ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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यानी धातु के नाश से रक्त कमजोर हो जाता है और रक्त कमजोर हो जाने से अग्नि यानी भूख भी मन्द पड़ जाती है। यह आयुर्वेद का सिद्धान्त है; अर्थात् पुष्ट और उत्तेजित भोजन से ऐसे लोगों का रहा-सहा वीर्य और भी उल्लूट पड़ता है और वे अधिकाधिक बरबाद होते जाते हैं। तिस पर भी वे सूखी हड़डी चवाने वाले और अपने ही मुख से निकले हुए रक्त को उख सूखी हड़डी ही से निकला हुआ समझने वाले मूर्ख कुत्ते की तरह, अपने पहले ही वीर्य को मालपुआ के प्राप्त हुआ समझते हैं। वाह ! खूब अकलमन्दी ! भक्दास वामन कहते हैं:—
“पालो पत्नी खॉय जो उन्हें सतावे काम। नित प्रति हलुवा निगलते उनकी जाने राम ॥
—भक्दास वामन।
अतः जिन्हें वीर्य की रक्षा करनी है उन्हें चाहिए कि वे मिठाई, खटाई, नमक, मिर्च, मसाला से सर्वथा बचे रहें। सदा सस्ता, सादा, स्वच्छ और स्वरूप भोजन किया करें। नमक, मिर्च, मसाला ये बड़े कामोत्तेजक पदार्थ हैं। लाल मिर्च तो ब्रह्मचर्य के लिये प्रत्यक्ष काल ही है। अतः उन्हें धीरे धीरे कम करके सर्वथा शीघ्र त्याग दें। अभ्यास से कोई भी बात असंभव नहीं है। निश्चय होने पर सभी बातें सहल हैं।
योगी लोग नमक, मिर्च मसालादि नहीं खाते; अनभ्यास के कारण उन्हें वे अच्छे ही नहीं लगते। यदि तुम्हें योगी अर्थात् सुखी बनना हो, वियोगी अर्थात् दुःखी न बनना हो, तो तुमको भी उन्हीं की तरह सात्विक अल्पाहार खूब कुचल कुचल के करना होगा।