भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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❁ सादा व ताज़ा अल्पाहार ❁

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जीव मात्र का जीवनोंदेश्य है। उसी दिव्य स्थिति को हम लोगों को पहुंचना है और यह बात मनुष्य एक मात्र अपने शुद्ध, ऊँचे व सात्विक आहार, विचार और आचार द्वारा ही प्राप्त कर सकता है। महापुरुष अपने महान विचारों के द्वारा ही महान होते हैं और नीच पुरुष अपने नीच विचारों के कारण ही नीच होते हैं। अतएव सदैव पवित्र और ऊँचे विचार करना और श्रद्धा व शान्तिपूर्वक अपने को उन्नति की ओर बढ़ाना प्राणिमात्र का प्रधान कर्तव्य है और यह काम नित्यभोजन के समय वैसे ही श्रेष्ठ व पवित्र विचार रखने से बड़ी आसानी से बहुत जल्द सिद्ध होता है।

भोजन के शास्त्रीय नियम

(१) केवल दो ही समय भोजन करना चाहिये; पहला भोजन १० से लेकर १२ बजे के भीतर और दूसरा शाम को ८ बजे के भीतर; देर में करने से स्वप्न दोष होता है। (२) दिन भर में एकसरतबे भोजन करना सर्वोत्कृष्ट है—“एकमुक्त सदा रोग मुक्त” (३) रात में ८ बजे के भीतर थोड़ा सा ताज़ा ठंडा दूध बिलकुल थोड़ी सी चीनी डालकर धीरे धीरे पी लेना चाहिये। रात में गरम दूध पीने से स्वप्नदोष होता है। (४) बहुत गरम गरम भोजन कदापि न करना चाहिये। उससे वीर्य पतला पड़ जाता है और कामोत्तेजना होती है। गरम भोजन से और चाय से दाँत जल्दी दूट जाते हैं, आँतें दुर्बल पड़ती हैं, कञ्जियत बढ़ती है, और आँख की ज्योति मन्द पड़ जाती है। (५) भोजन हमेशा ताज़ा और सादा रहे। भोजन अनेक प्रकार का और वासी होने से अनेक विकार फौलन बढ़ जाते हैं। वासी भोजन से बुद्धि, आयु और तेज तत्काल