भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

पृष्ठ 133, कुल 199 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 133

❁ सादा व ताजा अलपाहार ❁

[ ११७ ]

रूखा-सूखा भोजन करने के बाद तुरन्त पानी पीना भी प्राकृतिक नियम के अनुकूल है। (१०) एकदम सेर ढेढ़-सेर पानी पीना हानिकारक है; उससे 'बहु-भूत्रता' का रोग होता है। व्यास मात्स्य हो तब २-३ गिलास पानी थोड़ा थोड़ा करके सावकाश पूर्वक पीना उचित है। (११) खड़े खड़े, या लेटे हुये पानी कदापि न पीना चाहिये, यह कमजोर रोगियों का काम है। (१२) रात्रि में सोने के आधा घण्टे पहले ठण्डा जल अवश्य पी लेना चाहिये; ढेर सा नहीं और पेशाब करके सोना चाहिये। इससे चित्त व चोला दोनों शान्त रहते हैं और स्वप्नदोष भी रुक जाता है; तथा दूसरे दिन मल त्यागने में भी सुभीता होता है। (१३) प्रातःकाल उठते ही सूर्योदय से पहले स्वच्छ तांबे के लोटे में रात भर रक्खा हुआ जल पीने से रागी भी निरोग और विष भी निर्विष हो जाता है। मन प्रसन्न होता है। पेटूपन का नाश होता है और आयु बढ़ती है। पानी पीकर जरा लैट कर पेट को नाभी के चारों ओर दबाने से (रगड़ने से) पाखाना बहुत साफ होता है। प्रातःकाल का यह जल अमृत के तुल्य होता है। यदि नाक से पिया जाय तो नेत्र के समस्त विकार दूर हो जाते हैं; दृष्टि अत्यंत तेजस्वी बनती है; बुद्धि तीव्र होती है; नासारोग दुरुस्त होते हैं; बुढ़ापा जल्दी नहीं आता; बाल बहुत उम्र तक काले बने रहते हैं; और संपूर्ण रोग दुरुस्त हो जाते हैं। क्योंकि तांबे में ऐसे ही कुछ चमत्कारिक गुण भरे हुये हैं। इसी कारण हमारे पूर्वजों ने देव पूजा में सर्वत्र तांबे के ही पात्रों का विशेषतः विधान लिखा है। धन्य हैं उनके उपकार! (१४) यदि किसी को कब्ज की शिकायत बहुत दिनों की हो तो सुबह एक-दो गिलास मामूली गरम पानी में एक चम्मच भर खाने का नमक