भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

ऊपर के दाँत संलग्न करने से पानी में भी प्राणशक्ति पूरी तरह से खींची जा सकती है; पानी भी थोड़ा थोड़ा पीने में आता है और दाँत भी मजबूत हो जाते हैं; तथा पानी में का कूड़ा करकट भी पेट में नहीं जाने पाता। एक मनुष्य के पेट में, दाँत संलग्न न करने के कारण एक साँप का बच्चा तक चला गया था फिर भैंस के मट्टा से (उसमें मोहरी मिलाकर और पिला करके) कै करायी गई तब वह निकला। अतः सावधान रहो। (५) प्यास को कभी न रोकना चाहिये; क्योंकि उससे जीवनशक्ति का भयंकर रूप से नाश होता है और मनुष्य अल्पायु बनता है। (६) प्यास की वृत्ति पानी ही से करो न कि सोडा-लेमन और वरक-शराब से। याद रखो, प्रकृति के विरुद्ध चलने से कोई सात जन्म में भी सुखी नहीं हो सकता। (७) भोजन के समय विलकुल पानी न पीना चाहिये क्योंकि वैसा करना प्रकृति के सर्वथा विरुद्ध है। कोई भी बुद्धिमान पुरुष हमें चींटी से लेकर हाथी तक ऐसा कोई भी प्राणी वतला दे, जो कि भोजन के समय पानी पीता हो। भोजन के साथ पानी न पीने से बहुत लाभ है हाजमा दुरुस्त होता है; शौच साफ होता है; बढ़ा हुआ पेट घटता है; गले की जलन नष्ट होती है और भोजन भी कम लगता है अर्थात् पेटूपन के छूटने से हम अनेक रोगों से भी अनायास छूट जाते हैं। (८) भोजन के आधा या पाव घंटा पहिले एक गिलास पानी पी लेने से भोजन के समय तुम्हें प्यास नहीं सतावेगी। उससे पेटूपन का भी नाश होता है और खोटी भूख नष्ट होकर सच्ची लगने लगती है। भोजन के साथ पानी न पीने का अभ्यास जाड़े के दिनों से सुखपूर्वक शुरू किया जा सकता है। (९) शुष्क यानी जिस भोजन में विलकुल पानी नहीं होता ऐसा