ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
करना होगा। क्या योरोप, क्या अमेरिका, सभी जगह “दौड़” सब से श्रेष्ठ व्यायाम समझा जाता है, इसलिये हलकारों की तरह कम से कम एक मील की दौड़ लगाना परम उपकारी होगा। एक समय कसरत और दूसरे समय दौड़, इस प्रकार व्यायाम करने से बड़ा ही अच्छा होगा। मन और तन सदा सर्वदा मस्त व शान्त बने रहेंगे। लेखक का पैसा निजी अनुभव है।
स्वच्छ जल-वायु सेवनः—रोज़ वस्ती के बाहर शुद्ध हवा में टहलने के लिये जाना बहुत ही उत्तम है। जिससे कसरत न बन पड़ती हो ऐसे बहुत फूलें हुए, बहुत दुर्बल, बहुत रोगी चूथी मनुष्य को टहलने से बढ़कर सुखकर तथा अरोग्यवर्धक दूसरा व्यायाम ही नहीं है। ऐसे मनुष्यों को कम से कम एक मील और स्वस्थ मनुष्य को कम से कम ३ मील टहलना चाहिये। और जहाँ तक हो बाहरी कूप का जल दिन भर में एक मरतबे तो अवश्य ही पान करना चाहिये; क्योंकि शुद्ध वायु, शुद्ध जल, शुद्ध भूमि, विपुल प्रकाश और विपुल आकाश ये ही प्रकृति की पाँच दिव्य औषधियाँ हैं। यही प्रकृति के पंचामृत हैं। इसी पंचामृत का यथेष्ट सेवन करके ऋषि महात्मा इतने अजर, अमर और वलिष्ठ हुए थे। धिना प्रकृति के इस अमूल्य पंचामृत का सेवन किये, कोई भी पुरुष सहस्र युगपर्यन्त भी सुखी और उन्नत नहीं हो सकता।
व्यायाम के शास्त्रीय नियम—(१) व्यायाम की जगह शुद्ध, हवादार व प्रकाशमय हो। संकुचित या गन्दी कोठरी न हो। संकुचित व रूढ़ी जगह में व्यायाम करने वाले पहलवान जल्दी मरते हैं। परन्तु शुद्ध हवादार स्थान में कसरत करने वाले अत्यन्त