भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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❁ सादा व ताजा अल्पाहार ❁

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से सम्पन्न थे, जिनके ज्ञान को देख कर सारी दुनिया आज भी हैरान हो रही है। हम उन्हीं की सन्तान आज बेवकूफ बन बैठे हैं। यह सब प्राकृतिक नियमोत्लङ्घन से प्राप्त निर्विघ्ना का ही दुष्ट व अनिष्ट प्रभाव है। अतः जिन्हें अपने पूर्वजों की तरह पुनः सदाचारी, ब्रह्मचारी, बुद्धिमान और सामर्थ्यसंपन्न होना है; उन्हें चाहिये कि जहाँ तक हो “प्राकृतिक आहार” करें। भोजन सदा ताजा, स्वच्छ सस्ता, हलका, सादा और अल्प ही किया करें। प्रत्येक ग्रास को खूब चवा चवा कर खायें, नमक, मिर्च, मसाला, मिठाई, खटाई से हमेशा दूर रहें और सदा ऊँचे व पवित्र विचार करें। फिर देखो तुम्हारे शरीर व चेहरे पर क्या ही रौनक आती है और तुम्हारी आत्मा कैसी तेजस्वी व वलिष्ठ होती है।

‘गचिकित्सा—(chromopathy) से यह सिद्ध हुआ है कि शीशियों के ‘बनावटी’ रंग से सूर्यकिरणद्वारा पानी पर जो अद्भुत परिणाम होता है उससे असंख्य रोग नष्ट हो जाते हैं; तब फिर फलों के ‘कुदरती’ रंग द्वारा भीतर रस पर सूर्यप्रकाश और विजली का असर पड़ने से वे फल अमृतसंजीवनी तुल्य बनते हैं तो इसमें आश्चर्य ही क्या है ? फलाहार के बारे में जितना वर्णन किया जाय उतना ही थोड़ा है। फलाहार भी दो प्रकार का होता है:—

फल में—अंजीर, अंगूर, संतरा, पपीता, अमरुद, आम, नासपाती, सेब, बेल, शरीफा, मीठा खट्टा दोनों नींबू, ये सस्ते व अच्छे फल होते हैं।

मेवा में - किशमिश, बादाम, पिस्ता, अखरोट काजू, गिरी, मुनक्का, घेल-बीज, छोहारा, सूखे अंजीर, ये अच्छे होते हैं।