भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

पृष्ठ 128, कुल 199 में से

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❁ त्रल्लचर्य्य ही जीवन है ❁

से तुम भी लक्ष्मीपति अवश्य बन जाओगे अर्थात् धन आप से आप तुम्हारे चरणों की सेवा करेगा; क्योंकि “ध्याने ध्याने तद्रूपता” ऐसा ही प्रकृति का सिद्धान्त है। अतः जैसे जैसे तुम अपने को घनाना चाहते हो, वैसे ही अथवा जिस दुर्गुण को या आदत को आप हटाना चाहते हो, उसके ठीक ठीक विरुद्ध विचार अद्वा, और शान्ति के साथ करा। निस्सन्देह तुम वैसे ही बन जाओगे। याद रखो, जैसे आपकी अद्वा और शान्ति होंगी वैसे ही आपको कम ज्यादा और जल्दी देरी में फल मिलेगा क्योंकि अद्वा और शान्ति ही संपूर्ण सौभाग्य और ईश्वरत्व की कुंजी है और भगवान् श्रीकृष्ण का भी यही सिद्धान्त* है।

मनुष्य के जैसे विचार होते हैं वैसा ही वातावरण atmosphere उसके बाहर-भीतर चहुँओर निर्माण होता है और फिर “योग्य योग्येन युज्यते।” अथवा Like attracts like यानी समान समान की ओर खिंचता है। इस न्याय से फिर वैसे ही विचार के पुरुष हमारे निकट खिंच आते हैं, अथवा हम उनके निकट खिंच जाते हैं, और हमारे विचारानुकूल ही अनेक शुभाशुभ घटनायें निर्माण होती हैं, जिनसे कि हमारा अभीष्ट या अनिष्ट आपसे आप सिद्ध होता है। आज जिस स्थिति में हम लोग हैं उस स्थिति के निर्माता खुद हम ही हैं और आहार, विचार व आचार के प्रभाव से हम इस स्थिति के बाहर भी निकल सकते हैं और जैसी चाहें वैसी उन्नति कर सकते हैं। इसी स्थिति में पढ़े रहने के लिये मनुष्य का जीवन नहीं है। वस्तुतः परमपद प्राप्त करना ही

*अद्वाऽमयो यं पुरुषो यो यच्छृङ्गः स एव सः ॥ गीता १७—३ ॥

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