भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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❁ सादा व ताज़ा अल्पाहार ❁

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चूँटे, दूध, और मिठाई इत्यादि में से प्रातःकाल निकाल के फेंकता है और उसी को औंटाकर लोगों को पूरे दाम पर मजे में बेचता है। अतः वाज़ारू कोई भी बनी-चनाई चीज़ विशेषतः पतली चीज़ तो कदापि न खानी चाहिये। हलवाई बरौलों का गन्दापन तो मशहूर ही होता है। उनकी पोशाक देख कर ही जी मंचलने लगता है। भला ऐसे गन्दे लोगों के हाथ के, गन्दे प्रकार से बने हुए, पदार्थ खा पी कर कौन आरोग्यसम्पन्न व दीर्घायु हो सकता है। होटल तो मानों मनुष्य के आयुआरोग्य को 'अच्छे दंग' से जलाने वाले मूर्तिमन्त स्मशान ही हैं।

धारोष्ण (तुरन्त का दुहा हुआ) और छना हुआ दूध सर्वोत्कृष्ट होता है। दूध बिना कपड़छान किये कभी न पीयो। गरम करने से दूध की प्राणशक्ति बहुत नष्ट होती है। अतः दूध ताज़ा ही पीना अच्छा है। धारोष्ण दूध से वीर्य बहुत ज्यादा तथा तत्काल बढ़ता है और मन भी शान्त व प्रसन्न रहता है। फल में दूध से अधिक वीर्य उत्पन्न करने की शक्ति होती है। दुहने के आधा घण्टा बाद दूध में विकार उत्पन्न होते हैं। अतः ऐसा ठण्डा दूध फिर उबाल कर ही पीना चाहिये। गरम दूध पीने से पेट और भी साफ होता है। दूध ठंडी आँच पर गरम करना बहुत ही लाभदायक है। दूध धीरे-धीरे जैसा बच्चा माता का दूध पीता है वैसा पीना चाहिए। इस प्रकार थोड़ा-थोड़ा पीने से एक पाव-भर दूध से भर दूध पीने के बराबर होता है। और गटर-गटर पीने से एक सेर दूध भी पाव भर की बराबरी नहीं कर सकता। क्योंकि दूध जल्दी पी लेने से उसका एकदम दही बन कर वह पेट के भीतर ही भीतर फट जाता है—खराब हो जाता है। परन्तु