भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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❁ सादा व ताज़ा अल्पोहार ❁

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सच्चा आहार है। यदि सात्विक आहार के साथ में सात्विक विचार न किये जायँ, दुष्ट और अधर्मी विचार रखें जायँ तो भोजन का वह सात्विक परिवर्तन सर्वथा व्यर्थ ही समझना चाहिये। भोजन के समय जैसे विचार होते हैं मनुष्य ठीक वैसा ही “आप से आप” बन जाता है, ऐसा महापुरुषों का स्वानुभवपूर्ण सिद्धान्त है; क्योंकि भोजन के रस द्वारा वे विचार मनुष्य के नस-नस में प्रवेश कर सम्पूर्ण शरीर में फैल जाते हैं। स्थूल भोजन से विचार का सूक्ष्म भोजन कई गुना श्रेष्ठ और प्रभावशाली होता है, यह आध्यात्मिक सिद्धान्त है। अतएव भोजन के समय पवित्र, उच्च, निर्भय, शान्त और ईश्वरीय भाव के विचार से अवश्य रखने चाहिए। नीच विचार से नीच, और उच्च विचार से तुम अवश्य ही उच्च बन जाओगे। पापी विचार से पापी, व्यभिचारी विचार से व्यभिचारी और पुण्यमयी तथा ब्रह्मचारी विचार से तुम निस्सन्देह पुण्यवान और ब्रह्मचरी बन जाओगे। यदि तुम्हें काम को और भय को हटाना है, तो हनुमान जी का ध्यान करो और उनके ही जैसे हमेशा—विशेषतः भोजन के समय खास तौर पर—“पर-खी मात समान” ऐसे पवित्र विचार करो। आलस्य और मलीनता को हटाने के लिये स्वकर्तव्यपरायण श्रीलक्ष्मणजी जैसे पवित्र विचार करो; क्रोध को हटाना हो तो ब्रुद्धजी जैसे शान्त, प्रेमी, हृमाशील व दयालु विचार करो। छोटे दिल को हटाने के लिये कर्ण और वलि की उदारता का चिन्तन करो। दरिद्रता को हटाने के लिये राजा के तुल्य श्रीमान् विचार करो और व्यग्रता छोड़ शान्त चित्त से उस सर्वव्यापी लक्ष्मीपति भगवान् का ध्यान करो, जिसकी लक्ष्मी पैर दवाती और सेवा करती है। लक्ष्मीपति का ध्यान करने