रकृति क अनुसार चलने ही से हम पेट्टपन से और तज्जन्य अनन्त विकारों से वच सकते हैं। भोजन में सौ प्रकार रहने से मनुष्य अक्सर ज्यादा खा लेता है और फिर सौ प्रकार से सौ विकार अवश्य ही उत्पन्न होते हैं।
आस्ट्रेलिया के प्रसिद्ध डाक्टर हर्न कहते हैं:—“मनुष्य जितना खा लेता है उसका तिहाई हिस्सा भी नहीं पचा सकता। बाकी पेट में रह कर रक्त को विपैला बनाकर असंख्य विकार पैदा करता है; जिससे कि प्राणशक्ति का दोहरा नाश होता है, एक तो इस फाल्गु भोजन को पचाने में और दूसरे उसको बाहर निकालने में।
यदि मनुष्य भोजन कम प्रकार के खाय, नमक-मिर्च मसाला से रहित सात्विक भोजन करे, प्रत्येक ग्रास को खूब महीन पीस कर चबा चबाकर खाय, शान्ति रखे और जितना पचा:
❁ सादा व तात्ता अल्पहार ❁
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सके उतना ही खाय तो वह ब्रह्मचर्य को बड़ी आसानो से धारण कर सकता है और १०० वर्ष तक जीवित रह सकता है। इसी के बल पर सुप्रसिद्ध अमेरिकन यंत्रकार एडिसन कहते हैं “मैं सौ वर्ष पर्यन्त अवश्य जीवित रहूँगा।,,
“If you can conquer your tongue only, you are sure to conquer your whole body and mind at ease.” यदि तुम सिर्फ जिह्वा को वश में करो तो तुम्हारे मन व शरीर अनायास वश में हो जायेंगे इसमें कोई सन्देह नहीं है। जिह्वा को संस्कृत में रसना कहते हैं। क्योंकि वह शृंगार, चीर, शान्त आदि सभी नवरस की उत्पन्न करने वाली है। सात्विक भोजन से शान्तरस उत्पन्न होता है, राजसी भोजन से शृंगार रस और तामसी भोजन से वीभत्स रौद्रादि रस उत्पन्न होते हैं। जो रस अधिक बलवान होता है सम्पूर्ण रस उसी के अधीन हो जाते हैं। इसी लिए कहा है:—
आहारशुद्धोऽसत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्धो भ्रुवास्मृतिः।
स्मृतिलब्धे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षः ज्ञान्दोग्य ॥
“अर्थात् आहार की शुद्धि से सत्त्व की शुद्धि होती है, सत्त्व शुद्धि से बुद्धि निर्मल और निश्चयी बन जाती है, फिर पवित्र व निश्चयी बुद्धि से मुक्ति भी सुलभता से प्राप्त होती।” अतः जिन्हें काम क्रोधादिक से मुक्त होना है—उन पर विजय प्राप्त करना है—उन्हें चाहिए कि वे नित्य नियमित समय पर सात्विक अल्पाहार किया करें; क्योंकि कहा है ‘As a man eateth so he becometh’ जैसा मनुष्य भोजन करता है वैसा ही वह बन जाता है। यदि मनुष्य दो साल पर्यन्त लगातार सादा अर्थात्
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❁ आत्मचर्य ही जीवन है ❁
सात्विक अलपाहार किया करेगा तो उसकी कुसुद्धि आप से आप नष्ट हो जायगी और उसमें ईश्वरीय तेज प्रगट होने लगेगा। कुछ ही दिन तक अभ्यास करके देख लीजिये।
सात्विक आहार:—जो ताज़ा, रसयुक्त, हलका, स्नेहयुक्त, स्थिर (nutritious) मधुर, प्रिय हो। जैसे गेहूँ, चावल, जौ, साठी, मूंग, अरहर, चना, दूध, घी, चीनी, सेंधा नमक, रतालू (अकरकन्द) शुद्ध व पके फल, इनको सात्विक आहार कहते हैं।
राजसी आहार:—अत्यन्त उष्ण, कडुवा, तीता, नमकीन, अत्यन्त मीठा, सूखा, चरपरा, खट्टा, तैलयुक्त, द्रोपयुक्त, गरिष्ठ, जैसे पूड़ी, कचौरी, मालभूआ, भिठाई, खटा, लालमिर्च तेल, हींग, प्याज, लहसुन, गाजर उरद, मसूर, सरसों, मसाला, मांस, मछली, कलुआ, अंडा, शराब, चाय, काफी, डांफी, कोको, सोडा, लेमन, पान, तन्त्राकू, गाँजा, भाँग, अफीम, कोकेन, चरस, चखौल इनको राजसी आहार कहते हैं।
राजसी आहार से मन चंचल, कामी, क्रोधी, लालची और पापी बन जाता है; रोग, शोक, दुख, दैन्य बढ़ते हैं और, आयु, तेज, सामर्थ्य और सौभाग्य वेग के साथ घट जाते हैं। राजसी पुरुष कदापि ब्रह्मचारी नहीं हो सकता।
तामसी आहार:—तामसी आहार में राजसी आहार तो आता ही है; परन्तु उसके अलावा जो वासी रसहीन, गला हुआ, दुर्गन्धित, विषम (जैसे एक ही साथ तेल के व घी के पदार्थ खाना वगैरह) घृणित व निन्द्य होता है, इसको “तामसी आहार” कहते हैं।
तामसी आहार से मनुष्य अत्यन्त राक्षस बन जाता है। ऐसा
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पुरुष सदा रोगी, दुःखी, बुद्धिहीन, क्रोधी, लालची, आलसी, दुरिद्री अधर्मी, पापी और अल्पायु बन अन्त में नरकगामी होता है। ( गीता अ० १७ देखो )।
अतः जिन्हें ब्रह्मचर्य का पालन कर अपना उद्धार करता है, उन्हें चाहिये कि राजसी व तामसी आहार को छोड़कर दैवी तेज बढ़ाने वाला सात्विक अल्पाहार आज ही से शुरू कर दें। परन्तु यह ध्यान में रहे कि सात्विक भोजन भी वासी हो जाने पर तामसी बन जाता है और अधिक खा लेने से राजसी इतना ही नहीं बल्कि प्राण हरण करने जैसा महान तामसी भी बन जाता है, अतः अल्पाहार ही सात्विक आहार कहा जा सकता है।
“भोजन अच्छी तरह से कुचल कुचल कर खाना” यह प्रकृति का एक महत्वपूर्ण सिद्धान्त है। इससे मामूली भोजन भी अत्यन्त मिष्ठ व पुष्ट मालूम होता है। पश्चात् भी है मजे में पाखाना भी साफ होता है; भोजन भी कम लगता है और इस प्रकार दैहिक, आर्थिक तथा देश की दृष्टि से भी अधिक लाभ होता है। परन्तु जल्दी जल्दी खाने से मनुष्य सदा दुःखी, मलीन, कामी, पेट्ट, अतुस, रोगी; उदासीन, क्रोधी चिड़चिड़ा और अल्पायु बना रहता है। वह जमी और कञ्जियत भी इसी से हुआ करती है। जल्दी दांत दूटने का भी यही कारण है। पशुओं के दांत अन्त तक नहीं दूटते, इसका मुख्य कारण “चर्वित चर्वण” ही है। अतः दाँत से योग्य काम लो; क्योंकि पेट को दाँत नहीं होते। दाँत कुछ दिखलाने के लिये नहीं दिये गये हैं। यदि मनुष्य प्रत्येक मास ३०-४० बार अथवा प्रकृति के हिसाब से वत्तीस दाँत के लिये वत्तीस बार खूब चवा चवा के खावेगा तो आज वह जितना भोजन करता है उसके ६ (तिहाई)
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भोजन ही में उसकी पूरी वृत्ति हो जायगी और प्राण-शक्ति का भी बहुत कम नाश होगा; भोजन भी बहुत जल्द पचेगा; पाखाना भी साफ होगा और इन्द्रिय-दमन की भी शक्ति उसे बहुत जल्द प्राप्त होगी। लेखक का यह स्वयं अनुभव है। इसे कोई भी आजमा सकता है।
भोजन बिना अच्छी तरह चवाये जो जल्दी खा लेते हैं, वे जल्दी ही मर जाते हैं। चर्बित चर्वण से भोजन के प्रत्येक परमाणु से मनुष्य-प्राणतत्व को (जो कि प्राणिमात्र के जीवन का मुख्य आधार है उसको) ब्रह्म की भावना से विशेष र्खांच सकता है। अतः “अन्नं ब्रह्मेत्युपासीत।” अन्न में ब्रह्म-दृष्टि रखो और “अन्नं दृष्ट्वा प्रणम्यादौ।” अन्न को प्रथमतः प्रणाम करके फिर भोजन किया करो। योगी लोग ऐसे ही करते हैं और इसी कारण वे थोड़े ही भोजन में रुम हो जाते हैं और उनमें ब्रह्म-भावना के कारण दैवी सामर्थ्य प्रगट होता हुआ स्पष्ट दिखाई देता है। अमीरी भोजन करना मानों साक्षात् सौप पर पैर रखना है। ऐसे लोगों में काम क्रोध का विष बहुत ज्यादा फैला हुआ रहता है। इस बात का पता धनी लोगों पर दृष्टि डालने से तत्काल लग जाता है। धनी लोगों का यह एक विचित्र खयाल है कि “जो कुछ वीर्य नष्ट किया जाता है वह हलुआ, पूड़ी, रवड़ी उड़ाने से फिर वापिस मिलता है।” परन्तु यह उनकी बड़ी भारी मूर्खता है। जो भोजन बड़े बड़े पहलवानों से भी बिना खूब फसरत किये, नहीं पच सकता; वह गरिष्ठ भोजन, दिन-रात निठल्ले बैठे हुए और अधिक भोजन से और भोग-विलास के कारण जिनकी अति वेकाम हो गई हैं, उनको कैसे पच सकता है? “धातुक्षयात् स्वते रक्ते मन्दः संजायतेऽनलः।”
❁ सादा व ताजा अल्पाहार ❁
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यानी धातु के नाश से रक्त कमजोर हो जाता है और रक्त कमजोर हो जाने से अग्नि यानी भूख भी मन्द पड़ जाती है। यह आयुर्वेद का सिद्धान्त है; अर्थात् पुष्ट और उत्तेजित भोजन से ऐसे लोगों का रहा-सहा वीर्य और भी उल्लूट पड़ता है और वे अधिकाधिक बरबाद होते जाते हैं। तिस पर भी वे सूखी हड़डी चवाने वाले और अपने ही मुख से निकले हुए रक्त को उख सूखी हड़डी ही से निकला हुआ समझने वाले मूर्ख कुत्ते की तरह, अपने पहले ही वीर्य को मालपुआ के प्राप्त हुआ समझते हैं। वाह ! खूब अकलमन्दी ! भक्दास वामन कहते हैं:—
“पालो पत्नी खॉय जो उन्हें सतावे काम। नित प्रति हलुवा निगलते उनकी जाने राम ॥
—भक्दास वामन।
अतः जिन्हें वीर्य की रक्षा करनी है उन्हें चाहिए कि वे मिठाई, खटाई, नमक, मिर्च, मसाला से सर्वथा बचे रहें। सदा सस्ता, सादा, स्वच्छ और स्वरूप भोजन किया करें। नमक, मिर्च, मसाला ये बड़े कामोत्तेजक पदार्थ हैं। लाल मिर्च तो ब्रह्मचर्य के लिये प्रत्यक्ष काल ही है। अतः उन्हें धीरे धीरे कम करके सर्वथा शीघ्र त्याग दें। अभ्यास से कोई भी बात असंभव नहीं है। निश्चय होने पर सभी बातें सहल हैं।
योगी लोग नमक, मिर्च मसालादि नहीं खाते; अनभ्यास के कारण उन्हें वे अच्छे ही नहीं लगते। यदि तुम्हें योगी अर्थात् सुखी बनना हो, वियोगी अर्थात् दुःखी न बनना हो, तो तुमको भी उन्हीं की तरह सात्विक अल्पाहार खूब कुचल कुचल के करना होगा।
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उन्हीं की तरह प्राकृतिक आहार करना होगा । जो चीज जिस हालत में पैदा हुई हो उसे वैसे ही खाने से भोजन भी कम लगता है और फायदा भी खूब होता है । परन्तु ज्यों ज्यों उसका रूप बदलता जाता है, त्यों त्यों वह चीज आरोग्य के लिये हानिकार होती जाती है । कच्चे गेहूँ, चना खाना अधिक फायदेमन्द है; क्योंकि इसमें प्राणशक्ति कूट कूट कर भरी रहती है और भोजन भी कम लगता है । परन्तु वचपन ही से आंतें दुर्बल हो जाने के कारण मनुष्य उसे बिना पकाये पचा नहीं सकता । अन्न का पकाने से प्राणशक्ति बहुत नष्ट हो जाती है और इसी कारण अधिक भोजन करने पर भी मनुष्य की तृप्ति नहीं होती और वह अन्यान्य रोगों से पीड़ित हो जाता है । पूड़ी, कचौड़ी आदि तले हुये पदार्थों की प्राणशक्ति तो और भी जल जाती है । इसलिए जहाँ तक हो प्राकृतिक आहार ही करना सर्व-श्रेष्ठ है । मैदा से भूसीयुक्त आटा श्रेष्ठ, भूसी युक्त आटा से दलिया श्रेष्ठ, दलिया से उवलै हुए गेहूँ श्रेष्ठ, उवलै हुए गेहूँ से कच्चे गेहूँ और जौ श्रेष्ठ, कच्चे गेहूँ, चावल, चना इत्यादि से दुग्धाहार श्रेष्ठ और दुग्धाहार से पके ताजे फल श्रेष्ठ हैं ।
फलाहारः— फलाहार अत्यन्त प्राकृतिक और प्राणशक्ति से परिपूर्ण आहार है । फल में सूर्यतेज और बिजली बहुत ही भरी रहता है । इस कारण फलाहारी को सहसा कोई भी रोग नहीं हो सकता । फलाहार से बुद्धि अत्यन्त तीव्र होती है । वीर्य की बुद्धि होती है और काम विकार दब जाते हैं । हमारे पूर्वज ऋषि मुनियों का कन्दमूलफलाहार ही मुख्य आहार था और इसी कारण वे इतने तेजस्वी, बुद्धिमान शान्त, ब्रह्मचारी और दैवीसामर्थ्य
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से सम्पन्न थे, जिनके ज्ञान को देख कर सारी दुनिया आज भी हैरान हो रही है। हम उन्हीं की सन्तान आज बेवकूफ बन बैठे हैं। यह सब प्राकृतिक नियमोत्लङ्घन से प्राप्त निर्विघ्ना का ही दुष्ट व अनिष्ट प्रभाव है। अतः जिन्हें अपने पूर्वजों की तरह पुनः सदाचारी, ब्रह्मचारी, बुद्धिमान और सामर्थ्यसंपन्न होना है; उन्हें चाहिये कि जहाँ तक हो “प्राकृतिक आहार” करें। भोजन सदा ताजा, स्वच्छ सस्ता, हलका, सादा और अल्प ही किया करें। प्रत्येक ग्रास को खूब चवा चवा कर खायें, नमक, मिर्च, मसाला, मिठाई, खटाई से हमेशा दूर रहें और सदा ऊँचे व पवित्र विचार करें। फिर देखो तुम्हारे शरीर व चेहरे पर क्या ही रौनक आती है और तुम्हारी आत्मा कैसी तेजस्वी व वलिष्ठ होती है।
‘गचिकित्सा—(chromopathy) से यह सिद्ध हुआ है कि शीशियों के ‘बनावटी’ रंग से सूर्यकिरणद्वारा पानी पर जो अद्भुत परिणाम होता है उससे असंख्य रोग नष्ट हो जाते हैं; तब फिर फलों के ‘कुदरती’ रंग द्वारा भीतर रस पर सूर्यप्रकाश और विजली का असर पड़ने से वे फल अमृतसंजीवनी तुल्य बनते हैं तो इसमें आश्चर्य ही क्या है ? फलाहार के बारे में जितना वर्णन किया जाय उतना ही थोड़ा है। फलाहार भी दो प्रकार का होता है:—
फल में—अंजीर, अंगूर, संतरा, पपीता, अमरुद, आम, नासपाती, सेब, बेल, शरीफा, मीठा खट्टा दोनों नींबू, ये सस्ते व अच्छे फल होते हैं।
मेवा में - किशमिश, बादाम, पिस्ता, अखरोट काजू, गिरी, मुनक्का, घेल-बीज, छोहारा, सूखे अंजीर, ये अच्छे होते हैं।
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
परदेश से स्वदेश की ही चीज श्रेष्ठ और लाभकारी है। अतः फल की जगह आलू, कन्द, ककड़ी, पक्का कोहड़ा और शाक भाजी भी काम में लाई जा सकती है।
श्री लक्ष्मणजी ने चौदह वर्ष पर्यन्त फलाहार ही किया था। इसी कारण वे हनुमानजी की तरह अखण्ड ब्रह्मचारी रह सके और उनका सामर्थ्य और तेज श्री रामचन्द्रजी से भी अधिक बढ़ गया था। अस्तु; जिन्हें फलाहार शुरू करना हो; वे धीरे धीरे शुरू करें ! प्रथम कुछ दिन तक नमक, मिर्च, मसाला से रहित भोजन का अभ्यास करें; फिर एक मरतवे सादा अरुप भोजन तथा दूसरे मरतवे अरुप फलाहार करें; कुछ दिन के बाद फिर शुद्ध फलाहार करने लग जायें; एक दम कोई काम करने से लाभ के बदले हानि ही होती है, यह बात हमेशा ध्यान में रखो।
दुग्धाहारः—दुग्धाहार फलाहार से घटिया परन्तु अन्नहार से बढ़िया आहार है। दूध घर का और तिस पर भी काली गौ का श्रेष्ठ होता है। काली गौ को “कपिला” या “कामधेनु” कहते हैं। गौ का न हो तो काली भैंस का दूध लेना चाहिए। दूध वाली गाय वा भैंस वा बकरी निरोग व शुद्ध पदार्थ खाने वाली होनी चाहिए। अन्यथा रोगी वा अशुद्ध पदार्थ खाने वाली गाय भैंस व बकरी का दूध पीने से मनुष्य को भी वे रोग बिना हुये कभी नहीं रहेंगे, यह बात स्मरण रहे। बाज़ारू दूध पीने से मनुष्य बहुत जल्द रोगी बनता है; क्योंकि उसमें रास्ते की धूल और गन्दी हवा में के असंख्य जहरीले कीड़े पड़ जाते हैं। यही हाल मिठाई का भी होता है। रोज़ हलवाई एक अंजुली भरी हुई बर्, मक्खियाँ,
❁ सादा व ताज़ा अल्पाहार ❁
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चूँटे, दूध, और मिठाई इत्यादि में से प्रातःकाल निकाल के फेंकता है और उसी को औंटाकर लोगों को पूरे दाम पर मजे में बेचता है। अतः वाज़ारू कोई भी बनी-चनाई चीज़ विशेषतः पतली चीज़ तो कदापि न खानी चाहिये। हलवाई बरौलों का गन्दापन तो मशहूर ही होता है। उनकी पोशाक देख कर ही जी मंचलने लगता है। भला ऐसे गन्दे लोगों के हाथ के, गन्दे प्रकार से बने हुए, पदार्थ खा पी कर कौन आरोग्यसम्पन्न व दीर्घायु हो सकता है। होटल तो मानों मनुष्य के आयुआरोग्य को 'अच्छे दंग' से जलाने वाले मूर्तिमन्त स्मशान ही हैं।
धारोष्ण (तुरन्त का दुहा हुआ) और छना हुआ दूध सर्वोत्कृष्ट होता है। दूध बिना कपड़छान किये कभी न पीयो। गरम करने से दूध की प्राणशक्ति बहुत नष्ट होती है। अतः दूध ताज़ा ही पीना अच्छा है। धारोष्ण दूध से वीर्य बहुत ज्यादा तथा तत्काल बढ़ता है और मन भी शान्त व प्रसन्न रहता है। फल में दूध से अधिक वीर्य उत्पन्न करने की शक्ति होती है। दुहने के आधा घण्टा बाद दूध में विकार उत्पन्न होते हैं। अतः ऐसा ठण्डा दूध फिर उबाल कर ही पीना चाहिये। गरम दूध पीने से पेट और भी साफ होता है। दूध ठंडी आँच पर गरम करना बहुत ही लाभदायक है। दूध धीरे-धीरे जैसा बच्चा माता का दूध पीता है वैसा पीना चाहिए। इस प्रकार थोड़ा-थोड़ा पीने से एक पाव-भर दूध से भर दूध पीने के बराबर होता है। और गटर-गटर पीने से एक सेर दूध भी पाव भर की बराबरी नहीं कर सकता। क्योंकि दूध जल्दी पी लेने से उसका एकदम दही बन कर वह पेट के भीतर ही भीतर फट जाता है—खराब हो जाता है। परन्तु
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थोड़ा-थोड़ा पीने से—मुख में थोड़ी देर रख कर फिर पेट में उतारने से उसका सब सार खींचा जाता है और कुछ भी बेकार नहीं जाता है कोई भी चीज़ जल्दी से खाना, मानों रोगी बन कर जल्दी ही मरने की तैयारी करना है । अतएव सावधान !
मांसाहारः—मांसाहार सब से अधम और राक्षसी आहार है मांसाहारी लोग बहुत विकारी होते हैं । क्योंकि मांस उनका आहार है ही नहीं । मांस जड़ली दुष्ट पशुओं का तथा निशाचरों का आहार है । गाय, घोड़ा, बैल, वन्दर मांस को छू तक नहीं सकते । पर वाह रे मनुष्य ! जंगली नीच जानवरों से भी नीच हो गया है । मांसाहारी पुरुष सदा चंचल क्रोधी व कामी बना रहता है और इस बात का पता शेर, तेन्दुआ, चीता इत्यादि मांसाहारी पशुओं की तरफ देखने से कौरन लग जाता है । वे पशु पिछड़े में हर वक्त इधर-उधर चक्कर लगाया करते हैं । और लोगों की तरफ चंचल व क्रूर दृष्टि से देखा करते हैं । परन्तु वही शाकाहारी गाय से लेकर हाथी तक को देखिये कितने शान्त और निर्बिकारी होते हैं । मांसाहारी पुरुष का ब्रह्मचारी होना मुश्किल तो है ही, परन्तु असम्भव भी है । अपवाद ( exception ) को लेना मूर्खता है । अतः जिन्हें ब्रह्मचारी और सदाचारी बनना हो, उन्हें चाहिये कि वे मांसाहार को सर्वथा एकदम त्याग दें ।
सब्बा आहारः—पहले यह कह आये हैं कि भोजन और बुद्धि का परस्पर बड़ा ही घनिष्ठ संबन्ध है । सात्विक आहार से बुद्धि भी निस्सन्देह सात्विक ही बन जाती है । पर हाँ, भोजन के समय उच्च, पवित्र शान्त और ब्रह्मचर्य-विषयक विचार अवश्य ही करने चाहिये । क्योंकि उच्च और निर्मल विचार ही आत्मा का
❁ सादा व ताज़ा अल्पोहार ❁
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सच्चा आहार है। यदि सात्विक आहार के साथ में सात्विक विचार न किये जायँ, दुष्ट और अधर्मी विचार रखें जायँ तो भोजन का वह सात्विक परिवर्तन सर्वथा व्यर्थ ही समझना चाहिये। भोजन के समय जैसे विचार होते हैं मनुष्य ठीक वैसा ही “आप से आप” बन जाता है, ऐसा महापुरुषों का स्वानुभवपूर्ण सिद्धान्त है; क्योंकि भोजन के रस द्वारा वे विचार मनुष्य के नस-नस में प्रवेश कर सम्पूर्ण शरीर में फैल जाते हैं। स्थूल भोजन से विचार का सूक्ष्म भोजन कई गुना श्रेष्ठ और प्रभावशाली होता है, यह आध्यात्मिक सिद्धान्त है। अतएव भोजन के समय पवित्र, उच्च, निर्भय, शान्त और ईश्वरीय भाव के विचार से अवश्य रखने चाहिए। नीच विचार से नीच, और उच्च विचार से तुम अवश्य ही उच्च बन जाओगे। पापी विचार से पापी, व्यभिचारी विचार से व्यभिचारी और पुण्यमयी तथा ब्रह्मचारी विचार से तुम निस्सन्देह पुण्यवान और ब्रह्मचरी बन जाओगे। यदि तुम्हें काम को और भय को हटाना है, तो हनुमान जी का ध्यान करो और उनके ही जैसे हमेशा—विशेषतः भोजन के समय खास तौर पर—“पर-खी मात समान” ऐसे पवित्र विचार करो। आलस्य और मलीनता को हटाने के लिये स्वकर्तव्यपरायण श्रीलक्ष्मणजी जैसे पवित्र विचार करो; क्रोध को हटाना हो तो ब्रुद्धजी जैसे शान्त, प्रेमी, हृमाशील व दयालु विचार करो। छोटे दिल को हटाने के लिये कर्ण और वलि की उदारता का चिन्तन करो। दरिद्रता को हटाने के लिये राजा के तुल्य श्रीमान् विचार करो और व्यग्रता छोड़ शान्त चित्त से उस सर्वव्यापी लक्ष्मीपति भगवान् का ध्यान करो, जिसकी लक्ष्मी पैर दवाती और सेवा करती है। लक्ष्मीपति का ध्यान करने
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❁ त्रल्लचर्य्य ही जीवन है ❁
से तुम भी लक्ष्मीपति अवश्य बन जाओगे अर्थात् धन आप से आप तुम्हारे चरणों की सेवा करेगा; क्योंकि “ध्याने ध्याने तद्रूपता” ऐसा ही प्रकृति का सिद्धान्त है। अतः जैसे जैसे तुम अपने को घनाना चाहते हो, वैसे ही अथवा जिस दुर्गुण को या आदत को आप हटाना चाहते हो, उसके ठीक ठीक विरुद्ध विचार अद्वा, और शान्ति के साथ करा। निस्सन्देह तुम वैसे ही बन जाओगे। याद रखो, जैसे आपकी अद्वा और शान्ति होंगी वैसे ही आपको कम ज्यादा और जल्दी देरी में फल मिलेगा क्योंकि अद्वा और शान्ति ही संपूर्ण सौभाग्य और ईश्वरत्व की कुंजी है और भगवान् श्रीकृष्ण का भी यही सिद्धान्त* है।
मनुष्य के जैसे विचार होते हैं वैसा ही वातावरण atmosphere उसके बाहर-भीतर चहुँओर निर्माण होता है और फिर “योग्य योग्येन युज्यते।” अथवा Like attracts like यानी समान समान की ओर खिंचता है। इस न्याय से फिर वैसे ही विचार के पुरुष हमारे निकट खिंच आते हैं, अथवा हम उनके निकट खिंच जाते हैं, और हमारे विचारानुकूल ही अनेक शुभाशुभ घटनायें निर्माण होती हैं, जिनसे कि हमारा अभीष्ट या अनिष्ट आपसे आप सिद्ध होता है। आज जिस स्थिति में हम लोग हैं उस स्थिति के निर्माता खुद हम ही हैं और आहार, विचार व आचार के प्रभाव से हम इस स्थिति के बाहर भी निकल सकते हैं और जैसी चाहें वैसी उन्नति कर सकते हैं। इसी स्थिति में पढ़े रहने के लिये मनुष्य का जीवन नहीं है। वस्तुतः परमपद प्राप्त करना ही
*अद्वाऽमयो यं पुरुषो यो यच्छृङ्गः स एव सः ॥ गीता १७—३ ॥
❁ सादा व ताज़ा अल्पाहार ❁
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जीव मात्र का जीवनोंदेश्य है। उसी दिव्य स्थिति को हम लोगों को पहुंचना है और यह बात मनुष्य एक मात्र अपने शुद्ध, ऊँचे व सात्विक आहार, विचार और आचार द्वारा ही प्राप्त कर सकता है। महापुरुष अपने महान विचारों के द्वारा ही महान होते हैं और नीच पुरुष अपने नीच विचारों के कारण ही नीच होते हैं। अतएव सदैव पवित्र और ऊँचे विचार करना और श्रद्धा व शान्तिपूर्वक अपने को उन्नति की ओर बढ़ाना प्राणिमात्र का प्रधान कर्तव्य है और यह काम नित्यभोजन के समय वैसे ही श्रेष्ठ व पवित्र विचार रखने से बड़ी आसानी से बहुत जल्द सिद्ध होता है।
भोजन के शास्त्रीय नियम
(१) केवल दो ही समय भोजन करना चाहिये; पहला भोजन १० से लेकर १२ बजे के भीतर और दूसरा शाम को ८ बजे के भीतर; देर में करने से स्वप्न दोष होता है। (२) दिन भर में एकसरतबे भोजन करना सर्वोत्कृष्ट है—“एकमुक्त सदा रोग मुक्त” (३) रात में ८ बजे के भीतर थोड़ा सा ताज़ा ठंडा दूध बिलकुल थोड़ी सी चीनी डालकर धीरे धीरे पी लेना चाहिये। रात में गरम दूध पीने से स्वप्नदोष होता है। (४) बहुत गरम गरम भोजन कदापि न करना चाहिये। उससे वीर्य पतला पड़ जाता है और कामोत्तेजना होती है। गरम भोजन से और चाय से दाँत जल्दी दूट जाते हैं, आँतें दुर्बल पड़ती हैं, कञ्जियत बढ़ती है, और आँख की ज्योति मन्द पड़ जाती है। (५) भोजन हमेशा ताज़ा और सादा रहे। भोजन अनेक प्रकार का और वासी होने से अनेक विकार फौलन बढ़ जाते हैं। वासी भोजन से बुद्धि, आयु और तेज तत्काल
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❁ ब्रह्मचर्य्य हो जीवन है ❁
नष्ट हो, आलस छाती पर ज़बरदस्ती सवार होता है और मनुष्य को पाप कर्म में प्रवृत्त करता है। (६०) कभी हलक तक दूंस दूंस न खाओ; उससे बरबाद हो जाओगे। (७) थकने पर तत्काल भोजन न करना चाहिये। (८) भोजन के बाद शारीरिक व मानसिक परिश्रम एक घण्टा तक कदापि न करना चाहिये। एक घण्टा—कम से कम आध घण्टा तक आराम करो, नहीं तो रोगग्रस्त बन जल्दो ही मरना पड़ेगा। (९) भोजन के समय सदा शान्त, पवित्र व ऊँचे विचार रखो। चिड़चिड़ापन से अन्न हजम नहीं होता। क्रोध से अन्न जहर बन जाता है; अतः भोजन के समय हमेशा शांत रहो शान्ति के हेतु मौन धारण करो। (१०) नमक मिर्च, मसाला, पूड़ी, कचौड़ी, मिठाई, खटाई, मद्य, मांस, चाय, काफी वगैरह सर्वथा त्याग दो; क्योंकि इनसे मन व इन्द्रियां अत्यन्त चंचल बन जाती हैं। ऐसा पुरुष वीर्य को नहीं रोक सकता। (११) भोजन के समय पानी न पीना चाहिये; क्योंकि वैसा करना प्रकृति के खिलाफ है। भोजन के एक घण्टा बाद पानी पीना अच्छा है। (१२) भोजन के पहले हाथ, पैर और मुँह को पानी से पूरे तौर से स्वच्छ धो डालो और नारखून साफ रखो; क्योंकि उनमें जहर होता है। (१३) भोजन नियमित समय पर किया करो और फिर बीच में कुछ भी न खाओ। (१४) राह चलते, खड़े रहते व लेटे हुए भोजन करना सर्वथा अनुचित है। (१५) प्रातः काल जल पान अर्थात् कलेवा करना अच्छा नहीं है। (१६) भोजन की जगह पवित्र व प्रकाशमय होनी चाहिये। गन्दगी से जिन्दगी जल्दी बरबाद होती है, इस बात को सदा सर्वदा ध्यान में रखो। (१७) भोजन के बाद “शतपद्” अर्थात् सौ कदम इधर-उधर टहलना
❁ सादा व ताजा अल्पाहार ❁
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चाहिये। भोजनोत्तर तुरन्त आराम-कुर्सी पर पड़े, तो उससे बहुत हानि होती है; और दौड़ने से प्राण का नाश होता है।
जल सम्बन्धी शास्त्रीय नियम
(१) पानी स्वच्छ निर्गन्ध, जिस पर सूर्य का प्रकाश पड़ता हो ऐसा ताजा, उन्हा वहता हुआ अथवा गाँव के बाहर के कुएँ का होना चाहिये। क्योंकि ताजे जल में बहुत प्राणशक्ति भरी रहती है। जल को संस्कृत में 'जीवन' कहते हैं; सचमुच जल ही जीवन का मुख्य आधार है। भोजन से भी जल का महत्व अधिक है।
(२) दिन भर में कम से कम तीन सेर पानी पीना चाहिये; क्योंकि उतना ही शरीर से पेशाब, पसीना और भाप के रूप में खर्च होता है। ऋतु काल के अनुसार पानी की मात्रा कम ज्यादा भी करना उचित है। कृष्ण की बीमारी अवसर कम पानी पीने ही से हुआ करती है। यदि कृष्ण वाले यथेष्ट पानी पीने लग जाँय तो उनकी यह बीमारी बहुत जल्द दूर हो सकती है। तथापि अति पानी पीना भी रोग-कर है—“अति सर्वत्र दज्येत”।
(३) पानी छानकर ही पीना चाहिये और छानने का कपड़ा हर वक्त साफ़ कर लेना चाहिये क्योंकि उसमें सूक्ष्म जल जन्तु रहते हैं। विशेषतः हैजा वगैरह रोगों के दिनों में और दूषित स्थानों में, पानी हमेशा अच्छी तरह उबाल कर और छान कर ही पीना चाहिये, अन्यथा आलस्य के कारण मुक्त में रोगी बन के अकाल में मरना पड़ेगा। रोगी होने का कारण विशेषतः दूषित जल ही होता है। अतएव सावधान !
(४) जल थोड़ा थोड़ा दूध की तरह पीना चाहिये। पीते वक्त नीचे
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
ऊपर के दाँत संलग्न करने से पानी में भी प्राणशक्ति पूरी तरह से खींची जा सकती है; पानी भी थोड़ा थोड़ा पीने में आता है और दाँत भी मजबूत हो जाते हैं; तथा पानी में का कूड़ा करकट भी पेट में नहीं जाने पाता। एक मनुष्य के पेट में, दाँत संलग्न न करने के कारण एक साँप का बच्चा तक चला गया था फिर भैंस के मट्टा से (उसमें मोहरी मिलाकर और पिला करके) कै करायी गई तब वह निकला। अतः सावधान रहो। (५) प्यास को कभी न रोकना चाहिये; क्योंकि उससे जीवनशक्ति का भयंकर रूप से नाश होता है और मनुष्य अल्पायु बनता है। (६) प्यास की वृत्ति पानी ही से करो न कि सोडा-लेमन और वरक-शराब से। याद रखो, प्रकृति के विरुद्ध चलने से कोई सात जन्म में भी सुखी नहीं हो सकता। (७) भोजन के समय विलकुल पानी न पीना चाहिये क्योंकि वैसा करना प्रकृति के सर्वथा विरुद्ध है। कोई भी बुद्धिमान पुरुष हमें चींटी से लेकर हाथी तक ऐसा कोई भी प्राणी वतला दे, जो कि भोजन के समय पानी पीता हो। भोजन के साथ पानी न पीने से बहुत लाभ है हाजमा दुरुस्त होता है; शौच साफ होता है; बढ़ा हुआ पेट घटता है; गले की जलन नष्ट होती है और भोजन भी कम लगता है अर्थात् पेटूपन के छूटने से हम अनेक रोगों से भी अनायास छूट जाते हैं। (८) भोजन के आधा या पाव घंटा पहिले एक गिलास पानी पी लेने से भोजन के समय तुम्हें प्यास नहीं सतावेगी। उससे पेटूपन का भी नाश होता है और खोटी भूख नष्ट होकर सच्ची लगने लगती है। भोजन के साथ पानी न पीने का अभ्यास जाड़े के दिनों से सुखपूर्वक शुरू किया जा सकता है। (९) शुष्क यानी जिस भोजन में विलकुल पानी नहीं होता ऐसा
❁ सादा व ताजा अलपाहार ❁
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रूखा-सूखा भोजन करने के बाद तुरन्त पानी पीना भी प्राकृतिक नियम के अनुकूल है। (१०) एकदम सेर ढेढ़-सेर पानी पीना हानिकारक है; उससे 'बहु-भूत्रता' का रोग होता है। व्यास मात्स्य हो तब २-३ गिलास पानी थोड़ा थोड़ा करके सावकाश पूर्वक पीना उचित है। (११) खड़े खड़े, या लेटे हुये पानी कदापि न पीना चाहिये, यह कमजोर रोगियों का काम है। (१२) रात्रि में सोने के आधा घण्टे पहले ठण्डा जल अवश्य पी लेना चाहिये; ढेर सा नहीं और पेशाब करके सोना चाहिये। इससे चित्त व चोला दोनों शान्त रहते हैं और स्वप्नदोष भी रुक जाता है; तथा दूसरे दिन मल त्यागने में भी सुभीता होता है। (१३) प्रातःकाल उठते ही सूर्योदय से पहले स्वच्छ तांबे के लोटे में रात भर रक्खा हुआ जल पीने से रागी भी निरोग और विष भी निर्विष हो जाता है। मन प्रसन्न होता है। पेटूपन का नाश होता है और आयु बढ़ती है। पानी पीकर जरा लैट कर पेट को नाभी के चारों ओर दबाने से (रगड़ने से) पाखाना बहुत साफ होता है। प्रातःकाल का यह जल अमृत के तुल्य होता है। यदि नाक से पिया जाय तो नेत्र के समस्त विकार दूर हो जाते हैं; दृष्टि अत्यंत तेजस्वी बनती है; बुद्धि तीव्र होती है; नासारोग दुरुस्त होते हैं; बुढ़ापा जल्दी नहीं आता; बाल बहुत उम्र तक काले बने रहते हैं; और संपूर्ण रोग दुरुस्त हो जाते हैं। क्योंकि तांबे में ऐसे ही कुछ चमत्कारिक गुण भरे हुये हैं। इसी कारण हमारे पूर्वजों ने देव पूजा में सर्वत्र तांबे के ही पात्रों का विशेषतः विधान लिखा है। धन्य हैं उनके उपकार! (१४) यदि किसी को कब्ज की शिकायत बहुत दिनों की हो तो सुबह एक-दो गिलास मामूली गरम पानी में एक चम्मच भर खाने का नमक
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
डालकर उसे पी लो । फिर चित लेट जाओ और नाभी के चारों तरफ से पेट को रगड़ो । देखो आठ दिन ही में पाखाना साफ होने लगेगा; बवासीर की बीमारी कम हो जायगी; जठर रोग, कर्ण रोग, सिर दर्द गला और छाती के रोग, नेत्र रोग, कोढ़, कमर का दर्द, सूजन आदि असंख्य विकार शनैः शनैः नष्ट हो जायेंगे । अवश्य अनुभव कीजिये । परन्तु यह उपाय भी अप्राकृतिक है; फिर इसे छोड़ देना चाहिये । (१५) एनिमा का उपाय भी कञ्चित्त के लिये सर्वोत्कृष्ट होने पर भी अप्राकृतिक है । अतः एनिमा की आदत न लगाओ । एनिमा का उपयोग कभी कभी क्वचित् किया करो—एनिमा का रोज उपयोग करने से आते सदा के लिये कमजोर बन जाती हैं । अतएव सावधान ! (१६) जल पीते वक्त “इस जल से मुझ में सुख, शान्ति, आरोग्य, ब्रह्मचर्य, तेज इत्यादि प्रवेश कर रहे हैं और मैं पूर्ण आरोग्य हो रहा हूँ ।” इस प्रकार के संकल्प व आत्म-कथन अवश्य किया करो । क्योंकि जैसे तुम जल पीते ( अथवा सभी समय ) संकल्प करोगे ठीक वैसे ही भाव तुम्हारे रोम रोम में घुस जायेंगे और तुम निःसन्देह वैसे ही बन जाओगे, ऐसा हम प्रतिज्ञा-पूर्वक कह सकते हैं ।
❁ निर्व्यसनता ❁
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“निर्व्यसनता”
नियम आठवाँ:—
वक्तव्य:—संपूर्ण दुर्व्यसनों की माता बीड़ी या सिगरेट है। इसी से गाँजा से लेकर संखिया तक का शौक्र बढ़ जाता है। यह नितान्त सत्य है कि दुर्व्यसनी पुरुष कदापि ब्रह्मचारी नहीं हो सकता। अमेरिकन डाक्टरों का कथन है, “तन्त्राकृ के सेवन से वीर्य फौजन उत्तेजित होकर पतला पड़ता है, पुरुषत्व शक्ति क्षीण होती है; पित्त विगड़ जाता है, नेत्र-ज्योति मन्द होती है, मस्तिष्क व छाती कमजोर होती है, खाँसी ( जो कि सब रोगों का जड़ है ), दमा और कफ बढ़ते हैं। आलस्य, कार्य में अनिच्छा, हृदय की धकधकाहट, व्यर्थ चिन्ता व अनिद्रा बढ़ती है, सुख से महान् दुर्गन्धि आती है, शारीरिक, मानसिक, आर्थिक व सामाजिक भयंकर हानि होती है।” शुद्ध हवा को जहरीली बना कर अपने साथ हो साथ लोगों का भी स्वास्थ्य विगाड़ना घोर पाप है। मेदक, पत्ती, वरै, मक्खियों और अन्य असंख्य कीड़े तन्त्राकृ की लपट मात्र ही से बेकाम होकर मर जाते हैं; तब फिर स्वयम् पीनेवाला अकाल ही में क्यों नहीं मरेगा ? तन्त्राकृ में “निकोटिन” नामक भयंकर विष होता है, जो कि शरीर के स्वास्थ्य और सद्भावों को मार डालता है। कई लोग इसे पाखाना साफ़ होने की दवा समझ बैठे हैं; परन्तु नतीजा उलटा ही होता है। आँतें और भी दुर्बल हो जाती हैं। फिर उन्हें बिना बीड़ी, चाय वगैरह पिये पाखाना होता ही नहीं देखो, यह कैसी गुलामी है ? शोक ! यदि पीछे दिये हुए अनुसार नमक पानी का उपयोग किया जाय तो बहुत जल्द निरोग हो सकते