भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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❁ नियमित-व्यायाम ❁

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दोषार्थु होते हैं। (२) दो भरतवे व्यायाम अवश्य ही करना चाहिये, शाम को व्यायाम करने से दुःस्वप्न नष्ट होकर नींद बड़ी सुखकर आती है। (३) पसीना तत्काल पोंछ डालना चाहिये, क्योंकि वह भीतर का जहर है। जहर का शरीर में या शरीर पर रहना अत्यन्त रोगकर और नाशकर है। (४) कसरत की शुद्ध प्रणाली सीखो। झुक कर नीचे सर लाने से तमाम खून मस्तिष्क में चला आता है जिससे कि मस्तिष्क विगड़ जाता है और जिसका मस्तिष्क विगड़ गया उसका सब मामला ही विगड़ जाता है। नेत्र की ज्योति हीन हो जाती है और आयु घट जाती है। अतएव कसरत करते समय गर्दन और सीना हमेशा ऊँचा रहे, इस बात को कभी न भूलो। (५) कसरत के समय, दौड़ते समय और सभी समय मुँह से श्वास कदापि न खाओ, उससे हृदय और फेफड़े कमज़ोर पड़ जाते हैं और असंख्य रोगों से पीड़ित होकर अकाल ही में काल का शिकार बनना पड़ता है। हाँ, उपादा थक गये हों, तो मुँह से श्वास सिर्फ छोड़ सकते हो, परन्तु ले नहीं सकते। (६) श्वास हर एक नाक से ही लेना व छोड़ना चाहिये। श्वास जल्दी जल्दी न लो, न छोड़ो, धीरे धीरे लो। (७) कसरत या दौड़ने के बाद एकाएक बैठ न जाओ, नहीं तो रेल की तरह टूट फूट जाओगे। धीरे धीरे आराम करो। (८) कसरत के बाद पेशाब करना कभी न भूलो, क्योंकि उससे मूत्र द्वारा शरीर की फजूल गर्मी निकल पड़ती है और मन और तन दोनों शान्त बने रहते हैं। (९) शक्ति से अधिक व्यायाम या कोई काम कदापि न करो। इससे जीवन-शक्ति का भयंकर हास होता है, “अति