ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
डालकर उसे पी लो । फिर चित लेट जाओ और नाभी के चारों तरफ से पेट को रगड़ो । देखो आठ दिन ही में पाखाना साफ होने लगेगा; बवासीर की बीमारी कम हो जायगी; जठर रोग, कर्ण रोग, सिर दर्द गला और छाती के रोग, नेत्र रोग, कोढ़, कमर का दर्द, सूजन आदि असंख्य विकार शनैः शनैः नष्ट हो जायेंगे । अवश्य अनुभव कीजिये । परन्तु यह उपाय भी अप्राकृतिक है; फिर इसे छोड़ देना चाहिये । (१५) एनिमा का उपाय भी कञ्चित्त के लिये सर्वोत्कृष्ट होने पर भी अप्राकृतिक है । अतः एनिमा की आदत न लगाओ । एनिमा का उपयोग कभी कभी क्वचित् किया करो—एनिमा का रोज उपयोग करने से आते सदा के लिये कमजोर बन जाती हैं । अतएव सावधान ! (१६) जल पीते वक्त “इस जल से मुझ में सुख, शान्ति, आरोग्य, ब्रह्मचर्य, तेज इत्यादि प्रवेश कर रहे हैं और मैं पूर्ण आरोग्य हो रहा हूँ ।” इस प्रकार के संकल्प व आत्म-कथन अवश्य किया करो । क्योंकि जैसे तुम जल पीते ( अथवा सभी समय ) संकल्प करोगे ठीक वैसे ही भाव तुम्हारे रोम रोम में घुस जायेंगे और तुम निःसन्देह वैसे ही बन जाओगे, ऐसा हम प्रतिज्ञा-पूर्वक कह सकते हैं ।