ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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❁ ब्रह्मचर्य्य हो जीवन है ❁
नष्ट हो, आलस छाती पर ज़बरदस्ती सवार होता है और मनुष्य को पाप कर्म में प्रवृत्त करता है। (६०) कभी हलक तक दूंस दूंस न खाओ; उससे बरबाद हो जाओगे। (७) थकने पर तत्काल भोजन न करना चाहिये। (८) भोजन के बाद शारीरिक व मानसिक परिश्रम एक घण्टा तक कदापि न करना चाहिये। एक घण्टा—कम से कम आध घण्टा तक आराम करो, नहीं तो रोगग्रस्त बन जल्दो ही मरना पड़ेगा। (९) भोजन के समय सदा शान्त, पवित्र व ऊँचे विचार रखो। चिड़चिड़ापन से अन्न हजम नहीं होता। क्रोध से अन्न जहर बन जाता है; अतः भोजन के समय हमेशा शांत रहो शान्ति के हेतु मौन धारण करो। (१०) नमक मिर्च, मसाला, पूड़ी, कचौड़ी, मिठाई, खटाई, मद्य, मांस, चाय, काफी वगैरह सर्वथा त्याग दो; क्योंकि इनसे मन व इन्द्रियां अत्यन्त चंचल बन जाती हैं। ऐसा पुरुष वीर्य को नहीं रोक सकता। (११) भोजन के समय पानी न पीना चाहिये; क्योंकि वैसा करना प्रकृति के खिलाफ है। भोजन के एक घण्टा बाद पानी पीना अच्छा है। (१२) भोजन के पहले हाथ, पैर और मुँह को पानी से पूरे तौर से स्वच्छ धो डालो और नारखून साफ रखो; क्योंकि उनमें जहर होता है। (१३) भोजन नियमित समय पर किया करो और फिर बीच में कुछ भी न खाओ। (१४) राह चलते, खड़े रहते व लेटे हुए भोजन करना सर्वथा अनुचित है। (१५) प्रातः काल जल पान अर्थात् कलेवा करना अच्छा नहीं है। (१६) भोजन की जगह पवित्र व प्रकाशमय होनी चाहिये। गन्दगी से जिन्दगी जल्दी बरबाद होती है, इस बात को सदा सर्वदा ध्यान में रखो। (१७) भोजन के बाद “शतपद्” अर्थात् सौ कदम इधर-उधर टहलना