ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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बुद्धिमान्नी का काम है। क्योंकि रोगों की उत्पत्ति अक्सर शारीरिक और मानसिक दुर्बलता से ही होती है और उनकी उत्कृष्ट, सुलभ और मुक्त दवा व्यायाम ही है।
व्यायाम से संपूर्ण नीच इन्द्रियाँ फीकी पड़ जाती हैं और पापी वासनाएँ तत्काल दय जाती हैं। काम-विकारों का दमन करने के लिये और तन्दुरुस्ती के लिये व्यायाम एक अमृत-संजीवनी है। इसमें संपूर्ण रोगों को हटाने के गुण भरे हुए हैं। बड़े बड़े पहलवान जो पूर्ण शान्त, निर्वाकारी, ब्रह्मचारी और दीर्घजीवी दिखाई देते हैं इसका असली रहस्य एक मात्र सुयोग्य व्यायाम ही है। प्रोफेसर मार्शिकराव केवल सदाचार और व्यायाम ही के बल पर ब्रह्मचर्य का पालन कर रहे हैं। व्यायाम से दुर्बल आदमी भी महान् बलवान बन जाता है। रोगा भी पूर्ण निरोग बन जाता है और व्यभिचारी भी पुनः ब्रह्मचारी यानी वीर्यवान् बन जाता है। स्वामी रामतीर्थ पहले बहुत ही दुर्बल व रोगी थे, परन्तु व्यायाम ही के प्रताप से वे महान् बलशाली, आरोग्य सम्पन्न और भाग्यशाली हुये थे। अतः ऐ मेरे दुर्बल रोगी व्यसनग्रस्त मित्रों ! यदि व्यायाम को आज ही से तुम भी थोड़ा थोड़ा नियमितरूप से शुरू कर दोगे तो तुम भी बलवान, वीर्यवान और सच्चरित्रवान निःसंशय बन जाओगे, ऐसा मुझे अत्यन्त दृढ़ विश्वास है। 'हाथ कंगन को आरसी क्या ?' एक ही साल के भीतर आपको स्वयं इसका प्रत्यक्ष अनुभव हो सकता है, करके देख लीजिये। अतः ब्रह्मचर्य द्वारा आत्मोद्धार चाहनेवालों को रोज़ प्रातः काल और सायंकाल निल ( २५ । ३० दंड और ५० । ६० चैठक ) व्यायाम नियमपूर्वक दौं भरतवे अवश्य ही