ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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मञ्चवृत्त, तेजस्वी और निरोग किस प्रकार रहता है ?” उसने उत्तर दिया: “भाई ! हमारे यहां दो हल हैं, एक को हम रोज़ खेत में ले जाते हैं और दिन भर काम में लाते हैं, इस कारण वह चाँदी की तरह चमकता है और जो घर पर है, वह बेकार रहने के कारण मटमैला और मोरचा लगा पड़ा हुआ है। वस यही फ़रक़ मुझ में और तुम में है। मैं रोज़ अपने चार मील दूरी पर के खेत तक पैदल जाता हूँ और दिन भर वहां परिश्रम करता हूँ और शाम को घर पैदल ही लौटता हूँ। दोनों बक्त मुझे खूब मूख लगती है और निद्रा भी बड़े मजे की आती है, पर मैं तुम्हें देखता हूँ, तू स्वयं कुछ भी काम नहीं करता; तेरे नौकर ही तेरा काम किया करते हैं। इस कारण तेरे नौकर भी तेरे से कई गुना बलवान, चपल और आरोग्य संपन्न दिखाई देते हैं। बहुत हुआ तो गाड़ी-घोड़े पर घूमने निकलता है; परिश्रम तेरे घोड़ों को होता है, न कि तुम को ! तौ भी तू फ़जूल ही हांफ़ने लगता है; परिश्रम के ही कारण तेरे घोड़े इतने तेज और बलवान दिखाई देते हैं, परन्तु तू ज्यों का त्यों दुर्बल व रोगी बना है। शरीर को सुख भोग में पालना ही सम्पूर्ण शारीरिक तथा मानसिक पतन का मुख्य कारण है। समझा ?”
तालाब का पानी स्थिर होने के कारण गन्दा बन जाता है, परन्तु नदी वा फ़रने का जल नित्य बहता रहने के कारण अत्यन्त स्वच्छ और कांच की तरह चमकता है। फलतः उद्योग ही जीवन है और आलस्य ही मृत्यु है।
परिश्रम और कसरत में फ़रक़ है। परिश्रम से सम्पूर्ण शरीर को व्यायाम और आराम मिलता है और कसरत से व्यायाम और आराम के साथ ही साथ शरीर का अंग-प्रत्यंग सुखौल बनता है।