ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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चाहिये। भोजनोत्तर तुरन्त आराम-कुर्सी पर पड़े, तो उससे बहुत हानि होती है; और दौड़ने से प्राण का नाश होता है।
जल सम्बन्धी शास्त्रीय नियम
(१) पानी स्वच्छ निर्गन्ध, जिस पर सूर्य का प्रकाश पड़ता हो ऐसा ताजा, उन्हा वहता हुआ अथवा गाँव के बाहर के कुएँ का होना चाहिये। क्योंकि ताजे जल में बहुत प्राणशक्ति भरी रहती है। जल को संस्कृत में 'जीवन' कहते हैं; सचमुच जल ही जीवन का मुख्य आधार है। भोजन से भी जल का महत्व अधिक है।
(२) दिन भर में कम से कम तीन सेर पानी पीना चाहिये; क्योंकि उतना ही शरीर से पेशाब, पसीना और भाप के रूप में खर्च होता है। ऋतु काल के अनुसार पानी की मात्रा कम ज्यादा भी करना उचित है। कृष्ण की बीमारी अवसर कम पानी पीने ही से हुआ करती है। यदि कृष्ण वाले यथेष्ट पानी पीने लग जाँय तो उनकी यह बीमारी बहुत जल्द दूर हो सकती है। तथापि अति पानी पीना भी रोग-कर है—“अति सर्वत्र दज्येत”।
(३) पानी छानकर ही पीना चाहिये और छानने का कपड़ा हर वक्त साफ़ कर लेना चाहिये क्योंकि उसमें सूक्ष्म जल जन्तु रहते हैं। विशेषतः हैजा वगैरह रोगों के दिनों में और दूषित स्थानों में, पानी हमेशा अच्छी तरह उबाल कर और छान कर ही पीना चाहिये, अन्यथा आलस्य के कारण मुक्त में रोगी बन के अकाल में मरना पड़ेगा। रोगी होने का कारण विशेषतः दूषित जल ही होता है। अतएव सावधान !
(४) जल थोड़ा थोड़ा दूध की तरह पीना चाहिये। पीते वक्त नीचे