ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
और इन्द्रियाँ चू नष्ट होने पर फिर मनुष्य रोगी होने पर भी बड़ा कामी बन जाता है। मल-मूत्र को और वायु को किसी काम में फँस कर अथवा मोहवश वा लज्जा के कारण, जाड़े के डर से व किसी कारण रोकना मानों अपने स्वास्थ्य पर कुल्हाड़ी मारना है। ऐसा करना ब्रह्मचर्य के लिये महान हानिकार है। अतः ब्रह्मचर्य और स्वास्थ्य-रक्षा के लिये सुबह-शाम दो मरतबे “नियमित समय पर” मल मूत्र का त्याग करना परम आवश्यक है। शाम को दिशा हो आने से सुबह का पाखाना बड़ा साफ़ होता है। मल के निकल जाने पर तन और मन दोनों निर्मल होते हैं।
दिशा के समय हरगिज़ कॉलो मत; उससे वीर्य बाहर निकल पड़ने की विशेष संभावना है और बहुमूत्रता का रोग होता है। कब्ज़ की बीमारी अधिक हो तो पानी का यथेष्ट उपयोग करो। एक-दो आँवला खाकर पानी पी लो, पेट को रगड़ो और आँतों को “मल त्याग करने की” सोते वक्त आज़्ञा दे रखो; सब काम दुरुस्त हो जायगा। इन सब का स्वयं अनुभव करके देखिये।
“इन्द्रिय-स्नान”
नियम दशवाँ:—
वक्तव्य—जननेन्द्रिय को बिना कारण कदापि हाथ न लगाओ और न उसकी ओर देखो भी, क्योंकि अशुचिस्थान का स्पर्श और चिन्ता न करने से काम-रिपु कभी जागृत नहीं हो सकता। भाव सदैव ऊँचे व पवित्र रखो। शौच के समय इन्द्रिय को स्वच्छता