ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
हैं । परन्तु ऐसे लोग कैसे मानेंगे ? चयी बन कर उन्हें जल्दी मरना है न ?
जापान में यदि बीस बरस का बालक चुरुट, सिगरेट, बीड़ी या तम्बाकू पीते देखा जाय तो फौज उसके माता पिता पर जुर्माना होता है । हे प्रभो ! ऐसा सामाजिक प्रबन्ध भारत में कब होगा ? और हम भी अपने भाई जापानियों की तरह शूर, वीर, साहसी, उद्योगी और ब्रह्मचारी कब बनेंगे ?
हे प्रभो आनन्ददाता ज्ञान हमको दीजिये । शीघ्र सारे दुर्गुणों को दूर हमसे कीजिये ॥ लीजिये हमको शरण में हम सदाचारी बने । ब्रह्मचारी, धर्मरक्षक, वीर-व्रतधारी बने ॥
“दो बार मल-मूत्र-त्याग”
नियम नवोंः—
वक्तव्यः—शौच को दो मरतबे जाने की आदत डालो । यदि दूसरी बार दिशा न मालूम हो तब भी जाओ । कुछ दिन के बाद आप से आप दिशा होने लगेगा । अनेक रोगों की जड़ मलवद्धता ही है । और मल वद्धता का एक मात्र असली कारण वीर्य का नाश ही है । “धातु-वृत्तात् श्रुतेरुक्तमन्दः संजायतेऽनलः ।” वीर्यनाश से रक्त-कमजोर, निकम्मा और नष्ट होकर अनल अर्थात् जठराग्नि मन्द पड़ जाती है । आँतों के दुर्बल होने पर फिर पाखाना भी साफ नहीं होता है ।