भारतकोश
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ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

❁ सादा व ताजा अल्पाहार ❁

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यानी धातु के नाश से रक्त कमजोर हो जाता है और रक्त कमजोर हो जाने से अग्नि यानी भूख भी मन्द पड़ जाती है। यह आयुर्वेद का सिद्धान्त है; अर्थात् पुष्ट और उत्तेजित भोजन से ऐसे लोगों का रहा-सहा वीर्य और भी उल्लूट पड़ता है और वे अधिकाधिक बरबाद होते जाते हैं। तिस पर भी वे सूखी हड़डी चवाने वाले और अपने ही मुख से निकले हुए रक्त को उख सूखी हड़डी ही से निकला हुआ समझने वाले मूर्ख कुत्ते की तरह, अपने पहले ही वीर्य को मालपुआ के प्राप्त हुआ समझते हैं। वाह ! खूब अकलमन्दी ! भक्दास वामन कहते हैं:—

“पालो पत्नी खॉय जो उन्हें सतावे काम। नित प्रति हलुवा निगलते उनकी जाने राम ॥

—भक्दास वामन।

अतः जिन्हें वीर्य की रक्षा करनी है उन्हें चाहिए कि वे मिठाई, खटाई, नमक, मिर्च, मसाला से सर्वथा बचे रहें। सदा सस्ता, सादा, स्वच्छ और स्वरूप भोजन किया करें। नमक, मिर्च, मसाला ये बड़े कामोत्तेजक पदार्थ हैं। लाल मिर्च तो ब्रह्मचर्य के लिये प्रत्यक्ष काल ही है। अतः उन्हें धीरे धीरे कम करके सर्वथा शीघ्र त्याग दें। अभ्यास से कोई भी बात असंभव नहीं है। निश्चय होने पर सभी बातें सहल हैं।

योगी लोग नमक, मिर्च मसालादि नहीं खाते; अनभ्यास के कारण उन्हें वे अच्छे ही नहीं लगते। यदि तुम्हें योगी अर्थात् सुखी बनना हो, वियोगी अर्थात् दुःखी न बनना हो, तो तुमको भी उन्हीं की तरह सात्विक अल्पाहार खूब कुचल कुचल के करना होगा।

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उन्हीं की तरह प्राकृतिक आहार करना होगा । जो चीज जिस हालत में पैदा हुई हो उसे वैसे ही खाने से भोजन भी कम लगता है और फायदा भी खूब होता है । परन्तु ज्यों ज्यों उसका रूप बदलता जाता है, त्यों त्यों वह चीज आरोग्य के लिये हानिकार होती जाती है । कच्चे गेहूँ, चना खाना अधिक फायदेमन्द है; क्योंकि इसमें प्राणशक्ति कूट कूट कर भरी रहती है और भोजन भी कम लगता है । परन्तु वचपन ही से आंतें दुर्बल हो जाने के कारण मनुष्य उसे बिना पकाये पचा नहीं सकता । अन्न का पकाने से प्राणशक्ति बहुत नष्ट हो जाती है और इसी कारण अधिक भोजन करने पर भी मनुष्य की तृप्ति नहीं होती और वह अन्यान्य रोगों से पीड़ित हो जाता है । पूड़ी, कचौड़ी आदि तले हुये पदार्थों की प्राणशक्ति तो और भी जल जाती है । इसलिए जहाँ तक हो प्राकृतिक आहार ही करना सर्व-श्रेष्ठ है । मैदा से भूसीयुक्त आटा श्रेष्ठ, भूसी युक्त आटा से दलिया श्रेष्ठ, दलिया से उवलै हुए गेहूँ श्रेष्ठ, उवलै हुए गेहूँ से कच्चे गेहूँ और जौ श्रेष्ठ, कच्चे गेहूँ, चावल, चना इत्यादि से दुग्धाहार श्रेष्ठ और दुग्धाहार से पके ताजे फल श्रेष्ठ हैं ।

फलाहारः— फलाहार अत्यन्त प्राकृतिक और प्राणशक्ति से परिपूर्ण आहार है । फल में सूर्यतेज और बिजली बहुत ही भरी रहता है । इस कारण फलाहारी को सहसा कोई भी रोग नहीं हो सकता । फलाहार से बुद्धि अत्यन्त तीव्र होती है । वीर्य की बुद्धि होती है और काम विकार दब जाते हैं । हमारे पूर्वज ऋषि मुनियों का कन्दमूलफलाहार ही मुख्य आहार था और इसी कारण वे इतने तेजस्वी, बुद्धिमान शान्त, ब्रह्मचारी और दैवीसामर्थ्य

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से सम्पन्न थे, जिनके ज्ञान को देख कर सारी दुनिया आज भी हैरान हो रही है। हम उन्हीं की सन्तान आज बेवकूफ बन बैठे हैं। यह सब प्राकृतिक नियमोत्लङ्घन से प्राप्त निर्विघ्ना का ही दुष्ट व अनिष्ट प्रभाव है। अतः जिन्हें अपने पूर्वजों की तरह पुनः सदाचारी, ब्रह्मचारी, बुद्धिमान और सामर्थ्यसंपन्न होना है; उन्हें चाहिये कि जहाँ तक हो “प्राकृतिक आहार” करें। भोजन सदा ताजा, स्वच्छ सस्ता, हलका, सादा और अल्प ही किया करें। प्रत्येक ग्रास को खूब चवा चवा कर खायें, नमक, मिर्च, मसाला, मिठाई, खटाई से हमेशा दूर रहें और सदा ऊँचे व पवित्र विचार करें। फिर देखो तुम्हारे शरीर व चेहरे पर क्या ही रौनक आती है और तुम्हारी आत्मा कैसी तेजस्वी व वलिष्ठ होती है।

‘गचिकित्सा—(chromopathy) से यह सिद्ध हुआ है कि शीशियों के ‘बनावटी’ रंग से सूर्यकिरणद्वारा पानी पर जो अद्भुत परिणाम होता है उससे असंख्य रोग नष्ट हो जाते हैं; तब फिर फलों के ‘कुदरती’ रंग द्वारा भीतर रस पर सूर्यप्रकाश और विजली का असर पड़ने से वे फल अमृतसंजीवनी तुल्य बनते हैं तो इसमें आश्चर्य ही क्या है ? फलाहार के बारे में जितना वर्णन किया जाय उतना ही थोड़ा है। फलाहार भी दो प्रकार का होता है:—

फल में—अंजीर, अंगूर, संतरा, पपीता, अमरुद, आम, नासपाती, सेब, बेल, शरीफा, मीठा खट्टा दोनों नींबू, ये सस्ते व अच्छे फल होते हैं।

मेवा में - किशमिश, बादाम, पिस्ता, अखरोट काजू, गिरी, मुनक्का, घेल-बीज, छोहारा, सूखे अंजीर, ये अच्छे होते हैं।

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परदेश से स्वदेश की ही चीज श्रेष्ठ और लाभकारी है। अतः फल की जगह आलू, कन्द, ककड़ी, पक्का कोहड़ा और शाक भाजी भी काम में लाई जा सकती है।

श्री लक्ष्मणजी ने चौदह वर्ष पर्यन्त फलाहार ही किया था। इसी कारण वे हनुमानजी की तरह अखण्ड ब्रह्मचारी रह सके और उनका सामर्थ्य और तेज श्री रामचन्द्रजी से भी अधिक बढ़ गया था। अस्तु; जिन्हें फलाहार शुरू करना हो; वे धीरे धीरे शुरू करें ! प्रथम कुछ दिन तक नमक, मिर्च, मसाला से रहित भोजन का अभ्यास करें; फिर एक मरतवे सादा अरुप भोजन तथा दूसरे मरतवे अरुप फलाहार करें; कुछ दिन के बाद फिर शुद्ध फलाहार करने लग जायें; एक दम कोई काम करने से लाभ के बदले हानि ही होती है, यह बात हमेशा ध्यान में रखो।

दुग्धाहारः—दुग्धाहार फलाहार से घटिया परन्तु अन्नहार से बढ़िया आहार है। दूध घर का और तिस पर भी काली गौ का श्रेष्ठ होता है। काली गौ को “कपिला” या “कामधेनु” कहते हैं। गौ का न हो तो काली भैंस का दूध लेना चाहिए। दूध वाली गाय वा भैंस वा बकरी निरोग व शुद्ध पदार्थ खाने वाली होनी चाहिए। अन्यथा रोगी वा अशुद्ध पदार्थ खाने वाली गाय भैंस व बकरी का दूध पीने से मनुष्य को भी वे रोग बिना हुये कभी नहीं रहेंगे, यह बात स्मरण रहे। बाज़ारू दूध पीने से मनुष्य बहुत जल्द रोगी बनता है; क्योंकि उसमें रास्ते की धूल और गन्दी हवा में के असंख्य जहरीले कीड़े पड़ जाते हैं। यही हाल मिठाई का भी होता है। रोज़ हलवाई एक अंजुली भरी हुई बर्, मक्खियाँ,

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चूँटे, दूध, और मिठाई इत्यादि में से प्रातःकाल निकाल के फेंकता है और उसी को औंटाकर लोगों को पूरे दाम पर मजे में बेचता है। अतः वाज़ारू कोई भी बनी-चनाई चीज़ विशेषतः पतली चीज़ तो कदापि न खानी चाहिये। हलवाई बरौलों का गन्दापन तो मशहूर ही होता है। उनकी पोशाक देख कर ही जी मंचलने लगता है। भला ऐसे गन्दे लोगों के हाथ के, गन्दे प्रकार से बने हुए, पदार्थ खा पी कर कौन आरोग्यसम्पन्न व दीर्घायु हो सकता है। होटल तो मानों मनुष्य के आयुआरोग्य को 'अच्छे दंग' से जलाने वाले मूर्तिमन्त स्मशान ही हैं।

धारोष्ण (तुरन्त का दुहा हुआ) और छना हुआ दूध सर्वोत्कृष्ट होता है। दूध बिना कपड़छान किये कभी न पीयो। गरम करने से दूध की प्राणशक्ति बहुत नष्ट होती है। अतः दूध ताज़ा ही पीना अच्छा है। धारोष्ण दूध से वीर्य बहुत ज्यादा तथा तत्काल बढ़ता है और मन भी शान्त व प्रसन्न रहता है। फल में दूध से अधिक वीर्य उत्पन्न करने की शक्ति होती है। दुहने के आधा घण्टा बाद दूध में विकार उत्पन्न होते हैं। अतः ऐसा ठण्डा दूध फिर उबाल कर ही पीना चाहिये। गरम दूध पीने से पेट और भी साफ होता है। दूध ठंडी आँच पर गरम करना बहुत ही लाभदायक है। दूध धीरे-धीरे जैसा बच्चा माता का दूध पीता है वैसा पीना चाहिए। इस प्रकार थोड़ा-थोड़ा पीने से एक पाव-भर दूध से भर दूध पीने के बराबर होता है। और गटर-गटर पीने से एक सेर दूध भी पाव भर की बराबरी नहीं कर सकता। क्योंकि दूध जल्दी पी लेने से उसका एकदम दही बन कर वह पेट के भीतर ही भीतर फट जाता है—खराब हो जाता है। परन्तु

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थोड़ा-थोड़ा पीने से—मुख में थोड़ी देर रख कर फिर पेट में उतारने से उसका सब सार खींचा जाता है और कुछ भी बेकार नहीं जाता है कोई भी चीज़ जल्दी से खाना, मानों रोगी बन कर जल्दी ही मरने की तैयारी करना है । अतएव सावधान !

मांसाहारः—मांसाहार सब से अधम और राक्षसी आहार है मांसाहारी लोग बहुत विकारी होते हैं । क्योंकि मांस उनका आहार है ही नहीं । मांस जड़ली दुष्ट पशुओं का तथा निशाचरों का आहार है । गाय, घोड़ा, बैल, वन्दर मांस को छू तक नहीं सकते । पर वाह रे मनुष्य ! जंगली नीच जानवरों से भी नीच हो गया है । मांसाहारी पुरुष सदा चंचल क्रोधी व कामी बना रहता है और इस बात का पता शेर, तेन्दुआ, चीता इत्यादि मांसाहारी पशुओं की तरफ देखने से कौरन लग जाता है । वे पशु पिछड़े में हर वक्त इधर-उधर चक्कर लगाया करते हैं । और लोगों की तरफ चंचल व क्रूर दृष्टि से देखा करते हैं । परन्तु वही शाकाहारी गाय से लेकर हाथी तक को देखिये कितने शान्त और निर्बिकारी होते हैं । मांसाहारी पुरुष का ब्रह्मचारी होना मुश्किल तो है ही, परन्तु असम्भव भी है । अपवाद ( exception ) को लेना मूर्खता है । अतः जिन्हें ब्रह्मचारी और सदाचारी बनना हो, उन्हें चाहिये कि वे मांसाहार को सर्वथा एकदम त्याग दें ।

सब्बा आहारः—पहले यह कह आये हैं कि भोजन और बुद्धि का परस्पर बड़ा ही घनिष्ठ संबन्ध है । सात्विक आहार से बुद्धि भी निस्सन्देह सात्विक ही बन जाती है । पर हाँ, भोजन के समय उच्च, पवित्र शान्त और ब्रह्मचर्य-विषयक विचार अवश्य ही करने चाहिये । क्योंकि उच्च और निर्मल विचार ही आत्मा का

❁ सादा व ताज़ा अल्पोहार ❁

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सच्चा आहार है। यदि सात्विक आहार के साथ में सात्विक विचार न किये जायँ, दुष्ट और अधर्मी विचार रखें जायँ तो भोजन का वह सात्विक परिवर्तन सर्वथा व्यर्थ ही समझना चाहिये। भोजन के समय जैसे विचार होते हैं मनुष्य ठीक वैसा ही “आप से आप” बन जाता है, ऐसा महापुरुषों का स्वानुभवपूर्ण सिद्धान्त है; क्योंकि भोजन के रस द्वारा वे विचार मनुष्य के नस-नस में प्रवेश कर सम्पूर्ण शरीर में फैल जाते हैं। स्थूल भोजन से विचार का सूक्ष्म भोजन कई गुना श्रेष्ठ और प्रभावशाली होता है, यह आध्यात्मिक सिद्धान्त है। अतएव भोजन के समय पवित्र, उच्च, निर्भय, शान्त और ईश्वरीय भाव के विचार से अवश्य रखने चाहिए। नीच विचार से नीच, और उच्च विचार से तुम अवश्य ही उच्च बन जाओगे। पापी विचार से पापी, व्यभिचारी विचार से व्यभिचारी और पुण्यमयी तथा ब्रह्मचारी विचार से तुम निस्सन्देह पुण्यवान और ब्रह्मचरी बन जाओगे। यदि तुम्हें काम को और भय को हटाना है, तो हनुमान जी का ध्यान करो और उनके ही जैसे हमेशा—विशेषतः भोजन के समय खास तौर पर—“पर-खी मात समान” ऐसे पवित्र विचार करो। आलस्य और मलीनता को हटाने के लिये स्वकर्तव्यपरायण श्रीलक्ष्मणजी जैसे पवित्र विचार करो; क्रोध को हटाना हो तो ब्रुद्धजी जैसे शान्त, प्रेमी, हृमाशील व दयालु विचार करो। छोटे दिल को हटाने के लिये कर्ण और वलि की उदारता का चिन्तन करो। दरिद्रता को हटाने के लिये राजा के तुल्य श्रीमान् विचार करो और व्यग्रता छोड़ शान्त चित्त से उस सर्वव्यापी लक्ष्मीपति भगवान् का ध्यान करो, जिसकी लक्ष्मी पैर दवाती और सेवा करती है। लक्ष्मीपति का ध्यान करने

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❁ त्रल्लचर्य्य ही जीवन है ❁

से तुम भी लक्ष्मीपति अवश्य बन जाओगे अर्थात् धन आप से आप तुम्हारे चरणों की सेवा करेगा; क्योंकि “ध्याने ध्याने तद्रूपता” ऐसा ही प्रकृति का सिद्धान्त है। अतः जैसे जैसे तुम अपने को घनाना चाहते हो, वैसे ही अथवा जिस दुर्गुण को या आदत को आप हटाना चाहते हो, उसके ठीक ठीक विरुद्ध विचार अद्वा, और शान्ति के साथ करा। निस्सन्देह तुम वैसे ही बन जाओगे। याद रखो, जैसे आपकी अद्वा और शान्ति होंगी वैसे ही आपको कम ज्यादा और जल्दी देरी में फल मिलेगा क्योंकि अद्वा और शान्ति ही संपूर्ण सौभाग्य और ईश्वरत्व की कुंजी है और भगवान् श्रीकृष्ण का भी यही सिद्धान्त* है।

मनुष्य के जैसे विचार होते हैं वैसा ही वातावरण atmosphere उसके बाहर-भीतर चहुँओर निर्माण होता है और फिर “योग्य योग्येन युज्यते।” अथवा Like attracts like यानी समान समान की ओर खिंचता है। इस न्याय से फिर वैसे ही विचार के पुरुष हमारे निकट खिंच आते हैं, अथवा हम उनके निकट खिंच जाते हैं, और हमारे विचारानुकूल ही अनेक शुभाशुभ घटनायें निर्माण होती हैं, जिनसे कि हमारा अभीष्ट या अनिष्ट आपसे आप सिद्ध होता है। आज जिस स्थिति में हम लोग हैं उस स्थिति के निर्माता खुद हम ही हैं और आहार, विचार व आचार के प्रभाव से हम इस स्थिति के बाहर भी निकल सकते हैं और जैसी चाहें वैसी उन्नति कर सकते हैं। इसी स्थिति में पढ़े रहने के लिये मनुष्य का जीवन नहीं है। वस्तुतः परमपद प्राप्त करना ही

*अद्वाऽमयो यं पुरुषो यो यच्छृङ्गः स एव सः ॥ गीता १७—३ ॥

❁ सादा व ताज़ा अल्पाहार ❁

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जीव मात्र का जीवनोंदेश्य है। उसी दिव्य स्थिति को हम लोगों को पहुंचना है और यह बात मनुष्य एक मात्र अपने शुद्ध, ऊँचे व सात्विक आहार, विचार और आचार द्वारा ही प्राप्त कर सकता है। महापुरुष अपने महान विचारों के द्वारा ही महान होते हैं और नीच पुरुष अपने नीच विचारों के कारण ही नीच होते हैं। अतएव सदैव पवित्र और ऊँचे विचार करना और श्रद्धा व शान्तिपूर्वक अपने को उन्नति की ओर बढ़ाना प्राणिमात्र का प्रधान कर्तव्य है और यह काम नित्यभोजन के समय वैसे ही श्रेष्ठ व पवित्र विचार रखने से बड़ी आसानी से बहुत जल्द सिद्ध होता है।

भोजन के शास्त्रीय नियम

(१) केवल दो ही समय भोजन करना चाहिये; पहला भोजन १० से लेकर १२ बजे के भीतर और दूसरा शाम को ८ बजे के भीतर; देर में करने से स्वप्न दोष होता है। (२) दिन भर में एकसरतबे भोजन करना सर्वोत्कृष्ट है—“एकमुक्त सदा रोग मुक्त” (३) रात में ८ बजे के भीतर थोड़ा सा ताज़ा ठंडा दूध बिलकुल थोड़ी सी चीनी डालकर धीरे धीरे पी लेना चाहिये। रात में गरम दूध पीने से स्वप्नदोष होता है। (४) बहुत गरम गरम भोजन कदापि न करना चाहिये। उससे वीर्य पतला पड़ जाता है और कामोत्तेजना होती है। गरम भोजन से और चाय से दाँत जल्दी दूट जाते हैं, आँतें दुर्बल पड़ती हैं, कञ्जियत बढ़ती है, और आँख की ज्योति मन्द पड़ जाती है। (५) भोजन हमेशा ताज़ा और सादा रहे। भोजन अनेक प्रकार का और वासी होने से अनेक विकार फौलन बढ़ जाते हैं। वासी भोजन से बुद्धि, आयु और तेज तत्काल

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❁ ब्रह्मचर्य्य हो जीवन है ❁

नष्ट हो, आलस छाती पर ज़बरदस्ती सवार होता है और मनुष्य को पाप कर्म में प्रवृत्त करता है। (६०) कभी हलक तक दूंस दूंस न खाओ; उससे बरबाद हो जाओगे। (७) थकने पर तत्काल भोजन न करना चाहिये। (८) भोजन के बाद शारीरिक व मानसिक परिश्रम एक घण्टा तक कदापि न करना चाहिये। एक घण्टा—कम से कम आध घण्टा तक आराम करो, नहीं तो रोगग्रस्त बन जल्दो ही मरना पड़ेगा। (९) भोजन के समय सदा शान्त, पवित्र व ऊँचे विचार रखो। चिड़चिड़ापन से अन्न हजम नहीं होता। क्रोध से अन्न जहर बन जाता है; अतः भोजन के समय हमेशा शांत रहो शान्ति के हेतु मौन धारण करो। (१०) नमक मिर्च, मसाला, पूड़ी, कचौड़ी, मिठाई, खटाई, मद्य, मांस, चाय, काफी वगैरह सर्वथा त्याग दो; क्योंकि इनसे मन व इन्द्रियां अत्यन्त चंचल बन जाती हैं। ऐसा पुरुष वीर्य को नहीं रोक सकता। (११) भोजन के समय पानी न पीना चाहिये; क्योंकि वैसा करना प्रकृति के खिलाफ है। भोजन के एक घण्टा बाद पानी पीना अच्छा है। (१२) भोजन के पहले हाथ, पैर और मुँह को पानी से पूरे तौर से स्वच्छ धो डालो और नारखून साफ रखो; क्योंकि उनमें जहर होता है। (१३) भोजन नियमित समय पर किया करो और फिर बीच में कुछ भी न खाओ। (१४) राह चलते, खड़े रहते व लेटे हुए भोजन करना सर्वथा अनुचित है। (१५) प्रातः काल जल पान अर्थात् कलेवा करना अच्छा नहीं है। (१६) भोजन की जगह पवित्र व प्रकाशमय होनी चाहिये। गन्दगी से जिन्दगी जल्दी बरबाद होती है, इस बात को सदा सर्वदा ध्यान में रखो। (१७) भोजन के बाद “शतपद्” अर्थात् सौ कदम इधर-उधर टहलना

❁ सादा व ताजा अल्पाहार ❁

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चाहिये। भोजनोत्तर तुरन्त आराम-कुर्सी पर पड़े, तो उससे बहुत हानि होती है; और दौड़ने से प्राण का नाश होता है।

जल सम्बन्धी शास्त्रीय नियम

(१) पानी स्वच्छ निर्गन्ध, जिस पर सूर्य का प्रकाश पड़ता हो ऐसा ताजा, उन्हा वहता हुआ अथवा गाँव के बाहर के कुएँ का होना चाहिये। क्योंकि ताजे जल में बहुत प्राणशक्ति भरी रहती है। जल को संस्कृत में 'जीवन' कहते हैं; सचमुच जल ही जीवन का मुख्य आधार है। भोजन से भी जल का महत्व अधिक है।

(२) दिन भर में कम से कम तीन सेर पानी पीना चाहिये; क्योंकि उतना ही शरीर से पेशाब, पसीना और भाप के रूप में खर्च होता है। ऋतु काल के अनुसार पानी की मात्रा कम ज्यादा भी करना उचित है। कृष्ण की बीमारी अवसर कम पानी पीने ही से हुआ करती है। यदि कृष्ण वाले यथेष्ट पानी पीने लग जाँय तो उनकी यह बीमारी बहुत जल्द दूर हो सकती है। तथापि अति पानी पीना भी रोग-कर है—“अति सर्वत्र दज्येत”।

(३) पानी छानकर ही पीना चाहिये और छानने का कपड़ा हर वक्त साफ़ कर लेना चाहिये क्योंकि उसमें सूक्ष्म जल जन्तु रहते हैं। विशेषतः हैजा वगैरह रोगों के दिनों में और दूषित स्थानों में, पानी हमेशा अच्छी तरह उबाल कर और छान कर ही पीना चाहिये, अन्यथा आलस्य के कारण मुक्त में रोगी बन के अकाल में मरना पड़ेगा। रोगी होने का कारण विशेषतः दूषित जल ही होता है। अतएव सावधान !

(४) जल थोड़ा थोड़ा दूध की तरह पीना चाहिये। पीते वक्त नीचे

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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

ऊपर के दाँत संलग्न करने से पानी में भी प्राणशक्ति पूरी तरह से खींची जा सकती है; पानी भी थोड़ा थोड़ा पीने में आता है और दाँत भी मजबूत हो जाते हैं; तथा पानी में का कूड़ा करकट भी पेट में नहीं जाने पाता। एक मनुष्य के पेट में, दाँत संलग्न न करने के कारण एक साँप का बच्चा तक चला गया था फिर भैंस के मट्टा से (उसमें मोहरी मिलाकर और पिला करके) कै करायी गई तब वह निकला। अतः सावधान रहो। (५) प्यास को कभी न रोकना चाहिये; क्योंकि उससे जीवनशक्ति का भयंकर रूप से नाश होता है और मनुष्य अल्पायु बनता है। (६) प्यास की वृत्ति पानी ही से करो न कि सोडा-लेमन और वरक-शराब से। याद रखो, प्रकृति के विरुद्ध चलने से कोई सात जन्म में भी सुखी नहीं हो सकता। (७) भोजन के समय विलकुल पानी न पीना चाहिये क्योंकि वैसा करना प्रकृति के सर्वथा विरुद्ध है। कोई भी बुद्धिमान पुरुष हमें चींटी से लेकर हाथी तक ऐसा कोई भी प्राणी वतला दे, जो कि भोजन के समय पानी पीता हो। भोजन के साथ पानी न पीने से बहुत लाभ है हाजमा दुरुस्त होता है; शौच साफ होता है; बढ़ा हुआ पेट घटता है; गले की जलन नष्ट होती है और भोजन भी कम लगता है अर्थात् पेटूपन के छूटने से हम अनेक रोगों से भी अनायास छूट जाते हैं। (८) भोजन के आधा या पाव घंटा पहिले एक गिलास पानी पी लेने से भोजन के समय तुम्हें प्यास नहीं सतावेगी। उससे पेटूपन का भी नाश होता है और खोटी भूख नष्ट होकर सच्ची लगने लगती है। भोजन के साथ पानी न पीने का अभ्यास जाड़े के दिनों से सुखपूर्वक शुरू किया जा सकता है। (९) शुष्क यानी जिस भोजन में विलकुल पानी नहीं होता ऐसा

❁ सादा व ताजा अलपाहार ❁

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रूखा-सूखा भोजन करने के बाद तुरन्त पानी पीना भी प्राकृतिक नियम के अनुकूल है। (१०) एकदम सेर ढेढ़-सेर पानी पीना हानिकारक है; उससे 'बहु-भूत्रता' का रोग होता है। व्यास मात्स्य हो तब २-३ गिलास पानी थोड़ा थोड़ा करके सावकाश पूर्वक पीना उचित है। (११) खड़े खड़े, या लेटे हुये पानी कदापि न पीना चाहिये, यह कमजोर रोगियों का काम है। (१२) रात्रि में सोने के आधा घण्टे पहले ठण्डा जल अवश्य पी लेना चाहिये; ढेर सा नहीं और पेशाब करके सोना चाहिये। इससे चित्त व चोला दोनों शान्त रहते हैं और स्वप्नदोष भी रुक जाता है; तथा दूसरे दिन मल त्यागने में भी सुभीता होता है। (१३) प्रातःकाल उठते ही सूर्योदय से पहले स्वच्छ तांबे के लोटे में रात भर रक्खा हुआ जल पीने से रागी भी निरोग और विष भी निर्विष हो जाता है। मन प्रसन्न होता है। पेटूपन का नाश होता है और आयु बढ़ती है। पानी पीकर जरा लैट कर पेट को नाभी के चारों ओर दबाने से (रगड़ने से) पाखाना बहुत साफ होता है। प्रातःकाल का यह जल अमृत के तुल्य होता है। यदि नाक से पिया जाय तो नेत्र के समस्त विकार दूर हो जाते हैं; दृष्टि अत्यंत तेजस्वी बनती है; बुद्धि तीव्र होती है; नासारोग दुरुस्त होते हैं; बुढ़ापा जल्दी नहीं आता; बाल बहुत उम्र तक काले बने रहते हैं; और संपूर्ण रोग दुरुस्त हो जाते हैं। क्योंकि तांबे में ऐसे ही कुछ चमत्कारिक गुण भरे हुये हैं। इसी कारण हमारे पूर्वजों ने देव पूजा में सर्वत्र तांबे के ही पात्रों का विशेषतः विधान लिखा है। धन्य हैं उनके उपकार! (१४) यदि किसी को कब्ज की शिकायत बहुत दिनों की हो तो सुबह एक-दो गिलास मामूली गरम पानी में एक चम्मच भर खाने का नमक

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डालकर उसे पी लो । फिर चित लेट जाओ और नाभी के चारों तरफ से पेट को रगड़ो । देखो आठ दिन ही में पाखाना साफ होने लगेगा; बवासीर की बीमारी कम हो जायगी; जठर रोग, कर्ण रोग, सिर दर्द गला और छाती के रोग, नेत्र रोग, कोढ़, कमर का दर्द, सूजन आदि असंख्य विकार शनैः शनैः नष्ट हो जायेंगे । अवश्य अनुभव कीजिये । परन्तु यह उपाय भी अप्राकृतिक है; फिर इसे छोड़ देना चाहिये । (१५) एनिमा का उपाय भी कञ्चित्त के लिये सर्वोत्कृष्ट होने पर भी अप्राकृतिक है । अतः एनिमा की आदत न लगाओ । एनिमा का उपयोग कभी कभी क्वचित् किया करो—एनिमा का रोज उपयोग करने से आते सदा के लिये कमजोर बन जाती हैं । अतएव सावधान ! (१६) जल पीते वक्त “इस जल से मुझ में सुख, शान्ति, आरोग्य, ब्रह्मचर्य, तेज इत्यादि प्रवेश कर रहे हैं और मैं पूर्ण आरोग्य हो रहा हूँ ।” इस प्रकार के संकल्प व आत्म-कथन अवश्य किया करो । क्योंकि जैसे तुम जल पीते ( अथवा सभी समय ) संकल्प करोगे ठीक वैसे ही भाव तुम्हारे रोम रोम में घुस जायेंगे और तुम निःसन्देह वैसे ही बन जाओगे, ऐसा हम प्रतिज्ञा-पूर्वक कह सकते हैं ।

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“निर्व्यसनता”

नियम आठवाँ:—

वक्तव्य:—संपूर्ण दुर्व्यसनों की माता बीड़ी या सिगरेट है। इसी से गाँजा से लेकर संखिया तक का शौक्र बढ़ जाता है। यह नितान्त सत्य है कि दुर्व्यसनी पुरुष कदापि ब्रह्मचारी नहीं हो सकता। अमेरिकन डाक्टरों का कथन है, “तन्त्राकृ के सेवन से वीर्य फौजन उत्तेजित होकर पतला पड़ता है, पुरुषत्व शक्ति क्षीण होती है; पित्त विगड़ जाता है, नेत्र-ज्योति मन्द होती है, मस्तिष्क व छाती कमजोर होती है, खाँसी ( जो कि सब रोगों का जड़ है ), दमा और कफ बढ़ते हैं। आलस्य, कार्य में अनिच्छा, हृदय की धकधकाहट, व्यर्थ चिन्ता व अनिद्रा बढ़ती है, सुख से महान् दुर्गन्धि आती है, शारीरिक, मानसिक, आर्थिक व सामाजिक भयंकर हानि होती है।” शुद्ध हवा को जहरीली बना कर अपने साथ हो साथ लोगों का भी स्वास्थ्य विगाड़ना घोर पाप है। मेदक, पत्ती, वरै, मक्खियों और अन्य असंख्य कीड़े तन्त्राकृ की लपट मात्र ही से बेकाम होकर मर जाते हैं; तब फिर स्वयम् पीनेवाला अकाल ही में क्यों नहीं मरेगा ? तन्त्राकृ में “निकोटिन” नामक भयंकर विष होता है, जो कि शरीर के स्वास्थ्य और सद्भावों को मार डालता है। कई लोग इसे पाखाना साफ़ होने की दवा समझ बैठे हैं; परन्तु नतीजा उलटा ही होता है। आँतें और भी दुर्बल हो जाती हैं। फिर उन्हें बिना बीड़ी, चाय वगैरह पिये पाखाना होता ही नहीं देखो, यह कैसी गुलामी है ? शोक ! यदि पीछे दिये हुए अनुसार नमक पानी का उपयोग किया जाय तो बहुत जल्द निरोग हो सकते

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हैं । परन्तु ऐसे लोग कैसे मानेंगे ? चयी बन कर उन्हें जल्दी मरना है न ?

जापान में यदि बीस बरस का बालक चुरुट, सिगरेट, बीड़ी या तम्बाकू पीते देखा जाय तो फौज उसके माता पिता पर जुर्माना होता है । हे प्रभो ! ऐसा सामाजिक प्रबन्ध भारत में कब होगा ? और हम भी अपने भाई जापानियों की तरह शूर, वीर, साहसी, उद्योगी और ब्रह्मचारी कब बनेंगे ?

हे प्रभो आनन्ददाता ज्ञान हमको दीजिये । शीघ्र सारे दुर्गुणों को दूर हमसे कीजिये ॥ लीजिये हमको शरण में हम सदाचारी बने । ब्रह्मचारी, धर्मरक्षक, वीर-व्रतधारी बने ॥

“दो बार मल-मूत्र-त्याग”

नियम नवोंः—

वक्तव्यः—शौच को दो मरतबे जाने की आदत डालो । यदि दूसरी बार दिशा न मालूम हो तब भी जाओ । कुछ दिन के बाद आप से आप दिशा होने लगेगा । अनेक रोगों की जड़ मलवद्धता ही है । और मल वद्धता का एक मात्र असली कारण वीर्य का नाश ही है । “धातु-वृत्तात् श्रुतेरुक्तमन्दः संजायतेऽनलः ।” वीर्यनाश से रक्त-कमजोर, निकम्मा और नष्ट होकर अनल अर्थात् जठराग्नि मन्द पड़ जाती है । आँतों के दुर्बल होने पर फिर पाखाना भी साफ नहीं होता है ।

कैंदों वार मल-मूत्र-त्यागक

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चाय, तन्वाकू पीने से और वार वार जुलाव, एनीमा वगैरह लेने से तो आँते और भी दुर्बल बन जाती हैं। पाखाना हो, चाहे न हो, परन्तु भोजन अवश्य करना होगा ! चढ़ा देते हैं मात्रा पर मात्रा ! नतीजा यह होता है कि अन्न भीतर ही भीतर सड़ कर अत्यन्त वदवृद्धार और जहरीला बन जाता है। बाहर निकलने पर जिस मैले से नाक फूटी जाती है, ऐसा जहर पेट में रहने पर हम कैसे सुखी और दीर्घजीवी हो सकते हैं ? दिशा को रोकने से तो और भी मूर्खता कर बैठते हैं; उससे भीतर का “अपानवायु” विगड़ कर मैले को ऊपर की ओर चढ़ा देता है, जिससे कि वह खराब मैला फिर से पचने लगता है। भला बताइये अब स्वास्थ्य की आशा कहाँ है ? अपान-वायु को रोकने से भी यही नतीजा होता है। हम कहते हैं, पहले ऐसा टूँस टूँस के खाना ही क्यों, जिससे कि दिन भर डकार और खराब वायु छोड़ना पड़े। अन्न को चबा चबा के न खाने से तो और भी मूर्खता कर बैठते हैं। पहले ही तो आँते दुर्बल और उसमें श्वान की तरह मटपट भोजन ! कैसे स्वास्थ्य रह सकता है ? शरीर सुस्त पड़ जाता है, दिमाग में गर्मी छा जाती है, नेत्र विगड़ जाते हैं, रुचि नष्ट हो जाती है, भूख नहीं लगती, बल, तेज; उत्साह सभी घट जाते हैं, सदा रोगीसूत्र बनती रहती है और आयु बड़ी तेजी से घटती जाती है। इस बला से बचने का एक मात्र यही उपाय है कि हम फिर से प्रकृति के नियमानुसार चलें। रोगी पुरुष कदापि ब्रह्मचारी नहीं हो सकता। श्वान की तरह उताबली से भोजन करना और मल-मूत्र को रोकना मानों प्रत्यक्ष काल के मुख में ही जाना है। सैले की गर्मी के कारण भीतर की सब इन्द्रियाँ चून्ध हो जाती हैं

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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

और इन्द्रियाँ चू नष्ट होने पर फिर मनुष्य रोगी होने पर भी बड़ा कामी बन जाता है। मल-मूत्र को और वायु को किसी काम में फँस कर अथवा मोहवश वा लज्जा के कारण, जाड़े के डर से व किसी कारण रोकना मानों अपने स्वास्थ्य पर कुल्हाड़ी मारना है। ऐसा करना ब्रह्मचर्य के लिये महान हानिकार है। अतः ब्रह्मचर्य और स्वास्थ्य-रक्षा के लिये सुबह-शाम दो मरतबे “नियमित समय पर” मल मूत्र का त्याग करना परम आवश्यक है। शाम को दिशा हो आने से सुबह का पाखाना बड़ा साफ़ होता है। मल के निकल जाने पर तन और मन दोनों निर्मल होते हैं।

दिशा के समय हरगिज़ कॉलो मत; उससे वीर्य बाहर निकल पड़ने की विशेष संभावना है और बहुमूत्रता का रोग होता है। कब्ज़ की बीमारी अधिक हो तो पानी का यथेष्ट उपयोग करो। एक-दो आँवला खाकर पानी पी लो, पेट को रगड़ो और आँतों को “मल त्याग करने की” सोते वक्त आज़्ञा दे रखो; सब काम दुरुस्त हो जायगा। इन सब का स्वयं अनुभव करके देखिये।

“इन्द्रिय-स्नान”

नियम दशवाँ:—

वक्तव्य—जननेन्द्रिय को बिना कारण कदापि हाथ न लगाओ और न उसकी ओर देखो भी, क्योंकि अशुचिस्थान का स्पर्श और चिन्ता न करने से काम-रिपु कभी जागृत नहीं हो सकता। भाव सदैव ऊँचे व पवित्र रखो। शौच के समय इन्द्रिय को स्वच्छता

❁ इन्द्रिय-स्नान ❁

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से घों डालो। मणि पर ठण्डे जल की धार छोड़ो। देखो, इस बात को कभी न भूलो जननेन्द्रिय में शरीर की तमाम नसें इकट्ठी हुई हैं। मानों सब शरीर का वह केन्द्र व मध्य है; और है भी वैसा ही। पेड़ की जड़ को पानी देने से जैसे सम्पूर्ण पेड़ हरा-भरा और चैतन्यमय बन जाता है, वैसे ही तमाम नसों की जड़ को इन्द्रिय को, ठण्डे पानी की धार से ठण्डा करने से सम्पूर्ण शरीर भी ठण्डा और शान्त हो जाता है। मन की चंचलता नष्ट होती है और स्वप्रदोष भी नहीं होने पाता। दिशा, पेशाब के समय में इस अत्यन्त उपकारी क्रिया को (इन्द्रिय-स्नान को) कभी न भूलो, क्योंकि यह ब्रह्मचर्य रक्षा का परम गुप्त रहस्य है। हमारे शास्त्रों में ऋषि लोगों ने पेशाब के समय पानी साथ ले जाने की जो आज्ञा दी है, उसमें हमारे कल्याण के अति उच्च हेतु भरे हुए हैं। अहं धन्य है ! परन्तु आजकल के सुट्टी भर ज्ञान के अधूरे लोग इस बात पर हँसते हैं; परन्तु वही क्रिया लुई कुहनी जैसे किसी पश्चिमीय विद्वान् ने यदि 'सिद्ध-वाथ' के रूप में रख दी तो लोग भट उस क्रिया पर दृढ़ पड़ते हैं और उसकी तारीफ करने लगते हैं।

अभी हम अपने देश का तथा देश के महापुरुषों का आदर करना कब सीखेंगे ? हमको विदेशियों की बात पर विश्वास है, किन्तु पूर्वजों की वैज्ञानिक बातों पर विश्वास नहीं। शोक !

जिसको न निज गौरव तथा, निज देश का अभिमान है। वह नर नहीं, नर पशु नरा है, और मृतक समान है ॥ १ ॥ अस्तु ॥

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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

पेशाव के समय गिलास या लोटा में पानी अवश्य ले जाया करो । बहुत ही उपकार होगा । शर्म से अपना सत्यानाशन कर लो । बाहर घूमने जाते समय हर वक्त एक रुमाल या अँगोखा साथ में रखो, ताकि उसे ही पानी में भिगो कर काम में ला सको । दिशा के समय पानी बड़े लोटे में ले जाओ । कई सज्जन तो बिना लोटा में पानी लिये ही दिशा मैदान जाते हैं ! यह क्या सम्भ्यता, ज्ञान और सच्चरित्रता के लक्षण हैं । यह कैसा घोर पशुपन है ? भाइयो, मनुष्य बनो ! मनुष्य बनो ! दिशा पेशाव के बाद संपूर्ण हाथ पैर ( अधूड़े नहीं ) ठंडे जल से स्वच्छ धो डालने चाहिये, इससे और भी लाभ होता है ।

“नियमित व्यायाम”

नियम ग्यारहवाँ:—

“प्रायेण श्रीमतां लोके भोक्तुं शक्तिं विद्यते ।

काष्ठान्यपि हि जीर्यन्ते दरिद्राणां च सर्वशः ॥”

— महाभारत ।

“धनी लोगा को सुपक्व अन्न भी पचाने की प्रायः शक्ति नहीं होती; परन्तु गरीब लोगो को काष्ठ तक पच जाते हैं” ।

दो लड़के थे—एक गरीब का और दूसरा धनी का । धनी के लड़के ने गरीब से पूछा, “भाई, तू गरीब होने पर भी इतना सशक्त