भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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❁ निर्व्यसनता ❁

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“निर्व्यसनता”

नियम आठवाँ:—

वक्तव्य:—संपूर्ण दुर्व्यसनों की माता बीड़ी या सिगरेट है। इसी से गाँजा से लेकर संखिया तक का शौक्र बढ़ जाता है। यह नितान्त सत्य है कि दुर्व्यसनी पुरुष कदापि ब्रह्मचारी नहीं हो सकता। अमेरिकन डाक्टरों का कथन है, “तन्त्राकृ के सेवन से वीर्य फौजन उत्तेजित होकर पतला पड़ता है, पुरुषत्व शक्ति क्षीण होती है; पित्त विगड़ जाता है, नेत्र-ज्योति मन्द होती है, मस्तिष्क व छाती कमजोर होती है, खाँसी ( जो कि सब रोगों का जड़ है ), दमा और कफ बढ़ते हैं। आलस्य, कार्य में अनिच्छा, हृदय की धकधकाहट, व्यर्थ चिन्ता व अनिद्रा बढ़ती है, सुख से महान् दुर्गन्धि आती है, शारीरिक, मानसिक, आर्थिक व सामाजिक भयंकर हानि होती है।” शुद्ध हवा को जहरीली बना कर अपने साथ हो साथ लोगों का भी स्वास्थ्य विगाड़ना घोर पाप है। मेदक, पत्ती, वरै, मक्खियों और अन्य असंख्य कीड़े तन्त्राकृ की लपट मात्र ही से बेकाम होकर मर जाते हैं; तब फिर स्वयम् पीनेवाला अकाल ही में क्यों नहीं मरेगा ? तन्त्राकृ में “निकोटिन” नामक भयंकर विष होता है, जो कि शरीर के स्वास्थ्य और सद्भावों को मार डालता है। कई लोग इसे पाखाना साफ़ होने की दवा समझ बैठे हैं; परन्तु नतीजा उलटा ही होता है। आँतें और भी दुर्बल हो जाती हैं। फिर उन्हें बिना बीड़ी, चाय वगैरह पिये पाखाना होता ही नहीं देखो, यह कैसी गुलामी है ? शोक ! यदि पीछे दिये हुए अनुसार नमक पानी का उपयोग किया जाय तो बहुत जल्द निरोग हो सकते