भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

पृष्ठ 137, कुल 199 में से

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कैंदों वार मल-मूत्र-त्यागक

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चाय, तन्वाकू पीने से और वार वार जुलाव, एनीमा वगैरह लेने से तो आँते और भी दुर्बल बन जाती हैं। पाखाना हो, चाहे न हो, परन्तु भोजन अवश्य करना होगा ! चढ़ा देते हैं मात्रा पर मात्रा ! नतीजा यह होता है कि अन्न भीतर ही भीतर सड़ कर अत्यन्त वदवृद्धार और जहरीला बन जाता है। बाहर निकलने पर जिस मैले से नाक फूटी जाती है, ऐसा जहर पेट में रहने पर हम कैसे सुखी और दीर्घजीवी हो सकते हैं ? दिशा को रोकने से तो और भी मूर्खता कर बैठते हैं; उससे भीतर का “अपानवायु” विगड़ कर मैले को ऊपर की ओर चढ़ा देता है, जिससे कि वह खराब मैला फिर से पचने लगता है। भला बताइये अब स्वास्थ्य की आशा कहाँ है ? अपान-वायु को रोकने से भी यही नतीजा होता है। हम कहते हैं, पहले ऐसा टूँस टूँस के खाना ही क्यों, जिससे कि दिन भर डकार और खराब वायु छोड़ना पड़े। अन्न को चबा चबा के न खाने से तो और भी मूर्खता कर बैठते हैं। पहले ही तो आँते दुर्बल और उसमें श्वान की तरह मटपट भोजन ! कैसे स्वास्थ्य रह सकता है ? शरीर सुस्त पड़ जाता है, दिमाग में गर्मी छा जाती है, नेत्र विगड़ जाते हैं, रुचि नष्ट हो जाती है, भूख नहीं लगती, बल, तेज; उत्साह सभी घट जाते हैं, सदा रोगीसूत्र बनती रहती है और आयु बड़ी तेजी से घटती जाती है। इस बला से बचने का एक मात्र यही उपाय है कि हम फिर से प्रकृति के नियमानुसार चलें। रोगी पुरुष कदापि ब्रह्मचारी नहीं हो सकता। श्वान की तरह उताबली से भोजन करना और मल-मूत्र को रोकना मानों प्रत्यक्ष काल के मुख में ही जाना है। सैले की गर्मी के कारण भीतर की सब इन्द्रियाँ चून्ध हो जाती हैं

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