भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

थोड़ा-थोड़ा पीने से—मुख में थोड़ी देर रख कर फिर पेट में उतारने से उसका सब सार खींचा जाता है और कुछ भी बेकार नहीं जाता है कोई भी चीज़ जल्दी से खाना, मानों रोगी बन कर जल्दी ही मरने की तैयारी करना है । अतएव सावधान !

मांसाहारः—मांसाहार सब से अधम और राक्षसी आहार है मांसाहारी लोग बहुत विकारी होते हैं । क्योंकि मांस उनका आहार है ही नहीं । मांस जड़ली दुष्ट पशुओं का तथा निशाचरों का आहार है । गाय, घोड़ा, बैल, वन्दर मांस को छू तक नहीं सकते । पर वाह रे मनुष्य ! जंगली नीच जानवरों से भी नीच हो गया है । मांसाहारी पुरुष सदा चंचल क्रोधी व कामी बना रहता है और इस बात का पता शेर, तेन्दुआ, चीता इत्यादि मांसाहारी पशुओं की तरफ देखने से कौरन लग जाता है । वे पशु पिछड़े में हर वक्त इधर-उधर चक्कर लगाया करते हैं । और लोगों की तरफ चंचल व क्रूर दृष्टि से देखा करते हैं । परन्तु वही शाकाहारी गाय से लेकर हाथी तक को देखिये कितने शान्त और निर्बिकारी होते हैं । मांसाहारी पुरुष का ब्रह्मचारी होना मुश्किल तो है ही, परन्तु असम्भव भी है । अपवाद ( exception ) को लेना मूर्खता है । अतः जिन्हें ब्रह्मचारी और सदाचारी बनना हो, उन्हें चाहिये कि वे मांसाहार को सर्वथा एकदम त्याग दें ।

सब्बा आहारः—पहले यह कह आये हैं कि भोजन और बुद्धि का परस्पर बड़ा ही घनिष्ठ संबन्ध है । सात्विक आहार से बुद्धि भी निस्सन्देह सात्विक ही बन जाती है । पर हाँ, भोजन के समय उच्च, पवित्र शान्त और ब्रह्मचर्य-विषयक विचार अवश्य ही करने चाहिये । क्योंकि उच्च और निर्मल विचार ही आत्मा का