ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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❁ त्रल्लचर्य्य ही जीवन है ❁
से तुम भी लक्ष्मीपति अवश्य बन जाओगे अर्थात् धन आप से आप तुम्हारे चरणों की सेवा करेगा; क्योंकि “ध्याने ध्याने तद्रूपता” ऐसा ही प्रकृति का सिद्धान्त है। अतः जैसे जैसे तुम अपने को घनाना चाहते हो, वैसे ही अथवा जिस दुर्गुण को या आदत को आप हटाना चाहते हो, उसके ठीक ठीक विरुद्ध विचार अद्वा, और शान्ति के साथ करा। निस्सन्देह तुम वैसे ही बन जाओगे। याद रखो, जैसे आपकी अद्वा और शान्ति होंगी वैसे ही आपको कम ज्यादा और जल्दी देरी में फल मिलेगा क्योंकि अद्वा और शान्ति ही संपूर्ण सौभाग्य और ईश्वरत्व की कुंजी है और भगवान् श्रीकृष्ण का भी यही सिद्धान्त* है।
मनुष्य के जैसे विचार होते हैं वैसा ही वातावरण atmosphere उसके बाहर-भीतर चहुँओर निर्माण होता है और फिर “योग्य योग्येन युज्यते।” अथवा Like attracts like यानी समान समान की ओर खिंचता है। इस न्याय से फिर वैसे ही विचार के पुरुष हमारे निकट खिंच आते हैं, अथवा हम उनके निकट खिंच जाते हैं, और हमारे विचारानुकूल ही अनेक शुभाशुभ घटनायें निर्माण होती हैं, जिनसे कि हमारा अभीष्ट या अनिष्ट आपसे आप सिद्ध होता है। आज जिस स्थिति में हम लोग हैं उस स्थिति के निर्माता खुद हम ही हैं और आहार, विचार व आचार के प्रभाव से हम इस स्थिति के बाहर भी निकल सकते हैं और जैसी चाहें वैसी उन्नति कर सकते हैं। इसी स्थिति में पढ़े रहने के लिये मनुष्य का जीवन नहीं है। वस्तुतः परमपद प्राप्त करना ही
*अद्वाऽमयो यं पुरुषो यो यच्छृङ्गः स एव सः ॥ गीता १७—३ ॥
❁ सादा व ताज़ा अल्पाहार ❁
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जीव मात्र का जीवनोंदेश्य है। उसी दिव्य स्थिति को हम लोगों को पहुंचना है और यह बात मनुष्य एक मात्र अपने शुद्ध, ऊँचे व सात्विक आहार, विचार और आचार द्वारा ही प्राप्त कर सकता है। महापुरुष अपने महान विचारों के द्वारा ही महान होते हैं और नीच पुरुष अपने नीच विचारों के कारण ही नीच होते हैं। अतएव सदैव पवित्र और ऊँचे विचार करना और श्रद्धा व शान्तिपूर्वक अपने को उन्नति की ओर बढ़ाना प्राणिमात्र का प्रधान कर्तव्य है और यह काम नित्यभोजन के समय वैसे ही श्रेष्ठ व पवित्र विचार रखने से बड़ी आसानी से बहुत जल्द सिद्ध होता है।
भोजन के शास्त्रीय नियम
(१) केवल दो ही समय भोजन करना चाहिये; पहला भोजन १० से लेकर १२ बजे के भीतर और दूसरा शाम को ८ बजे के भीतर; देर में करने से स्वप्न दोष होता है। (२) दिन भर में एकसरतबे भोजन करना सर्वोत्कृष्ट है—“एकमुक्त सदा रोग मुक्त” (३) रात में ८ बजे के भीतर थोड़ा सा ताज़ा ठंडा दूध बिलकुल थोड़ी सी चीनी डालकर धीरे धीरे पी लेना चाहिये। रात में गरम दूध पीने से स्वप्नदोष होता है। (४) बहुत गरम गरम भोजन कदापि न करना चाहिये। उससे वीर्य पतला पड़ जाता है और कामोत्तेजना होती है। गरम भोजन से और चाय से दाँत जल्दी दूट जाते हैं, आँतें दुर्बल पड़ती हैं, कञ्जियत बढ़ती है, और आँख की ज्योति मन्द पड़ जाती है। (५) भोजन हमेशा ताज़ा और सादा रहे। भोजन अनेक प्रकार का और वासी होने से अनेक विकार फौलन बढ़ जाते हैं। वासी भोजन से बुद्धि, आयु और तेज तत्काल
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❁ ब्रह्मचर्य्य हो जीवन है ❁
नष्ट हो, आलस छाती पर ज़बरदस्ती सवार होता है और मनुष्य को पाप कर्म में प्रवृत्त करता है। (६०) कभी हलक तक दूंस दूंस न खाओ; उससे बरबाद हो जाओगे। (७) थकने पर तत्काल भोजन न करना चाहिये। (८) भोजन के बाद शारीरिक व मानसिक परिश्रम एक घण्टा तक कदापि न करना चाहिये। एक घण्टा—कम से कम आध घण्टा तक आराम करो, नहीं तो रोगग्रस्त बन जल्दो ही मरना पड़ेगा। (९) भोजन के समय सदा शान्त, पवित्र व ऊँचे विचार रखो। चिड़चिड़ापन से अन्न हजम नहीं होता। क्रोध से अन्न जहर बन जाता है; अतः भोजन के समय हमेशा शांत रहो शान्ति के हेतु मौन धारण करो। (१०) नमक मिर्च, मसाला, पूड़ी, कचौड़ी, मिठाई, खटाई, मद्य, मांस, चाय, काफी वगैरह सर्वथा त्याग दो; क्योंकि इनसे मन व इन्द्रियां अत्यन्त चंचल बन जाती हैं। ऐसा पुरुष वीर्य को नहीं रोक सकता। (११) भोजन के समय पानी न पीना चाहिये; क्योंकि वैसा करना प्रकृति के खिलाफ है। भोजन के एक घण्टा बाद पानी पीना अच्छा है। (१२) भोजन के पहले हाथ, पैर और मुँह को पानी से पूरे तौर से स्वच्छ धो डालो और नारखून साफ रखो; क्योंकि उनमें जहर होता है। (१३) भोजन नियमित समय पर किया करो और फिर बीच में कुछ भी न खाओ। (१४) राह चलते, खड़े रहते व लेटे हुए भोजन करना सर्वथा अनुचित है। (१५) प्रातः काल जल पान अर्थात् कलेवा करना अच्छा नहीं है। (१६) भोजन की जगह पवित्र व प्रकाशमय होनी चाहिये। गन्दगी से जिन्दगी जल्दी बरबाद होती है, इस बात को सदा सर्वदा ध्यान में रखो। (१७) भोजन के बाद “शतपद्” अर्थात् सौ कदम इधर-उधर टहलना
❁ सादा व ताजा अल्पाहार ❁
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चाहिये। भोजनोत्तर तुरन्त आराम-कुर्सी पर पड़े, तो उससे बहुत हानि होती है; और दौड़ने से प्राण का नाश होता है।
जल सम्बन्धी शास्त्रीय नियम
(१) पानी स्वच्छ निर्गन्ध, जिस पर सूर्य का प्रकाश पड़ता हो ऐसा ताजा, उन्हा वहता हुआ अथवा गाँव के बाहर के कुएँ का होना चाहिये। क्योंकि ताजे जल में बहुत प्राणशक्ति भरी रहती है। जल को संस्कृत में 'जीवन' कहते हैं; सचमुच जल ही जीवन का मुख्य आधार है। भोजन से भी जल का महत्व अधिक है।
(२) दिन भर में कम से कम तीन सेर पानी पीना चाहिये; क्योंकि उतना ही शरीर से पेशाब, पसीना और भाप के रूप में खर्च होता है। ऋतु काल के अनुसार पानी की मात्रा कम ज्यादा भी करना उचित है। कृष्ण की बीमारी अवसर कम पानी पीने ही से हुआ करती है। यदि कृष्ण वाले यथेष्ट पानी पीने लग जाँय तो उनकी यह बीमारी बहुत जल्द दूर हो सकती है। तथापि अति पानी पीना भी रोग-कर है—“अति सर्वत्र दज्येत”।
(३) पानी छानकर ही पीना चाहिये और छानने का कपड़ा हर वक्त साफ़ कर लेना चाहिये क्योंकि उसमें सूक्ष्म जल जन्तु रहते हैं। विशेषतः हैजा वगैरह रोगों के दिनों में और दूषित स्थानों में, पानी हमेशा अच्छी तरह उबाल कर और छान कर ही पीना चाहिये, अन्यथा आलस्य के कारण मुक्त में रोगी बन के अकाल में मरना पड़ेगा। रोगी होने का कारण विशेषतः दूषित जल ही होता है। अतएव सावधान !
(४) जल थोड़ा थोड़ा दूध की तरह पीना चाहिये। पीते वक्त नीचे
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ऊपर के दाँत संलग्न करने से पानी में भी प्राणशक्ति पूरी तरह से खींची जा सकती है; पानी भी थोड़ा थोड़ा पीने में आता है और दाँत भी मजबूत हो जाते हैं; तथा पानी में का कूड़ा करकट भी पेट में नहीं जाने पाता। एक मनुष्य के पेट में, दाँत संलग्न न करने के कारण एक साँप का बच्चा तक चला गया था फिर भैंस के मट्टा से (उसमें मोहरी मिलाकर और पिला करके) कै करायी गई तब वह निकला। अतः सावधान रहो। (५) प्यास को कभी न रोकना चाहिये; क्योंकि उससे जीवनशक्ति का भयंकर रूप से नाश होता है और मनुष्य अल्पायु बनता है। (६) प्यास की वृत्ति पानी ही से करो न कि सोडा-लेमन और वरक-शराब से। याद रखो, प्रकृति के विरुद्ध चलने से कोई सात जन्म में भी सुखी नहीं हो सकता। (७) भोजन के समय विलकुल पानी न पीना चाहिये क्योंकि वैसा करना प्रकृति के सर्वथा विरुद्ध है। कोई भी बुद्धिमान पुरुष हमें चींटी से लेकर हाथी तक ऐसा कोई भी प्राणी वतला दे, जो कि भोजन के समय पानी पीता हो। भोजन के साथ पानी न पीने से बहुत लाभ है हाजमा दुरुस्त होता है; शौच साफ होता है; बढ़ा हुआ पेट घटता है; गले की जलन नष्ट होती है और भोजन भी कम लगता है अर्थात् पेटूपन के छूटने से हम अनेक रोगों से भी अनायास छूट जाते हैं। (८) भोजन के आधा या पाव घंटा पहिले एक गिलास पानी पी लेने से भोजन के समय तुम्हें प्यास नहीं सतावेगी। उससे पेटूपन का भी नाश होता है और खोटी भूख नष्ट होकर सच्ची लगने लगती है। भोजन के साथ पानी न पीने का अभ्यास जाड़े के दिनों से सुखपूर्वक शुरू किया जा सकता है। (९) शुष्क यानी जिस भोजन में विलकुल पानी नहीं होता ऐसा
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रूखा-सूखा भोजन करने के बाद तुरन्त पानी पीना भी प्राकृतिक नियम के अनुकूल है। (१०) एकदम सेर ढेढ़-सेर पानी पीना हानिकारक है; उससे 'बहु-भूत्रता' का रोग होता है। व्यास मात्स्य हो तब २-३ गिलास पानी थोड़ा थोड़ा करके सावकाश पूर्वक पीना उचित है। (११) खड़े खड़े, या लेटे हुये पानी कदापि न पीना चाहिये, यह कमजोर रोगियों का काम है। (१२) रात्रि में सोने के आधा घण्टे पहले ठण्डा जल अवश्य पी लेना चाहिये; ढेर सा नहीं और पेशाब करके सोना चाहिये। इससे चित्त व चोला दोनों शान्त रहते हैं और स्वप्नदोष भी रुक जाता है; तथा दूसरे दिन मल त्यागने में भी सुभीता होता है। (१३) प्रातःकाल उठते ही सूर्योदय से पहले स्वच्छ तांबे के लोटे में रात भर रक्खा हुआ जल पीने से रागी भी निरोग और विष भी निर्विष हो जाता है। मन प्रसन्न होता है। पेटूपन का नाश होता है और आयु बढ़ती है। पानी पीकर जरा लैट कर पेट को नाभी के चारों ओर दबाने से (रगड़ने से) पाखाना बहुत साफ होता है। प्रातःकाल का यह जल अमृत के तुल्य होता है। यदि नाक से पिया जाय तो नेत्र के समस्त विकार दूर हो जाते हैं; दृष्टि अत्यंत तेजस्वी बनती है; बुद्धि तीव्र होती है; नासारोग दुरुस्त होते हैं; बुढ़ापा जल्दी नहीं आता; बाल बहुत उम्र तक काले बने रहते हैं; और संपूर्ण रोग दुरुस्त हो जाते हैं। क्योंकि तांबे में ऐसे ही कुछ चमत्कारिक गुण भरे हुये हैं। इसी कारण हमारे पूर्वजों ने देव पूजा में सर्वत्र तांबे के ही पात्रों का विशेषतः विधान लिखा है। धन्य हैं उनके उपकार! (१४) यदि किसी को कब्ज की शिकायत बहुत दिनों की हो तो सुबह एक-दो गिलास मामूली गरम पानी में एक चम्मच भर खाने का नमक
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डालकर उसे पी लो । फिर चित लेट जाओ और नाभी के चारों तरफ से पेट को रगड़ो । देखो आठ दिन ही में पाखाना साफ होने लगेगा; बवासीर की बीमारी कम हो जायगी; जठर रोग, कर्ण रोग, सिर दर्द गला और छाती के रोग, नेत्र रोग, कोढ़, कमर का दर्द, सूजन आदि असंख्य विकार शनैः शनैः नष्ट हो जायेंगे । अवश्य अनुभव कीजिये । परन्तु यह उपाय भी अप्राकृतिक है; फिर इसे छोड़ देना चाहिये । (१५) एनिमा का उपाय भी कञ्चित्त के लिये सर्वोत्कृष्ट होने पर भी अप्राकृतिक है । अतः एनिमा की आदत न लगाओ । एनिमा का उपयोग कभी कभी क्वचित् किया करो—एनिमा का रोज उपयोग करने से आते सदा के लिये कमजोर बन जाती हैं । अतएव सावधान ! (१६) जल पीते वक्त “इस जल से मुझ में सुख, शान्ति, आरोग्य, ब्रह्मचर्य, तेज इत्यादि प्रवेश कर रहे हैं और मैं पूर्ण आरोग्य हो रहा हूँ ।” इस प्रकार के संकल्प व आत्म-कथन अवश्य किया करो । क्योंकि जैसे तुम जल पीते ( अथवा सभी समय ) संकल्प करोगे ठीक वैसे ही भाव तुम्हारे रोम रोम में घुस जायेंगे और तुम निःसन्देह वैसे ही बन जाओगे, ऐसा हम प्रतिज्ञा-पूर्वक कह सकते हैं ।
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“निर्व्यसनता”
नियम आठवाँ:—
वक्तव्य:—संपूर्ण दुर्व्यसनों की माता बीड़ी या सिगरेट है। इसी से गाँजा से लेकर संखिया तक का शौक्र बढ़ जाता है। यह नितान्त सत्य है कि दुर्व्यसनी पुरुष कदापि ब्रह्मचारी नहीं हो सकता। अमेरिकन डाक्टरों का कथन है, “तन्त्राकृ के सेवन से वीर्य फौजन उत्तेजित होकर पतला पड़ता है, पुरुषत्व शक्ति क्षीण होती है; पित्त विगड़ जाता है, नेत्र-ज्योति मन्द होती है, मस्तिष्क व छाती कमजोर होती है, खाँसी ( जो कि सब रोगों का जड़ है ), दमा और कफ बढ़ते हैं। आलस्य, कार्य में अनिच्छा, हृदय की धकधकाहट, व्यर्थ चिन्ता व अनिद्रा बढ़ती है, सुख से महान् दुर्गन्धि आती है, शारीरिक, मानसिक, आर्थिक व सामाजिक भयंकर हानि होती है।” शुद्ध हवा को जहरीली बना कर अपने साथ हो साथ लोगों का भी स्वास्थ्य विगाड़ना घोर पाप है। मेदक, पत्ती, वरै, मक्खियों और अन्य असंख्य कीड़े तन्त्राकृ की लपट मात्र ही से बेकाम होकर मर जाते हैं; तब फिर स्वयम् पीनेवाला अकाल ही में क्यों नहीं मरेगा ? तन्त्राकृ में “निकोटिन” नामक भयंकर विष होता है, जो कि शरीर के स्वास्थ्य और सद्भावों को मार डालता है। कई लोग इसे पाखाना साफ़ होने की दवा समझ बैठे हैं; परन्तु नतीजा उलटा ही होता है। आँतें और भी दुर्बल हो जाती हैं। फिर उन्हें बिना बीड़ी, चाय वगैरह पिये पाखाना होता ही नहीं देखो, यह कैसी गुलामी है ? शोक ! यदि पीछे दिये हुए अनुसार नमक पानी का उपयोग किया जाय तो बहुत जल्द निरोग हो सकते
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हैं । परन्तु ऐसे लोग कैसे मानेंगे ? चयी बन कर उन्हें जल्दी मरना है न ?
जापान में यदि बीस बरस का बालक चुरुट, सिगरेट, बीड़ी या तम्बाकू पीते देखा जाय तो फौज उसके माता पिता पर जुर्माना होता है । हे प्रभो ! ऐसा सामाजिक प्रबन्ध भारत में कब होगा ? और हम भी अपने भाई जापानियों की तरह शूर, वीर, साहसी, उद्योगी और ब्रह्मचारी कब बनेंगे ?
हे प्रभो आनन्ददाता ज्ञान हमको दीजिये । शीघ्र सारे दुर्गुणों को दूर हमसे कीजिये ॥ लीजिये हमको शरण में हम सदाचारी बने । ब्रह्मचारी, धर्मरक्षक, वीर-व्रतधारी बने ॥
“दो बार मल-मूत्र-त्याग”
नियम नवोंः—
वक्तव्यः—शौच को दो मरतबे जाने की आदत डालो । यदि दूसरी बार दिशा न मालूम हो तब भी जाओ । कुछ दिन के बाद आप से आप दिशा होने लगेगा । अनेक रोगों की जड़ मलवद्धता ही है । और मल वद्धता का एक मात्र असली कारण वीर्य का नाश ही है । “धातु-वृत्तात् श्रुतेरुक्तमन्दः संजायतेऽनलः ।” वीर्यनाश से रक्त-कमजोर, निकम्मा और नष्ट होकर अनल अर्थात् जठराग्नि मन्द पड़ जाती है । आँतों के दुर्बल होने पर फिर पाखाना भी साफ नहीं होता है ।
कैंदों वार मल-मूत्र-त्यागक
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चाय, तन्वाकू पीने से और वार वार जुलाव, एनीमा वगैरह लेने से तो आँते और भी दुर्बल बन जाती हैं। पाखाना हो, चाहे न हो, परन्तु भोजन अवश्य करना होगा ! चढ़ा देते हैं मात्रा पर मात्रा ! नतीजा यह होता है कि अन्न भीतर ही भीतर सड़ कर अत्यन्त वदवृद्धार और जहरीला बन जाता है। बाहर निकलने पर जिस मैले से नाक फूटी जाती है, ऐसा जहर पेट में रहने पर हम कैसे सुखी और दीर्घजीवी हो सकते हैं ? दिशा को रोकने से तो और भी मूर्खता कर बैठते हैं; उससे भीतर का “अपानवायु” विगड़ कर मैले को ऊपर की ओर चढ़ा देता है, जिससे कि वह खराब मैला फिर से पचने लगता है। भला बताइये अब स्वास्थ्य की आशा कहाँ है ? अपान-वायु को रोकने से भी यही नतीजा होता है। हम कहते हैं, पहले ऐसा टूँस टूँस के खाना ही क्यों, जिससे कि दिन भर डकार और खराब वायु छोड़ना पड़े। अन्न को चबा चबा के न खाने से तो और भी मूर्खता कर बैठते हैं। पहले ही तो आँते दुर्बल और उसमें श्वान की तरह मटपट भोजन ! कैसे स्वास्थ्य रह सकता है ? शरीर सुस्त पड़ जाता है, दिमाग में गर्मी छा जाती है, नेत्र विगड़ जाते हैं, रुचि नष्ट हो जाती है, भूख नहीं लगती, बल, तेज; उत्साह सभी घट जाते हैं, सदा रोगीसूत्र बनती रहती है और आयु बड़ी तेजी से घटती जाती है। इस बला से बचने का एक मात्र यही उपाय है कि हम फिर से प्रकृति के नियमानुसार चलें। रोगी पुरुष कदापि ब्रह्मचारी नहीं हो सकता। श्वान की तरह उताबली से भोजन करना और मल-मूत्र को रोकना मानों प्रत्यक्ष काल के मुख में ही जाना है। सैले की गर्मी के कारण भीतर की सब इन्द्रियाँ चून्ध हो जाती हैं
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और इन्द्रियाँ चू नष्ट होने पर फिर मनुष्य रोगी होने पर भी बड़ा कामी बन जाता है। मल-मूत्र को और वायु को किसी काम में फँस कर अथवा मोहवश वा लज्जा के कारण, जाड़े के डर से व किसी कारण रोकना मानों अपने स्वास्थ्य पर कुल्हाड़ी मारना है। ऐसा करना ब्रह्मचर्य के लिये महान हानिकार है। अतः ब्रह्मचर्य और स्वास्थ्य-रक्षा के लिये सुबह-शाम दो मरतबे “नियमित समय पर” मल मूत्र का त्याग करना परम आवश्यक है। शाम को दिशा हो आने से सुबह का पाखाना बड़ा साफ़ होता है। मल के निकल जाने पर तन और मन दोनों निर्मल होते हैं।
दिशा के समय हरगिज़ कॉलो मत; उससे वीर्य बाहर निकल पड़ने की विशेष संभावना है और बहुमूत्रता का रोग होता है। कब्ज़ की बीमारी अधिक हो तो पानी का यथेष्ट उपयोग करो। एक-दो आँवला खाकर पानी पी लो, पेट को रगड़ो और आँतों को “मल त्याग करने की” सोते वक्त आज़्ञा दे रखो; सब काम दुरुस्त हो जायगा। इन सब का स्वयं अनुभव करके देखिये।
“इन्द्रिय-स्नान”
नियम दशवाँ:—
वक्तव्य—जननेन्द्रिय को बिना कारण कदापि हाथ न लगाओ और न उसकी ओर देखो भी, क्योंकि अशुचिस्थान का स्पर्श और चिन्ता न करने से काम-रिपु कभी जागृत नहीं हो सकता। भाव सदैव ऊँचे व पवित्र रखो। शौच के समय इन्द्रिय को स्वच्छता
❁ इन्द्रिय-स्नान ❁
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से घों डालो। मणि पर ठण्डे जल की धार छोड़ो। देखो, इस बात को कभी न भूलो जननेन्द्रिय में शरीर की तमाम नसें इकट्ठी हुई हैं। मानों सब शरीर का वह केन्द्र व मध्य है; और है भी वैसा ही। पेड़ की जड़ को पानी देने से जैसे सम्पूर्ण पेड़ हरा-भरा और चैतन्यमय बन जाता है, वैसे ही तमाम नसों की जड़ को इन्द्रिय को, ठण्डे पानी की धार से ठण्डा करने से सम्पूर्ण शरीर भी ठण्डा और शान्त हो जाता है। मन की चंचलता नष्ट होती है और स्वप्रदोष भी नहीं होने पाता। दिशा, पेशाब के समय में इस अत्यन्त उपकारी क्रिया को (इन्द्रिय-स्नान को) कभी न भूलो, क्योंकि यह ब्रह्मचर्य रक्षा का परम गुप्त रहस्य है। हमारे शास्त्रों में ऋषि लोगों ने पेशाब के समय पानी साथ ले जाने की जो आज्ञा दी है, उसमें हमारे कल्याण के अति उच्च हेतु भरे हुए हैं। अहं धन्य है ! परन्तु आजकल के सुट्टी भर ज्ञान के अधूरे लोग इस बात पर हँसते हैं; परन्तु वही क्रिया लुई कुहनी जैसे किसी पश्चिमीय विद्वान् ने यदि 'सिद्ध-वाथ' के रूप में रख दी तो लोग भट उस क्रिया पर दृढ़ पड़ते हैं और उसकी तारीफ करने लगते हैं।
अभी हम अपने देश का तथा देश के महापुरुषों का आदर करना कब सीखेंगे ? हमको विदेशियों की बात पर विश्वास है, किन्तु पूर्वजों की वैज्ञानिक बातों पर विश्वास नहीं। शोक !
जिसको न निज गौरव तथा, निज देश का अभिमान है। वह नर नहीं, नर पशु नरा है, और मृतक समान है ॥ १ ॥ अस्तु ॥
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
पेशाव के समय गिलास या लोटा में पानी अवश्य ले जाया करो । बहुत ही उपकार होगा । शर्म से अपना सत्यानाशन कर लो । बाहर घूमने जाते समय हर वक्त एक रुमाल या अँगोखा साथ में रखो, ताकि उसे ही पानी में भिगो कर काम में ला सको । दिशा के समय पानी बड़े लोटे में ले जाओ । कई सज्जन तो बिना लोटा में पानी लिये ही दिशा मैदान जाते हैं ! यह क्या सम्भ्यता, ज्ञान और सच्चरित्रता के लक्षण हैं । यह कैसा घोर पशुपन है ? भाइयो, मनुष्य बनो ! मनुष्य बनो ! दिशा पेशाव के बाद संपूर्ण हाथ पैर ( अधूड़े नहीं ) ठंडे जल से स्वच्छ धो डालने चाहिये, इससे और भी लाभ होता है ।
“नियमित व्यायाम”
नियम ग्यारहवाँ:—
“प्रायेण श्रीमतां लोके भोक्तुं शक्तिं विद्यते ।
काष्ठान्यपि हि जीर्यन्ते दरिद्राणां च सर्वशः ॥”
— महाभारत ।
“धनी लोगा को सुपक्व अन्न भी पचाने की प्रायः शक्ति नहीं होती; परन्तु गरीब लोगो को काष्ठ तक पच जाते हैं” ।
दो लड़के थे—एक गरीब का और दूसरा धनी का । धनी के लड़के ने गरीब से पूछा, “भाई, तू गरीब होने पर भी इतना सशक्त
❁ नियमित व्यायाम ❁
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मञ्चवृत्त, तेजस्वी और निरोग किस प्रकार रहता है ?” उसने उत्तर दिया: “भाई ! हमारे यहां दो हल हैं, एक को हम रोज़ खेत में ले जाते हैं और दिन भर काम में लाते हैं, इस कारण वह चाँदी की तरह चमकता है और जो घर पर है, वह बेकार रहने के कारण मटमैला और मोरचा लगा पड़ा हुआ है। वस यही फ़रक़ मुझ में और तुम में है। मैं रोज़ अपने चार मील दूरी पर के खेत तक पैदल जाता हूँ और दिन भर वहां परिश्रम करता हूँ और शाम को घर पैदल ही लौटता हूँ। दोनों बक्त मुझे खूब मूख लगती है और निद्रा भी बड़े मजे की आती है, पर मैं तुम्हें देखता हूँ, तू स्वयं कुछ भी काम नहीं करता; तेरे नौकर ही तेरा काम किया करते हैं। इस कारण तेरे नौकर भी तेरे से कई गुना बलवान, चपल और आरोग्य संपन्न दिखाई देते हैं। बहुत हुआ तो गाड़ी-घोड़े पर घूमने निकलता है; परिश्रम तेरे घोड़ों को होता है, न कि तुम को ! तौ भी तू फ़जूल ही हांफ़ने लगता है; परिश्रम के ही कारण तेरे घोड़े इतने तेज और बलवान दिखाई देते हैं, परन्तु तू ज्यों का त्यों दुर्बल व रोगी बना है। शरीर को सुख भोग में पालना ही सम्पूर्ण शारीरिक तथा मानसिक पतन का मुख्य कारण है। समझा ?”
तालाब का पानी स्थिर होने के कारण गन्दा बन जाता है, परन्तु नदी वा फ़रने का जल नित्य बहता रहने के कारण अत्यन्त स्वच्छ और कांच की तरह चमकता है। फलतः उद्योग ही जीवन है और आलस्य ही मृत्यु है।
परिश्रम और कसरत में फ़रक़ है। परिश्रम से सम्पूर्ण शरीर को व्यायाम और आराम मिलता है और कसरत से व्यायाम और आराम के साथ ही साथ शरीर का अंग-प्रत्यंग सुखौल बनता है।
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
वगीचे में, खेत में या घर ही पर परिश्रम करने से या राजमंत्री मिस्टर ग्लैडस्टन की तरह कुल्हाड़ी लेकर स्वयं अपने हाथ से घर ही पर लकड़ी चौरने से मनुष्य बहुत-कुछ निरोग और सुखी बन सकता है; परन्तु प्रत्येक अवयव को गठीला और सुन्दर बनाने के लिये खास प्रकार की कसरत ही करनी चाहिये। कसरत को गरीब, धनी सभी कर सकते हैं। हमारी मर्जी हो, चाहे न हो किन्तु व्यायाम हमको अवश्य ही करना होगा; न करेंगे तो हमें रोगी बनना होगा और अपनी जीवन-यात्रा अकाल ही में समाप्त करनी होगी। व्यायाम से मस्तिष्क के और सब प्रकार के काम करने की प्रचण्ड शक्ति प्राप्त होती है। अतः अस्थि-पंजर बने हुये पुस्तक कीटों को इस व्यायामरूपी अमृत-संजीवनी का अवश्य सेवन करना चाहिये, परम उद्धार होगा। व्यायाम से मनुष्य को निस्संदेह चिरन्तन आरोग्य प्राप्त होता है। व्यायाम से आयु की प्रचण्ड वृद्धि होती है। नागपुर में (सन् ११२१ में) लेखक ने स्वयं १५५ वर्ष का पहलवान देखा है। अभी (१९२७) में वह मौजूद है। उसका एक भी दाँत नहीं टूटा है वह “गुजर” नामक एक रईस के यहाँ रहता है। स्वयं पहलवान बड़ा ही सदाचारी और ब्रह्मचारी है।
जिसे ब्रह्मचर्य पालन करना है उसे रोज नियमपूर्वक व्यायाम करना अत्यन्त आवश्यक है। व्यायाम से मुँह मोड़ने वाला पुरुष कभी निर्बिंकार और सच्चरित्र नहीं बन सकता। व्यायाम से मन और तन दोनों निरोग, निर्बिंकार और पुष्ट बन जाते हैं। औषधियों से रोग और दुर्बलता को काटने की अपेक्षा कसरत द्वारा शरीर सुदृढ़ बनाकर उन्हें हटाना कहीं अधिक निर्दोष और
❁ नियमित व्यायाम ❁
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बुद्धिमान्नी का काम है। क्योंकि रोगों की उत्पत्ति अक्सर शारीरिक और मानसिक दुर्बलता से ही होती है और उनकी उत्कृष्ट, सुलभ और मुक्त दवा व्यायाम ही है।
व्यायाम से संपूर्ण नीच इन्द्रियाँ फीकी पड़ जाती हैं और पापी वासनाएँ तत्काल दय जाती हैं। काम-विकारों का दमन करने के लिये और तन्दुरुस्ती के लिये व्यायाम एक अमृत-संजीवनी है। इसमें संपूर्ण रोगों को हटाने के गुण भरे हुए हैं। बड़े बड़े पहलवान जो पूर्ण शान्त, निर्वाकारी, ब्रह्मचारी और दीर्घजीवी दिखाई देते हैं इसका असली रहस्य एक मात्र सुयोग्य व्यायाम ही है। प्रोफेसर मार्शिकराव केवल सदाचार और व्यायाम ही के बल पर ब्रह्मचर्य का पालन कर रहे हैं। व्यायाम से दुर्बल आदमी भी महान् बलवान बन जाता है। रोगा भी पूर्ण निरोग बन जाता है और व्यभिचारी भी पुनः ब्रह्मचारी यानी वीर्यवान् बन जाता है। स्वामी रामतीर्थ पहले बहुत ही दुर्बल व रोगी थे, परन्तु व्यायाम ही के प्रताप से वे महान् बलशाली, आरोग्य सम्पन्न और भाग्यशाली हुये थे। अतः ऐ मेरे दुर्बल रोगी व्यसनग्रस्त मित्रों ! यदि व्यायाम को आज ही से तुम भी थोड़ा थोड़ा नियमितरूप से शुरू कर दोगे तो तुम भी बलवान, वीर्यवान और सच्चरित्रवान निःसंशय बन जाओगे, ऐसा मुझे अत्यन्त दृढ़ विश्वास है। 'हाथ कंगन को आरसी क्या ?' एक ही साल के भीतर आपको स्वयं इसका प्रत्यक्ष अनुभव हो सकता है, करके देख लीजिये। अतः ब्रह्मचर्य द्वारा आत्मोद्धार चाहनेवालों को रोज़ प्रातः काल और सायंकाल निल ( २५ । ३० दंड और ५० । ६० चैठक ) व्यायाम नियमपूर्वक दौं भरतवे अवश्य ही
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
करना होगा। क्या योरोप, क्या अमेरिका, सभी जगह “दौड़” सब से श्रेष्ठ व्यायाम समझा जाता है, इसलिये हलकारों की तरह कम से कम एक मील की दौड़ लगाना परम उपकारी होगा। एक समय कसरत और दूसरे समय दौड़, इस प्रकार व्यायाम करने से बड़ा ही अच्छा होगा। मन और तन सदा सर्वदा मस्त व शान्त बने रहेंगे। लेखक का पैसा निजी अनुभव है।
स्वच्छ जल-वायु सेवनः—रोज़ वस्ती के बाहर शुद्ध हवा में टहलने के लिये जाना बहुत ही उत्तम है। जिससे कसरत न बन पड़ती हो ऐसे बहुत फूलें हुए, बहुत दुर्बल, बहुत रोगी चूथी मनुष्य को टहलने से बढ़कर सुखकर तथा अरोग्यवर्धक दूसरा व्यायाम ही नहीं है। ऐसे मनुष्यों को कम से कम एक मील और स्वस्थ मनुष्य को कम से कम ३ मील टहलना चाहिये। और जहाँ तक हो बाहरी कूप का जल दिन भर में एक मरतबे तो अवश्य ही पान करना चाहिये; क्योंकि शुद्ध वायु, शुद्ध जल, शुद्ध भूमि, विपुल प्रकाश और विपुल आकाश ये ही प्रकृति की पाँच दिव्य औषधियाँ हैं। यही प्रकृति के पंचामृत हैं। इसी पंचामृत का यथेष्ट सेवन करके ऋषि महात्मा इतने अजर, अमर और वलिष्ठ हुए थे। धिना प्रकृति के इस अमूल्य पंचामृत का सेवन किये, कोई भी पुरुष सहस्र युगपर्यन्त भी सुखी और उन्नत नहीं हो सकता।
व्यायाम के शास्त्रीय नियम—(१) व्यायाम की जगह शुद्ध, हवादार व प्रकाशमय हो। संकुचित या गन्दी कोठरी न हो। संकुचित व रूढ़ी जगह में व्यायाम करने वाले पहलवान जल्दी मरते हैं। परन्तु शुद्ध हवादार स्थान में कसरत करने वाले अत्यन्त
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दोषार्थु होते हैं। (२) दो भरतवे व्यायाम अवश्य ही करना चाहिये, शाम को व्यायाम करने से दुःस्वप्न नष्ट होकर नींद बड़ी सुखकर आती है। (३) पसीना तत्काल पोंछ डालना चाहिये, क्योंकि वह भीतर का जहर है। जहर का शरीर में या शरीर पर रहना अत्यन्त रोगकर और नाशकर है। (४) कसरत की शुद्ध प्रणाली सीखो। झुक कर नीचे सर लाने से तमाम खून मस्तिष्क में चला आता है जिससे कि मस्तिष्क विगड़ जाता है और जिसका मस्तिष्क विगड़ गया उसका सब मामला ही विगड़ जाता है। नेत्र की ज्योति हीन हो जाती है और आयु घट जाती है। अतएव कसरत करते समय गर्दन और सीना हमेशा ऊँचा रहे, इस बात को कभी न भूलो। (५) कसरत के समय, दौड़ते समय और सभी समय मुँह से श्वास कदापि न खाओ, उससे हृदय और फेफड़े कमज़ोर पड़ जाते हैं और असंख्य रोगों से पीड़ित होकर अकाल ही में काल का शिकार बनना पड़ता है। हाँ, उपादा थक गये हों, तो मुँह से श्वास सिर्फ छोड़ सकते हो, परन्तु ले नहीं सकते। (६) श्वास हर एक नाक से ही लेना व छोड़ना चाहिये। श्वास जल्दी जल्दी न लो, न छोड़ो, धीरे धीरे लो। (७) कसरत या दौड़ने के बाद एकाएक बैठ न जाओ, नहीं तो रेल की तरह टूट फूट जाओगे। धीरे धीरे आराम करो। (८) कसरत के बाद पेशाब करना कभी न भूलो, क्योंकि उससे मूत्र द्वारा शरीर की फजूल गर्मी निकल पड़ती है और मन और तन दोनों शान्त बने रहते हैं। (९) शक्ति से अधिक व्यायाम या कोई काम कदापि न करो। इससे जीवन-शक्ति का भयंकर हास होता है, “अति
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सर्वत्रवर्जयेत्” । ( १० ) सामान्यतः व्यायाम और भोजन में २ घण्टे का अन्तर होना चाहिये । ( ११ ) भूख लगने पर व्यायाम न करना चाहिये और व्यायाम करने पर तत्काल न खाना-पीना चाहिये । नागपुर में एक वजाज का लड़का कसरत के बाद तुरन्त पानी पीने से मर गया; फिर कुछ खा लेना कितना भयानक है ? व्यायाम से गले में कुछ खुशकी मालूम होती है, इसलिए शीतल जल का कुल्हा कर लेना चाहिये या मुख में मिश्री की डली अथवा इलायची के २-४ दाने रख लेना चाहिये । कसरत के एक या आध घंटा बाद दूध पीना अच्छा है । ( १२ ) हर एक मौसम में स्नान के पहले ही कसरत करनी चाहिये । ( १३ ) मालिश करना बहुत अच्छा है, उससे बहुत रोग नष्ट होते हैं । रोज करना ठीक नहीं । जाड़े में एक हफ्ते में २-३ बार और गर्मी के महीने में २-३ बार करना चाहिये, क्योंकि मालिश भी अप्राकृतिक ही है । अपने हाथ मालिश करने से स्वास्थ्य और भी दुःखस्त होता है । पीठ की मालिश चाहे तो दूसरे के द्वारा की जाय । ( १४ ) व्यायाम को खेल समझ कर करो, न कि बोझ । इससे बहुत जल्द तुम पहलवान बन जाओगे । ( १५ ) व्यायाम करने का ढंग भी अच्छा होना चाहिये । उस समय टेढ़ा बाँका मुँह बनाने से व्यायाम के बाद भी चेहरा वैसा ही बना रहेगा और प्रसन्नबदन रहने से तुम भी प्रसन्न बन जाओगे । इसके लिये सामने शीशा रखने से निस्सीम लाभ होगा । ( १६ ) व्यायाम के समय सामने शीशा रहने पर मनुष्य की भावना बड़ी बलवती बनती है और अंग प्रत्यंग भी प्रबल भावना के कारण बड़ी शीघ्रता से पुष्ट व गठीले बनते हैं । अतः व्यायाम के समय चित्त एकाग्र रख कर दृढ़
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भावना करो कि “मेरी नस नस में बल, तेज, सामर्थ्य, निर्भयता, वीरता, क्षमा, शान्ति, आरोग्य, ब्रह्मचर्य प्रवेश कर रहे हैं, मैं उन्नति कर रहा हूँ” —ऐसा ख्याल करने से सचमुच आप ऐसे ही बन जाँगे।
“जल्दी सोना और जल्दी जागना”
नियम बारहवाँ:—
वक्तव्य:—जिन्हें वीर्यरत्ना करनी है और आरोग्यसम्पन्न तथा भाग्यवान् बनना है, उन्हें जल्दी सोने और जल्दी जागने का अभ्यास अवश्य ही डालना चाहिये। १० बजे के भीतर ही सोना चाहिये और ४ बजे के भीतर ही उठना चाहिये। क्योंकि स्वप्रदोष प्रायः रात्रि के अन्तिम ग्रह में ही हुआ करता है। वाल्यकाल नष्ट कर डालने से जैसे सम्पूर्ण जीवन दुःखमय हो जाता है, वैसे ही प्रातःकाल (दिन का वाल्यकाल) नष्ट कर डालने से भी सम्पूर्ण दिन दुःखमय बन जाता है। प्रातःकाल हो जाने पर भी जो पुरुष कुम्भकर्ण के समान खटिया पर पड़ा ही रहता है उसको पूरा अभागा समझना चाहिये। इतिहास और अनुभव हमें स्पष्ट बतलाता है कि प्रातःकाल उठने वाला पुरुष ही चंगा और भाग्यवान् हो सकता है। आज तक हमने प्रातःकाल में न उठने वाले किसी भी व्यक्ति को महा पुरुष होते हुए न देखा है और न सुना ही है। प्रकृति की ओर ध्यान देने से यही मालूम होता है कि प्रातःकाल ही में