ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
उन्हीं की तरह प्राकृतिक आहार करना होगा । जो चीज जिस हालत में पैदा हुई हो उसे वैसे ही खाने से भोजन भी कम लगता है और फायदा भी खूब होता है । परन्तु ज्यों ज्यों उसका रूप बदलता जाता है, त्यों त्यों वह चीज आरोग्य के लिये हानिकार होती जाती है । कच्चे गेहूँ, चना खाना अधिक फायदेमन्द है; क्योंकि इसमें प्राणशक्ति कूट कूट कर भरी रहती है और भोजन भी कम लगता है । परन्तु वचपन ही से आंतें दुर्बल हो जाने के कारण मनुष्य उसे बिना पकाये पचा नहीं सकता । अन्न का पकाने से प्राणशक्ति बहुत नष्ट हो जाती है और इसी कारण अधिक भोजन करने पर भी मनुष्य की तृप्ति नहीं होती और वह अन्यान्य रोगों से पीड़ित हो जाता है । पूड़ी, कचौड़ी आदि तले हुये पदार्थों की प्राणशक्ति तो और भी जल जाती है । इसलिए जहाँ तक हो प्राकृतिक आहार ही करना सर्व-श्रेष्ठ है । मैदा से भूसीयुक्त आटा श्रेष्ठ, भूसी युक्त आटा से दलिया श्रेष्ठ, दलिया से उवलै हुए गेहूँ श्रेष्ठ, उवलै हुए गेहूँ से कच्चे गेहूँ और जौ श्रेष्ठ, कच्चे गेहूँ, चावल, चना इत्यादि से दुग्धाहार श्रेष्ठ और दुग्धाहार से पके ताजे फल श्रेष्ठ हैं ।
फलाहारः— फलाहार अत्यन्त प्राकृतिक और प्राणशक्ति से परिपूर्ण आहार है । फल में सूर्यतेज और बिजली बहुत ही भरी रहता है । इस कारण फलाहारी को सहसा कोई भी रोग नहीं हो सकता । फलाहार से बुद्धि अत्यन्त तीव्र होती है । वीर्य की बुद्धि होती है और काम विकार दब जाते हैं । हमारे पूर्वज ऋषि मुनियों का कन्दमूलफलाहार ही मुख्य आहार था और इसी कारण वे इतने तेजस्वी, बुद्धिमान शान्त, ब्रह्मचारी और दैवीसामर्थ्य