भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

पृष्ठ 139, कुल 199 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 139

❁ इन्द्रिय-स्नान ❁

[१२३]

से घों डालो। मणि पर ठण्डे जल की धार छोड़ो। देखो, इस बात को कभी न भूलो जननेन्द्रिय में शरीर की तमाम नसें इकट्ठी हुई हैं। मानों सब शरीर का वह केन्द्र व मध्य है; और है भी वैसा ही। पेड़ की जड़ को पानी देने से जैसे सम्पूर्ण पेड़ हरा-भरा और चैतन्यमय बन जाता है, वैसे ही तमाम नसों की जड़ को इन्द्रिय को, ठण्डे पानी की धार से ठण्डा करने से सम्पूर्ण शरीर भी ठण्डा और शान्त हो जाता है। मन की चंचलता नष्ट होती है और स्वप्रदोष भी नहीं होने पाता। दिशा, पेशाब के समय में इस अत्यन्त उपकारी क्रिया को (इन्द्रिय-स्नान को) कभी न भूलो, क्योंकि यह ब्रह्मचर्य रक्षा का परम गुप्त रहस्य है। हमारे शास्त्रों में ऋषि लोगों ने पेशाब के समय पानी साथ ले जाने की जो आज्ञा दी है, उसमें हमारे कल्याण के अति उच्च हेतु भरे हुए हैं। अहं धन्य है ! परन्तु आजकल के सुट्टी भर ज्ञान के अधूरे लोग इस बात पर हँसते हैं; परन्तु वही क्रिया लुई कुहनी जैसे किसी पश्चिमीय विद्वान् ने यदि 'सिद्ध-वाथ' के रूप में रख दी तो लोग भट उस क्रिया पर दृढ़ पड़ते हैं और उसकी तारीफ करने लगते हैं।

अभी हम अपने देश का तथा देश के महापुरुषों का आदर करना कब सीखेंगे ? हमको विदेशियों की बात पर विश्वास है, किन्तु पूर्वजों की वैज्ञानिक बातों पर विश्वास नहीं। शोक !

जिसको न निज गौरव तथा, निज देश का अभिमान है। वह नर नहीं, नर पशु नरा है, और मृतक समान है ॥ १ ॥ अस्तु ॥

ब्रह्मचर्य ही जीवन है · पृष्ठ 139, कुल 199 में से · BharatKosha