ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
वगीचे में, खेत में या घर ही पर परिश्रम करने से या राजमंत्री मिस्टर ग्लैडस्टन की तरह कुल्हाड़ी लेकर स्वयं अपने हाथ से घर ही पर लकड़ी चौरने से मनुष्य बहुत-कुछ निरोग और सुखी बन सकता है; परन्तु प्रत्येक अवयव को गठीला और सुन्दर बनाने के लिये खास प्रकार की कसरत ही करनी चाहिये। कसरत को गरीब, धनी सभी कर सकते हैं। हमारी मर्जी हो, चाहे न हो किन्तु व्यायाम हमको अवश्य ही करना होगा; न करेंगे तो हमें रोगी बनना होगा और अपनी जीवन-यात्रा अकाल ही में समाप्त करनी होगी। व्यायाम से मस्तिष्क के और सब प्रकार के काम करने की प्रचण्ड शक्ति प्राप्त होती है। अतः अस्थि-पंजर बने हुये पुस्तक कीटों को इस व्यायामरूपी अमृत-संजीवनी का अवश्य सेवन करना चाहिये, परम उद्धार होगा। व्यायाम से मनुष्य को निस्संदेह चिरन्तन आरोग्य प्राप्त होता है। व्यायाम से आयु की प्रचण्ड वृद्धि होती है। नागपुर में (सन् ११२१ में) लेखक ने स्वयं १५५ वर्ष का पहलवान देखा है। अभी (१९२७) में वह मौजूद है। उसका एक भी दाँत नहीं टूटा है वह “गुजर” नामक एक रईस के यहाँ रहता है। स्वयं पहलवान बड़ा ही सदाचारी और ब्रह्मचारी है।
जिसे ब्रह्मचर्य पालन करना है उसे रोज नियमपूर्वक व्यायाम करना अत्यन्त आवश्यक है। व्यायाम से मुँह मोड़ने वाला पुरुष कभी निर्बिंकार और सच्चरित्र नहीं बन सकता। व्यायाम से मन और तन दोनों निरोग, निर्बिंकार और पुष्ट बन जाते हैं। औषधियों से रोग और दुर्बलता को काटने की अपेक्षा कसरत द्वारा शरीर सुदृढ़ बनाकर उन्हें हटाना कहीं अधिक निर्दोष और