ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
परदेश से स्वदेश की ही चीज श्रेष्ठ और लाभकारी है। अतः फल की जगह आलू, कन्द, ककड़ी, पक्का कोहड़ा और शाक भाजी भी काम में लाई जा सकती है।
श्री लक्ष्मणजी ने चौदह वर्ष पर्यन्त फलाहार ही किया था। इसी कारण वे हनुमानजी की तरह अखण्ड ब्रह्मचारी रह सके और उनका सामर्थ्य और तेज श्री रामचन्द्रजी से भी अधिक बढ़ गया था। अस्तु; जिन्हें फलाहार शुरू करना हो; वे धीरे धीरे शुरू करें ! प्रथम कुछ दिन तक नमक, मिर्च, मसाला से रहित भोजन का अभ्यास करें; फिर एक मरतवे सादा अरुप भोजन तथा दूसरे मरतवे अरुप फलाहार करें; कुछ दिन के बाद फिर शुद्ध फलाहार करने लग जायें; एक दम कोई काम करने से लाभ के बदले हानि ही होती है, यह बात हमेशा ध्यान में रखो।
दुग्धाहारः—दुग्धाहार फलाहार से घटिया परन्तु अन्नहार से बढ़िया आहार है। दूध घर का और तिस पर भी काली गौ का श्रेष्ठ होता है। काली गौ को “कपिला” या “कामधेनु” कहते हैं। गौ का न हो तो काली भैंस का दूध लेना चाहिए। दूध वाली गाय वा भैंस वा बकरी निरोग व शुद्ध पदार्थ खाने वाली होनी चाहिए। अन्यथा रोगी वा अशुद्ध पदार्थ खाने वाली गाय भैंस व बकरी का दूध पीने से मनुष्य को भी वे रोग बिना हुये कभी नहीं रहेंगे, यह बात स्मरण रहे। बाज़ारू दूध पीने से मनुष्य बहुत जल्द रोगी बनता है; क्योंकि उसमें रास्ते की धूल और गन्दी हवा में के असंख्य जहरीले कीड़े पड़ जाते हैं। यही हाल मिठाई का भी होता है। रोज़ हलवाई एक अंजुली भरी हुई बर्, मक्खियाँ,